Thursday, June 27, 2024

राज कंवर

#28jun
#03feb
राज कवंर
जन्म की तारीख और समय: 28 जून 1961, भारत
मृत्यु की जगह और तारीख: 3 फ़रवरी 2012, सिंगापुर
पत्नी: अनीता कँवर (विवा. ?–2012)
भाई: के० पप्पू
बच्चे: करन कँवर, अभय कंवर
उनकी शिक्षा देहरादून के कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल में हुई ।

उनके दो बेटे हैं (उनकी पत्नी अनीता कंवर के साथ), करण राज कंवर और अभय कंवर, दोनों ने फिल्म निर्देशक और निर्माता के रूप में काम किया है। फिल्म निर्माता के. पप्पू उनके बड़े भाई हैं।

3 फरवरी 2012 को सिंगापुर में किडनी की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई
कंवर ने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली में नाटकों का निर्देशन करके की। इसके बाद वह मुंबई चले गए जहां उन्होंने शेखर कपूर और राज कुमार संतोषी जैसे निर्देशकों के सहायक के रूप में काम किया । उनकी निर्देशित पहली फिल्म दीवाना थी । 1992 में रिलीज हुई यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर रही और शाहरुख खान की पहली फिल्म थी । उन्होंने लाडला (1994), जान (1996), जीत (1996), जुदाई (1997), दाग: द फायर (1999) और बादल (2000) जैसी कई अन्य बॉक्स ऑफिस हिट फिल्मों का निर्देशन किया । कंवर ने लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा जैसे अभिनेताओं की खोज कीजिन्हें उन्होंने 2003 में अपनी फिल्म अंदाज़ में कास्ट किया था । [3] उनकी आखिरी फिल्म सदियां (2010) थी। अनुराग सिंह ज्यादातर फिल्मों में उनके साथ मुख्य सहायक थे। उनकी ज्यादातर फिल्मों के मुख्य किरदारों के नाम करण और काजल हैं।

निदेशक

सादियान (2010)
हमको दीवाना कर गए (2006)
अंदाज़ (2003)
अब के बरस (2002)
फ़र्ज़ (2001)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
हर दिल जो प्यार करेगा (2000)
बादल (2000)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997)
जुदाई (1997)
जीत (1996)
जान (1996)
कर्तव्य (1995)
लाडला (1994)
दीवाना (1992)

लेखक

हमको दीवाना कर गए (2006)
अंदाज़ (2003) (कहानी)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
बादल (2000) (कहानी)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997) (कहानी)
जीत (1996)

निर्माता

सादियान (2010)
रकीब (2007)
हमको दीवाना कर गए (2006)
अब के बरस (2002)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997)
सहायक संचालक
संपादन करना
घायल (1990)
राम-अवतार (1988)।
मिस्टर इंडिया (1987)

Wednesday, June 19, 2024

जीत सिंह नेगी

#21jun 
#02feb 
जीत सिंह नेगी 

🎂जन्म- 02 फ़रवरी, 1925; 

⚰️निधन 21 जून, 2020 
 
उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। वह पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक भी रहे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया था। तब पहली बार ऐसा हुआ था, जब किसी उत्तराखंडी लोकगायक के गीतों का रेकॉर्ड उस समय देश की मशहूर ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया। 2 फरवरी, 1925 को पौड़ी जिले के अयाल गांव में जन्मे और वर्तमान में देहरादून के नेहरू कॉलोनी (धर्मपुर) के निवासी जीत सिंह नेगी के इसमें 6 गीत शामिल किए गए थे। जीत सिंह नेगी अपने दौर के न केवल जाने-माने लोकगायक रहे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी रहे। दो हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा…’ ‘रामी बौराणी…’ ‘मलेथा की गूल…’ जैसे कई उनके नाटक भी लोकप्रिय हुए।

रेडियो पर पहले गढ़वाली लोकगायक

जीत सिंह नेगी के ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा’ को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने कानपुर में न केवल रिकॉर्ड किया, बल्कि रेडियो पीकिंग से उसका प्रसारण भी किया। वे पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।

लोकप्रिय गीत

1950 के दशक की शुरूआत में रेडियो से यह गीत प्रसारित हुआ तो उत्तराखंड से लेकर देश के महानगरों तक प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच पलक झपकते ही बेहद लोकप्रिय भी हो गया। इस सुमधुर खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यां-सड़क्यों रूणूं छौं परदेश मा…।’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहाँ परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।)

निर्देशन कार्य

जीत सिंह नेगी के निर्देशन में 1954-1955 में दिल्ली में आयोजित गढ़वाली नाटक ‘भारी भूल’ का मंचन हुआ। कई अच्छे कलाकार नेगी जी की टोली से जुड़े रहे। मुंबई-दिल्ली-चंडीगढ़ समेत देश के कई प्रमुख नगरों में उस दौर में जीत सिंह नेगी के गीत और नाटक श्रोताओं-दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते थे।

मृत्यु

जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से लोक कलाकारों के साथ ही प्रदेशवासियों में शोक दौड़ पड़ी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखण्ड के लोकगायक और गीतकार जीत सिंह नेगी के निधन पर शोक व्यक्त किया।

Tuesday, June 18, 2024

विदया नाथ सेठ

#02jun
#18jun
#29feb
पुराने जमाने के संगीतकार गायक विद्यानाथ सेठ की
🎂जन्म दिन विवादास्पद
02 जून 1915
             या
29 फरवरी 1916
मृत्यु⚰️18 जून
उनके पासपोर्ट के अनुसार 2 जून 1915  में मगर घर वालो के कथनानुसार 29 फरवरी 1916 को लाहौर में जन्मे और बड़े हुए विद्यानाथ सेठ का नाम आज की पीढ़ी के लिए शायद अजनबी हो मगर पिछली सदी के छठे दशक तक उनकी आवाज़ रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के जरिये घर-घर में गूंजती थी।  खासकर उनके गाये भजन तो पुरानी पीढ़ी के लोगों की जुबान पर आज भी हैं। "मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे", "सुन लीजो प्रभु मोरी" , "मैं गिरधर के गुण गाऊं"  या ‘चदरिया झीनी रे झीनी’जैसे भजन उनकी आवाज़ में जब कभी सुनने में आते हैं तो उस पीढ़ी के लोग साथ में गुनगुनाते हुए यादों के गलियारों में खो जाते हैं। 

रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के उस सुनहरी दौर के इस  सहज और सरल गायक ने अपने गायन को कभी व्यावसाय नहीं बनाया भले ही वे रेडियो पर गाते रहे, एचएमवी के लिए गाते रहे और संगीत सभाओं में गाने के लिए भी जाते रहे। फिल्मों में गाने के लिए भी उनको खूब बुलावे आये मगर परिवार को छोड़ कर मुम्बई या कोलकाता जाने का कभी मन नहीं हुआ।  तब के प्रमुख संगीतकार पंडित गोबिन्द राम ने खुद उन्हें बुलावे भेजे मगर वे बंबई नहीं गए। सिर्फ एक फिल्म 'रूप रेखा' (1948) में उन्होंने पांच गाने गाये। फिल्म के संगीतकार उनके साथी रवि रॉय चौधरी थे जिनका आग्रह वे नहीं टाल सके। वास्तवमें इस फिल्म के लिए अपने गाने उन्होंने खुद ही कंपोज़ किये और गाये थे। उनके पांच में से तीन एकल गाने थे, एक में उनकी सह गायिका थी मुनव्वर सुल्ताना और एक अन्य में उनके साथ मुनव्वर सुल्ताना और सुरिंदर कौर ने आवाज़ दी। 

गैर फ़िल्मी गानों में वे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बने रहे।  उनके गायन में एक विशेष प्रकार की सरलता थी अपने गायन में उन्होंने कभी कोई तिकड़म या उस्तादी दिखा कर चौकाने की कोशिश नहीं की। जब वे 98वें वर्ष में चल रहे थे  तब जयपुर के संगीत रसिकों के एक समूह  'सुर यात्रा' के हमराहियों के साथ हम उनका इस्तेकबाल करने उनके घर दिल्ली गए थे जहां हमने उनकी ऐसी सरलता, सादगी और प्रफुल्लता देखी जो उनकी उम्र के लोगों आम तौर पर नहीं मिलती। उन्होंने लोकप्रियता की बुलंदियां छुई मगर अहंकार को अपने पास फटकने नहीं दिया।  पूरी ज़िन्दगी वे बालक की तरह सरल बने रहे। सरल, सादे और प्रफुल्लित जीवन से सरोबार विद्यानाथ सेठ एक नेक इंसान थे। इसीलिये उनकी गायकी सुनने वालों को सच्ची लगती थी। गायकी  में भावों  की अभिव्यक्ति पर उनका  खास ज़ोर रहता था जिससे उनके  गीत, ग़ज़ल व भजन  सुनने वालों के दिलों में सीधे उतर जाते थे।

गैर फिल्मी गानों के लिए उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एचएमवी कंपनी ने अपने श्रेष्ठ गायकों के पोस्टरों की शृंखला में विद्यानाथ सेठ को भी शामिल किया था। पुराने एचएमवी डीलरों के व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की दीवारों पर उनके पोस्टर फ्रेम में जड़े हुए लटके आज भी दिख जाते हैं।  

प्रसिद्ध भजन गायक स्वर्गीय हरिओम शरण ने एक इंटरव्यू में स्वतंत्र पत्रकार संजय पटेल को बताया था कि उनके मन में जिस आवाज़ को सुन कर भजन गाने की प्रीति लगी वह विद्यानाथ सेठ की आवाज़ थी। 

सेठ को बचपन से ही गाने का शौक था।  स्कूल में वे प्रार्थना का नेतृत्व करते थे।  कॉलेज पूर्व की अंतिम स्कूली क्लास के दौरान स्कूल के हैंड मास्टर साहब ने उन्हें सुझाया कि वे लाहौर में चल रहे गन्धर्व महाविद्यालय में भी भर्ती हो  जाएं।  वहां संगीत की अकादमिक समझ हुई मगर किसी उस्ताद से कभी दीक्षित नहीं हुए। बक़ौल सेठ : “जो कुछ सीखा बड़े उस्तादों को सुन कर और उनकी सोहबत से ही सीखा”।  जिन उस्तादों को बार-बार सुन कर सीखा उनमें पंडित ओंकार नाथ ठाकुर और फ़ैयाज़ खान प्रमुख थे। ठाकुर ग्वालियर घराने के विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य थे और लाहौर गंधर्व महाविद्यालय के प्रिंसिपल रहे जिन्होंने बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना की। बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड के दरबार के गायक फ़ैयाज़ खान जिन्हें‘ज्ञान रत्न’की उपाधि प्राप्त थी ‘महफिल के बादशाह’ कहलाते थे।  “शास्त्रीय संगीत के ये दो दिग्गज गाते हुए बोलों को जिस तरह काटते थे वह मुझे बहुत भाती थी।  मैंने  भी उनकी  इस शैली का उपयोग अपने गानों में  किया”।

प्रसिद्ध संगीतकार फिरोज़ निज़ामी जो तब लाहौर रेडियो स्टेशन में काम करते थे ने उन्हें कुछ सभाओं में सुना तो उनसे बोले “रेडियो पर क्यों नहीं गाते?”वे बोले रेडियो पर तो मैं किसी को नहीं जानता। निज़ामी कहले लगे “मैं जो हूं”। इस प्रकार 1938 में सेठ का रेडियो पर पदार्पण हुआ। पहली बार रेडियो पर गाने पर जो थ्रिल उन्हें हुआ होगा वह तब भी बरकरार था जब हम उनसे मिले। “उस जमाने में रेडियो पर एक गाने के पांच से सात रुपये

मिलते थे। मुझे निज़ामी साहब ने 15 रुपये दिलाये। उन दिनों यह बहुत बड़ी रकम होती थी। अमूमन हर हफ्ते एक गाना रेडियो पर गा लेता था। इस प्रकार महीने में चार गाने हो जाते और मेरी जेब में 60 रुपये आ जाते। अपनी तो रईसी हो गई”।

लाहौर रेडियो स्टेशन पर उनकी ऐसी ख्याति हुई कि अन्य रेडियो स्टेशनों से उन्हें बुलावे आने लगे। तब टेप रिकॉर्डिंग का युग नहीं आया था। दिल्ली, कलकत्ता, बंबई, लखनऊ और जोधपुर जैसे स्टेशनों की तरंगों पर सवार हो कर उनकी आवाज़ दूर दूर तक पहुंची।  इसी बीच उनके एक परिचित ने उन्हें बुलाया और इंश्योरेंस कंपनी में नौकरी दे दी। “बिना कोई एप्लीकेशन दिये मुझे नौकरी मिल गई”। बाद में यही कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया कहलायी। उनकी पत्नी दिल्ली में चिकित्सक थी और यह दंपती यहीं के हो कर रह गए।

ग्रामोफोन कंपनी के लिए उनकी पहली रिकॉर्डिंग भी उसी जमाने में 1938-39 में हुई। रिकॉर्ड पर मेरा पहला गाना था‘आवत मोरी गलियन में गिरधारी’। इस गाने के संगीतकार थे गुलाम अहमद चिश्ती जिन्हें अब चिश्ती बाबा के नाम से पाकिस्तानी फिल्म संगीत के पितामह के रूप में जाना जाता है। चिश्ती बाबा संगीतकार ख़ैयाम के भी गुरु रहे।

लाहौर के गंधर्व महाविद्यालय में उनके कुछ साथी शास्त्रीय संगीत के बड़े उस्ताद बने जिनमें डी. वी. पलुस्कर। “वो मुझे अपना बड़ा भाई ही मानता था। नेक आदमी था। कमाल का गाता था”। बिहार और अमृतसर जैसी कईं जागहों पर हमने साथ-साथ गाया। 

तब के और आज के संगीत में वे क्या फर्क महसूस करते हैं के जवाब में उनका कहना था “तब सभी गाने रागों में होते थे। आज जैसे इधर-उधर का धूम-धड़ाका नहीं होता था”।

अपने जमाने की कुछ यादें साझा करते हुए वे गायक के. एल. सैगल को याद करना नहीं भूलते। “हमारे शहर में सैगल की फिल्म‘माई सिस्टर’लगी। उसमें सैगल का जबर्दस्त मशहूर हुआ गाना था‘ऐ क़ातिबे तक़दीर मुझे इतना बता दे’था। जब पर्दे पर यह गाना फिल्म में आया तब हाल में दर्शकों ने खड़े हो कर तालियां बजाई मानो सैगल खुद सामने स्टेज पर हो। ऐसा किसी सिनेमा हाल में फिर कभी किसी के लिए नहीं हुआ”। 

अपनी लंबी उम्र के अंतिम पड़ाव में भी किस भांति वे प्रसन्नचित्त और स्वस्थ रह सके इसका राज़ उन्हों ने अपना एक कवित्त कह कर यों बताया: “कड़वी बात कभी न करना/ मेरी बात पे ध्यान तुम धरना/ कोई नहीं सुनेगा, कोई सहेगा/ दुखी रहोगे प्यारे”। इस कवित्त के अंत में उन्होंने कहा “दुख-दर्द और गम/इस उम्र में न होंगे कम/ये जान ले मेरे प्यारे/ हिम्मत रख, दिल ना तोड़/ चलता चल भगवान सहारे/ वरना बूढ़ा होकर, घर में सो कर वचन सुनोगे खारे”।
इसी जीवन दर्शन से वे आखरी सांस तक जीवंत बने रहे किसी से कभी कोई शिकायत नहीं की। जो भी जीवन में होता गया उसे वे सहज रूप से लेते गए। आज की पीढ़ी उनके नाम से नावाकिफ है इसका भी उन्हें कोई शिकवा नहीं रहा।

18 जून 2015 में उनका निधन हो गया

Sunday, June 16, 2024

अखलाक मोहमद खान

#16jun 
#13feb 
अख़लाक़ मोहम्मद खान
16 जून 1936, आँवला
मृत्यु की जगह और तारीख: 13 फ़रवरी 2012, अलीगढ
किताबें: कहीं कुछ कम है, ख़्वाब का दर बन्द है · ज़्यादा देखें
बच्चे: हुमायुन शाहर्यर, फ़ारिडून शाहर्यर, साइमा शाहर्यर
माता-पिता: अबु मोहम्मद खान
दूसरे नाम: शहरयार

अखलाक मोहम्मद खान
🎂16 जून 1936
⚰️13 फरवरी 2012

जिसे उनके तखल्लुस शहरयार के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय शिक्षाविद और भारत में उर्दू शायरी के प्रमुख थे।  एक हिंदी फिल्म गीतकार के रूप में, उन्होने  मुजफ्फर अली द्वारा निर्देशित गमन (1978) और उमराव जान (1981) के गीत लिखे  वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए, और उसके बाद वे मुशायरों या काव्य सभाओं में भाग लेने लगे और साहित्यिक पत्रिका शेर-ओ-हिकमत का सह-संपादन भी किया।

उन्हें ख्वाब का दर बंद है (1987) के लिए उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, और 2008 में उन्होंने ज्ञानपीठ पुरस्कार, सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार और पुरस्कार जीतने वाले केवल चौथे उर्दू कवि थे।  उन्हें व्यापक रूप से आधुनिक उर्दू कविता के बेहतरीन प्रतिपादक के रूप में स्वीकार किया गया है।

शहरयार का जन्म 16 जून 1937 में आंवला, बरेली में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था  उनके पिता अबू मोहम्मद खान एक पुलिस अधिकारी थे, हालांकि परिवार उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के चौंधेरा गांव का रहने वाला था।अपने बचपन के दिनों में, शहरयार एक एथलीट बनना चाहते थे लेकिन उसके पिता चाहते थे कि वह पुलिस बल में शामिल हो वह घर से भाग गये और खलील-उर-रहमान आज़मी, प्रख्यात उर्दू आलोचक और कवि के सानिध्य में रहने लगे  जीविकोपार्जन के लिए, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू फिक्शन पढ़ाना शुरू किया, जहाँ वही से बाद में पढ़ाई की और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।  उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बुलंदशहर में प्राप्त की और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।

शहरयार ने अपने करियर की शुरुआत अंजुमन तरक्की-ए-उर्दू में एक साहित्यिक सहायक के रूप में की थी।  उसके बाद उन्होंने उर्दू में लेक्चरर के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे  उन्हें 1986 में प्रोफेसर नियुक्त किया गया था और 1996 में, वे उर्दू विभाग के अध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुए।  उन्होंने साहित्यिक पत्रिका शेर-ओ-हिकमत (कविता और दर्शन) का सह-संपादन किया

उनका पहला कविता संग्रह इस्म-ए-आज़म 1965 में प्रकाशित हुआ था, दूसरा संग्रह, सातवां दर (सत्व अभी तक अंग्रेजी में), 1969 में प्रकाशित हुआ था और तीसरा संग्रह हिज्र के मौसम 1978 में जारी किया गया था। उनका सबसे प्रसिद्ध काम, ख्वाब के  दर बंद है, 1987 में आया, जिसने उन्हें उस वर्ष के लिए उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी जीता।  इसके अलावा, उन्होंने अपनी कविता के पांच संग्रह उर्दू लिपि में प्रकाशित किए। 2008  में, वह फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री और क़ुर्रतुलैन हैदर के बाद ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतने वाले चौथे उर्दू लेखक बने

शहरयार ने अलीगढ़ से चुनिंदा फिल्मों के लिए गीत लिखे, जहां फिल्म निर्माताओं ने उनसे संपर्क किया।  मुजफ्फर अली और शहरयार अपने छात्र दिनों से दोस्त थे, और शहरयार ने उनके साथ कुछ ग़ज़लें साझा की थीं।  बाद में जब अली ने 1978 में गमन के साथ अपने निर्देशन की शुरुआत की, तो उन्होंने फिल्म में अपनी दो ग़ज़लों 'सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूं है' और 'अजीब सनेहा मुझ पर गुज़र गया यारों' का इस्तेमाल किया, और उन्हें अभी भी क्लासिक गीत माना जाता है।  फ़िल्म उमराव जान में लिखे उनके गीत, 'दिल चीज क्या है आप मेरी जान लिजिये', 'ये क्या जगह  है दोस्त', 'इन आंखों की मस्ती के' आदि  सभी ग़ज़लें बॉलीवुड की बेहतरीन गज़ले मानी जाती हैं  उन्होंने यश चोपड़ा की फासले (1985) के लिए भी लिखा, उसके बाद चोपड़ा ने उन्हें लिखने के लिए तीन और फिल्मों की पेशकश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया क्योंकि वह "गीत की दुकान" नहीं बनना चाहते थे। हालांकि उन्होंने मुजफ्फर अली की अंजुमन (1986) के लिए लिखा।  उन्होंने मुज़फ्फर अली की फ़िल्म ज़ूनी और दमन को अधूरा ही छोड़ दिया

फेफड़ों के कैंसर के कारण लंबी बीमारी के बाद, 13 फरवरी 2012 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में शहरयार का निधन हो गया।

सशहरयार के तीन बच्चे हुमायूं शहरयार,सायमा शहरयार एवं फरीदून शहरयार हैं

उनके कविता संग्रह, ख्वाब का दर बंद है (1987) के लिए उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया

2008 में ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतने वाले चौथे उर्दू लेखक  है

फिराक सम्मान

बहादुर शाह जफर पुरस्कार।

शहरयार की कृतियों पर चार थीसिस लिखी गई हैं।

शहरयार के तीन बच्चे हुमायूं शहरयार, साइमा शहरयार और फरीदून शहरयार हैं।

कुछ किताबे
इस्म-ए-आज़म , 1965.
सतवन दार , 1969.
हिज्र के मौसम , 1978.
ख़्वाब के डर बंद हैं , 1987.
नींद की रसोई - (अंग्रेजी: बिखरी हुई नींद के टुकड़े )।
बंद दरवाजे से: शहरयार की नज़्मों का संग्रह , अनुवाद: रख्शंदा जलील।
शहरयार, अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान: उर्दू आलोचना पर पश्चिमी आलोचना का प्रभाव , अलीगढ़।
धुंध की रोशनी

Wednesday, June 12, 2024

खयाम सरहदी पाकिस्तानी

#12jun 
#03feb 
खय्याम सरहदी (पाकिस्तानी)
🎂12 जून 1948
बम्बई , भारत
⚰️03 फरवरी 2011
 (आयु 62)
लाहौर , पंजाब , पाकिस्तान
राष्ट्रीयता
पाकिस्तानी
व्यवसाय
अभिनेता , टेलीविजन व्यक्तित्व , रेडियो व्यक्तित्व
जीवनसाथी
साइका (मृत्यु तक पत्नी)
अतिया शराफ (तलाकशुदा)
बच्चे
4 बेटियाँ
ज़रघुना ख़य्याम
अभिभावक)
ज़िया सरहदी (पिता)
ज़ाहिरा ग़ज़नवी (माता)
रिश्तेदार
झाले सरहदी (भतीजी)
पुरस्कार
1991 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा प्राइड ऑफ परफॉरमेंस अवार्ड

खय्याम सरहदी का जन्म 12 जून 1948 को बॉम्बे में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था , उनके माता-पिता जिया सरहदी और ज़ाहिरा ग़ज़नवी थे और वे वहीं पले-बढ़े। बाद में वे कराची , पाकिस्तान चले गए और कुछ समय तक वहाँ रहे और बाद में लाहौर , पाकिस्तान चले गए।

उनके नाना, रफ़ीक ग़ज़नवी , एक प्रसिद्ध संगीतकार थे और चूँकि उनके माता-पिता दोनों ही लेखक थे, इसलिए वे कम उम्र से ही शोबिज़ में शामिल हो गए थे। खय्याम ने संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की जहाँ उन्होंने सिनेमैटोग्राफी में मास्टर डिग्री प्राप्त की।उनके पास अंग्रेजी साहित्य और ललित कला में भी मास्टर डिग्री थी।
खय्याम सरहदी की शादी टीवी अभिनेत्री अतिया शराफ से हुई थी । बाद में दोनों का तलाक हो गया और उन्होंने फिल्म अभिनेत्री साइका से शादी कर ली । उनकी चार बेटियाँ थीं, एक अतिया से और तीन साइका से, उनकी एक बेटी का नाम ज़रघुना खय्याम है। सरहदी एक मशहूर फिल्म निर्देशक, निर्माता और लेखिका ज़िया सरहदी के बेटे थे और उनकी माँ ज़हरा सरहदी नाम की एक लेखिका थीं ।

वह एक मॉडल और अभिनेत्री झाले सरहदी के चाचा थे।

1970 के दशक में अपनी मां की मृत्यु के बाद खय्याम सरहदी पाकिस्तान लौट आए । पाकिस्तान में सरहदी ने अभिनय और थिएटर नाटकों के निर्देशन से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में पाकिस्तान टेलीविज़न कॉरपोरेशन (PTV) के साथ टीवी नाटकों में काम करना शुरू किया, जहाँ उन्हें जाने-माने PTV निर्माता यावर हयात खान ने देखा और चुना । तब से उन्होंने हज़ारों टीवी नाटकों में काम किया और उनमें से कुछ का निर्देशन भी किया। उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी काम किया। उनकी पटकथाएँ रोमन अक्षरों में लिखी जाती थीं क्योंकि वे उर्दू अच्छी तरह नहीं पढ़ पाते थे ।

खय्याम सरहदी की 3 फरवरी 2011 को लाहौर में एक टीवी ड्रामा सीरियल की शूटिंग के दौरान अचानक दिल का दौरा पड़ने से 62 साल की उम्र में मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार लाहौर के डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी स्थित उनके आवास पर किया गया ।

उनकी मृत्यु के बाद, अनुभवी पाकिस्तानी अभिनेता/निर्देशक जावेद शेख ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने उनके साथ काम किया था और सरहदी को एक बहुमुखी अभिनेता के रूप में याद करते हैं और उनके साथ काम करना मज़ेदार था
🎥
क़ुर्बानी (1981)
बोल (2011)
जिन्ना (1998) (सरदार अब्दुल रब निश्तर की भूमिका निभाई )
हुसैन का खून (1980)

Friday, June 7, 2024

राजिंदर नाथ

#08jun
#13feb
राजेंद्र नाथ
🎂08 जून 1931
टीकमगढ़ , ओरछा राज्य , ब्रिटिश भारत (वर्तमान मध्य प्रदेश , भारत )
⚰️13 फरवरी 2008
(आयु 76)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
1938–1998
के लिए जाना जाता है
कॉमेडी
रिश्तेदार
प्रेम नाथ (भाई)
नरेंद्र नाथ (भाई)
राज कपूर (बहनोई)
प्रेम चोपड़ा (बहनोई)
राजेंद्र नाथ का जन्म 8 जून 1931 को टीकमगढ़ में हुआ था, जो अब मध्य प्रदेश में है । उनका परिवार पेशावर के करीमपुरा इलाके से था , लेकिन मध्य प्रदेश के जबलपुर में बस गया। उन्होंने दरबार कॉलेज, रीवा में पढ़ाई की , जहाँ अर्जुन सिंह (एक कांग्रेसी राजनेता) और आरपी अग्रवाल उनके सहपाठी थे।

राजेंद्र के बड़े भाई प्रेम नाथ मुंबई चले गए और अभिनेता बन गए, इसलिए राजेंद्र 1949 में उनके साथ जुड़ गए। वे राज कपूर और शशि कपूर के अच्छे दोस्त थे । राजेंद्र और प्रेम की बहन कृष्णा ने अभिनेता-निर्देशक राज कपूर से शादी की । उनके एक और भाई नरेंद्र नाथ भी थे जो एक अभिनेता बन गए, जिन्होंने आमतौर पर फिल्मों में कुछ खलनायक की भूमिका निभाई।

राजेंद्र को पढ़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और अपने भाई की तरह फिल्मों में काम करने के लिए मुंबई चले गए। उन्होंने पृथ्वी थिएटर में पठान और शकुंतला जैसे कुछ नाटक किए। यहीं पर उनकी शम्मी कपूर से नजदीकियां बढ़ीं।
शुरुआत में राजेंद्र को भूमिकाएं पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, जब तक कि शशधर मुखर्जी ने उन्हें नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित फिल्म दिल देके देखो में एक हास्य अभिनेता की भूमिका की पेशकश नहीं की , जिसमें शम्मी कपूर और आशा पारेख मुख्य भूमिका में थे । राजेंद्र नाथ और आशा पारेख नासिर हुसैन की कई फिल्मों में नियमित रूप से नजर आए, जैसे फिर वही दिल लाया हूं , जब प्यार किसी से होता है , बहारों के सपने और प्यार का मौसम । उन्होंने हमराही में शशिकला के साथ खलनायक की भूमिका भी निभाई थी, जिसके किरदार को वह मार देते हैं। उन्होंने 187 फिल्में की हैं। वह सबसे प्रसिद्ध हास्य कलाकारों में से एक थे। हास्य अभिनेता के रूप में उनकी सर्वश्रेष्ठ भूमिकाएं मेरे सनम और फिर वही दिल लाया हूं में थीं । उन्होंने "वचन" और " तीन बहुरानियाँ " में हीरो/सेकंड लीड की भूमिका भी निभाई । उन्होंने देवेन्द्र गोयल की धरकन और राजश्री प्रोडक्शंस की जीवन मृत्यु जैसी फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं । उन्होंने 'जब प्यार किसी से होता है' में पोपटलाल नामक एक विदूषक की भूमिका निभाई थी और तब से यह नाम राजेंद्र नाथ का पर्याय बन गया। उन्होंने मशहूर टीवी सीरियल ' हम पांच' में इस नाम का इस्तेमाल किया था ।

इसके बाद उन्होंने कई फ़िल्में कीं, जिनमें से ज़्यादातर कॉमिक रोल में थीं, जैसे कि एन इवनिंग इन पेरिस और फिर वही दिल लाया हूँ । मनोज कुमार की फ़िल्म पूरब और पश्चिम में उनकी सबसे ज़्यादा सराही गई भूमिकाएँ थीं, हालाँकि यह पूरी तरह से कॉमेडी रोल नहीं था। उन्होंने नेपाल की पहली फ़िल्म मैतीघर में भी योगदान दिया , जिसकी शूटिंग काठमांडू , नेपाल में हुई थी ।

उन्होंने जट्ट पंजाबी और "दो पोस्ती" जैसी कई पंजाबी फिल्मों में अभिनय किया ।

13 फरवरी 2008 को हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई।
🎥
1959 दिल देके देखो
1961 जब प्यार किसी से होता है
1963 तेरे घर के सामने
1963 फिर वही दिल लाया हूँ
1964 राजकुमार
1965 मेरे सनम प्यारे
1965 जानवर
1966 मैतीघर। (नेपाली फिल्म विशेष उपस्थिति)
1967
बहारों के सपने
पेरिस में एक शाम
परिवार
1968
तीन बहुरानियाँ
झुक गया आसमान
1969
प्यार का मौसम
बेटी
राजा साब
राजकुमार
1970
महाराजा
जीवन मृत्यु
पूरब और पश्चिम
आन मिलो सजना
रेल गाड़ी
तुम हसीन मैं जवां
1971
हरे राम हरे कृष्ण
मैं सुन्दर हूँ
1972 धरकन
1973 कहानी किस्मत की
1974
हमराही
पत्थर और पायल
1975 जूली
1976 छोटी सी बात
1976 चढ़ी जवानी बुड्ढे नू (पंजाबी फिल्म)
1978 गिद्दा (पंजाबी फिल्म)
1979
बदमाशों का बदमाश 
बापू
1980 जलती हुई ट्रेन
1980 गेस्ट हाउस
1981
होटल
मंगलसूत्र
बीवी-ओ-बीवी
1982
ताक़त 
प्रेम रोग
1983 मैं आवारा हूँ
1984
घर एक मंडी (बोली के दौरान उद्घोषक )
मेरा फैसला
यादगार
फुलवारी
1985 बादल
1986
सस्ती दुल्हन महेंगा दूल्हा
घर संसार
1987
डाक बांग्ला
हुकुमत
1988
प्यार का मंदिर
वीराना
1989
मैं तेरा दुश्मन
एलान-ए-जंग
सिंदूर और बंदूक 
दूसरा केवल
1990
नाग नागिन
प्यार का कर्ज
1991
फरिश्ते
अजूबा
1992
तहलका
बोल राधा बोल
1994
एक्का राजा रानी
ईना मीना डीका
1995 ताक़त
1995-2006 हम पाँच

Wednesday, June 5, 2024

वेदप्रकाश शर्मा

#10jun 
#17feb 
वेद प्रकाश शर्मा
🎂10 जून 1955, मेरठ
⚰️ 17 फ़रवरी 2017

किताबें: वर्दी वाला गुंडा, कानून का बेटा, वर्दी वाला गुण्डा · ज़्यादा देखें
पत्नी: मधु शर्मा (विवा. ?–2017)
बच्चे: शगन शर्मा
माता-पिता: मिश्रीलाल शर्मा
वेद प्रकाश शर्मा हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार एवं फ़िल्म पटकथा लेखक थे। इन्होंने सस्ते और लोकप्रिय उपन्यासों की रचना की है। 'वर्दी वाला गुंडा' वेद प्रकाश शर्मा का सफलतम थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की लगभग 8 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। भारत में जनसाधारण में लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में यह उपन्यास "क्लासिक" का दर्जा रखता है।

वेदप्रकाश शर्मा का जन्म 10 जून 1955 को हुआ था। उन्हें किशोरावस्था से ही पुस्तकें पढ़ने और लिखने का शौक था। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही उन्होंने उपन्यास लेखन शुरू कर दिया था। कुछ ही दिन में वह पाठकों के पसंदीदा लेखक हो गए थे। वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था। उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई। बात 1972 की है। हाईस्कूल की परीक्षा देकर वह गर्मी की छुट्टियों में अपने पैतृक गांव बिहरा (बुलंदशहर) गए थे। उपन्यास के शौकीन वेदप्रकाश अपने साथ दर्जन भर से अधिक किताबें ले गए थे। कुछ ही दिन में उन्होंने सारी किताबें पढ़ डालीं। समय व्यतीत करने के लिए उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। पिता को यह बात पता चली, तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। बाद में पिता ने पढ़ा तो उनके दिल को बेटे की लेखन शैली छू गई। उन्होेंने 250 से अधिक उपन्यास लिखे। उनके लिखे उपन्यास बेहद प्रेरणादायक और उद्देश्य परक होते थे। वर्ष-1993 में उनके उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा' ने उन्हें देशभर में काफ़ी शोहरत दिलाई थी, जिसकी आठ करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। बॉलीवुड में भी उनके लेखन के जलवे थे। उनके परिवार में पत्नी मधु शर्मा के अलावा बेटा शगुन और तीन बेटियां हैं।

फ़िल्म पटकथा लेखन

फिल्म 'अनाम' (1993) की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी। इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था। इसके बाद रिलीज हुई फिल्म 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' (1995) उनके उपन्यास 'लल्लू' पर आधारित थी। इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 1999 को रिलीज हुई थी। इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'केशव पंडित' पर वर्ष 2010 में टीवी सीरियल भी बना। यह भी दर्शकों में खूब चर्चित हुआ। 'बहू मांगे इंसाफ' पर शशिलाल नायर के निर्देशन में 'बहू की आवाज' फिल्म बनी। एक बार मेरठ आए सुपरस्टार आमिर खान की जब उनसे मुलाकात हुई थी, तो उन्होंने एक फिल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का आग्रह किया था और वेद प्रकाश उस पर काम कर रहे थे। उनके उपन्यास छोटे पर्दे पर सीरियल के रूप में भी सामने आए।

प्रसिद्धि

राजनीतिक के अलावा पुलिस और प्रशासनिक अफसरों में उनके नाम की खूब चर्चा होती थी। आम आदमी की भाषा में लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा देश के बड़े लेखक में शुमार हुए। उनसे जुड़े लोगों के मुताबिक़, एक बार वह बेगमपुल पर घूम रहे थे। तभी वर्दी में एक दरोगा पहुंचते हैं। वह कुछ लोगों पर ऐसे डंडे बरसाते हैं, जैसे बदमाशों को पीट रहे हों। वेद प्रकाश शर्मा वर्दी वाले उस दरोगा को देखते हैं। बाद में उनके मन में जो विचार पनपा, उसी ने उन्हें बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया। वर्दी वाला गुंडा उपन्यास में उनके द्वारा लिखी गई घटना को पढ़कर आज भी पुलिस अफसर सीख लेते हैं। वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का पाठकों को लंबा इंतजार रहता था। मूवी टिकट की तरह ही शहर के कई बुक स्टॉल पर उनके उपन्यासों की एडवांस बुकिंग होती थी। वर्ष-1993 में प्रकाशित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की पहले ही दिन देशभर में 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं। शहर के सभी बुक स्टॉल पर कुछ ही घंटों में उपन्यास की प्रतियां समाप्त हो चुकी थीं। बुकिंग कराने वाले कई लोगों को उपन्यास नहीं मिलने से निराशा हाथ लगी थी।

चर्चित उपन्यास

वेद प्रकाश शर्मा ने वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफ़न तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 250 से अधिक उपन्यास लिखे हैं।

सम्मान एवं पुरस्कार

वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष 1992 व 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड, वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष 2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले।

निधन

वर्दी वाला गुंडा जैसे चर्चित उपन्यासों के जरिये पाठकों के दिलों पर राज करने वाले प्रख्यात उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन 17 फ़रवरी, 2017 शुक्रवार को रात करीब 11:50 बजे अपने शास्त्रीनगर स्थित आवास पर हो गया।

Monday, June 3, 2024

नूतन

#04jun 
#21feb 
नूतन
तारीख 04 जून 1936, 
मुम्बई
मृत्यु  21 फ़रवरी 1991,
 ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल ट्रस्ट, मुम्बई
पति: रजनीश बहल (विवा. 1959–1991)
बच्चे: मोहनीश बहल
माता-पिता: शोभना समर्थ, कुमारसेन समर्थ
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री
1956 सीमा
1960 सुजाता
1964 बंदिनी
1968 मिलन
1979 मैं तुलसी तेरे आँगन की
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री
1986 मेरी जंग
हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। नूतन के सौन्दर्य को मिस इंडिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला थीं। नूतन ने 50 से भी अधिक फ़िल्मों में काम किया और उन्हे बहुत से अन्य पुरस्कारों के अलावा 6 बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला (जिसकी बराबरी उनकी भतीजी काजोल ने की है)।
नूतन का जन्म 04 जून 1936 को एक पढे-लिखे और सभ्रांत परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती शोभना समर्थ और पिता का नाम श्री कुमारसेन समर्थ था। नूतन ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत1950 में की थी जब वह स्कूल में ही पढ़ती थीं।

 11अक्टूबर 1959को नूतन ने लेफ़्टिनेंट कमांडर रजनीश बहल से विवाह कर लिया।नूतन के पुत्र मोहनीश बहल भी हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय करते हैं। नूतन की बहन तनुजा और भतीजी काजोल भी हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में शामिल हैं। नूतन के अभिनय को हिन्दी फ़िल्म उद्दोग के सभी बडे नामों ने सराहा है और वह आज भी बहुत सी अदाकाराओं का आदर्श बनी हुई हैं।

नूतन का देहांत फरवरी 1991 को कर्क रोग के कारण हुआ।
🎥
1950 हमारी बेटी 
1951
 नगीना 
हम लॉग 
1952 
शीशम 
पर्वत 
1953
 लैला मजनू 
आघोष
मॉल्किन 
1954 शबाब 
1955 सीमा
1956 हीर
1957 
बारिश 
सशुल्क अतिथि 
जिंदगी या तूफान
1958 
चंदन 
दिल्ली का ठग
कभी अँधेरा कभी उजाला 
सोने की चिड़िया 
आखिरी दाओ 
लाइट हाउस
1959 
अनाड़ी आरती 
कन्हैया 
सुजाता
1960 
बसंत 
छबीली 
छलिया
मंज़िल
1962 सूरत और सीरत
1963 
बंदिनी
दिल ही तो है 
तेरे घर के सामने
1964 चांदी की दीवार
1965
 खानदान
रिश्ते नाते
1966 
छोटा भाई
दिल ने फिर याद किया
1967 
दुल्हन एक रात की
लाट साहब 
मिलन 
मेहरबान
मेरा मुन्ना
1968 
गौरी 
सरस्वतीचंद्र
1969 भाई बहन
1970 
माँ और ममता 
देवी 
महाराजा
यादगार
1971 
डूबा हुआ जहाज़
ग्रहण 
मंगेतर
1973 सौदागर
1975 जोगीदास खुमान 
1976 ज़िद
1977 
मंदिर मस्जिद 
जागृति 
दुनियादारी
पारध
1978 
एक बाप छे बेटे
मै तुलसी तेरे आंगन की
साजन बिना सुहागन
हमारा संसार
1980 
कस्तूरी 
सांझ की बेला
1981 साजन की सहेली
1982 
तेरी मांग सितारों से भर दूं कामिनी 
जियो और जीने दो
1983 रिश्ता कागज़ का
1985 
युद्ध 
पैसा ये पैसा
मेरी जंग
ये कैसा फ़र्ज़ 
प्यारी भाभी
1986 
सजना साथ निभाना 
कर्मा
का नाम ले 
रिकी
1987 हिफाज़त
1988 सोने पे सुहागा
1989 
मुजरिम 
कानून अपना अपना
गुरु
1990 औलाद की खातिर 
1991 गराजना
1992
नसीबवाला 
दीवाना आशिक
1994 इंसानियत

दिवंगत "जीया खान" का जन्मदिन

#20feb
#03jun
जीया खान
🎂 20 फ़रवरी 1988,
न्यू यॉर्क, न्यू यॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका
⚰️03 जून 2013,
जुहू, मुम्बई
माता-पिता: राबिया अमिन, अली रिज़वी खान
बहन: करिश्मा ख़ान, कविता ख़ान
साथी सूरज पंचोली (2012–2013)
मौत: 3 जून 2013 (उम्र 25); जुहू, मुम्बई

जिन्हें जिया खान के नाम से बेहतर जाना जाता है , एक अंग्रेजी-अमेरिकी अभिनेत्री और गायिका थीं, जिन्होंने भारतीय फ़िल्मों में काम किया। वह 2007 से 2010 तक तीन हिंदी फ़िल्मों में नज़र आईं।
भारतीय माता-पिता के घर न्यूयॉर्क शहर में जन्मी, उनकी परवरिश और शिक्षा लंदन में हुई। खान ने अभिनय में अपना करियर बनाने की ख्वाहिश जताई और फिल्मी करियर के लिए मुंबई चली गईं । उन्होंने 2007 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म निशब्द से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की , जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला पदार्पण के लिए फिल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। बाद में उन्हें गजनी में एक आधुनिक, स्वतंत्र महिला की सहायक भूमिका निभाने के लिए जाना गया , जो 2008 की सबसे अधिक कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्म थी। दो साल की अनुपस्थिति के बाद, उन्हें रोमांटिक कॉमेडी हाउसफुल में उनकी कॉमिक भूमिका के लिए सराहा गया , जो 2010 की पांचवीं सबसे अधिक कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्म थी।

वह जुहू , मुंबई में अपने पारिवारिक निवास के बेडरूम में छत के पंखे से लटकी हुई पाई गई थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने पूरी जांच की और माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय में उसकी कहानी सुनी जिसने उसकी मौत को आत्महत्या के रूप में निष्कर्ष निकाला। खान की माँ ने दावा करना जारी रखा कि खान की हत्या उसके प्रेमी, अभिनेता सोराज पंचोली ने की थी, जिसके कारण अभियोजन पक्ष ने 2017 में हत्या और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने का असफल प्रयास किया। 2018 में, मुंबई की एक अदालत ने पंचोली पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया।
नफीसा खान का जन्म 20 फरवरी 1988  को न्यूयॉर्क शहर, संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ था, उनके पिता अली रिजवी खान, एक अमेरिकी व्यवसायी और राबिया अमीन, 1980 के दशक में आगरा , उत्तर प्रदेश की एक हिंदी फिल्म अभिनेत्री थीं।जब वह 2 साल की थीं, तब उनके पिता ने परिवार छोड़ दिया था। उनकी दो छोटी बहनें कविता और करिश्मा हैं।  उनकी मौसी पाकिस्तानी अभिनेत्रियाँ हिना रिज़वी , संगीता (परवीन रिज़वी) और कविता (नसरीन रिज़वी) हैं।

खान लंदन में पली-बढ़ीं  जहाँ उन्होंने बॉलीवुड में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई जाने से पहले अपना एडेक्सेल ओ लेवल और ए लेवल पाँच ए के साथ पूरा किया । वह छह साल की उम्र में राम गोपाल वर्मा की पूर्व शिष्या उर्मिला मातोंडकर की फिल्म रंगीला देखने के बाद बॉलीवुड में प्रवेश करने के लिए प्रेरित हुईं।

खान ने मैनहट्टन में ली स्ट्रैसबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट में अध्ययन किया , और उन्होंने एक फिल्म की पेशकश मिलने पर पढ़ाई छोड़ दी।  उन्होंने बेली डांसिंग, कथक, लंबाडा, जैज़, सांबा और रेगे सहित विभिन्न नृत्य रूपों को सीखा।
⚰️खान की कथित तौर पर मुंबई के जुहू स्थित उनके आवास पर रात 11:00 से 11:30 बजे के बीच फांसी लगाने से मौत हो गई । उस समय उनकी माँ और बहन घर पर नहीं थीं।
खान के साथ रहने वाले पंचोली को 10 जून 2013 को उनकी आत्महत्या की जांच के दौरान पुलिस हिरासत में लिया गया था।
क्यों कि अपने सुसाइड नोट में जिया ने उल्लेख किया कि सोराज हर समय उनका शारीरिक शोषण और उत्पीड़न करता था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें 2जुलाई 2013को ज़मानत दे दी।  उनकी मृत्यु के एक साल बाद 3 जुलाई 2014 को, केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को उच्च न्यायालय ने मौत की आगे की जाँच करने का आदेश दिया।
31 जनवरी 2018 को मुंबई की एक अदालत ने पंचोली पर खान को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया। सीबीआई ने खान की मां राबिया, शिकायतकर्ता सहित 69 गवाहों की एक सूची प्रस्तुत की, जिसमें मार्च 2018 में मामला शुरू होना था।  अप्रैल 2023 में, सीबीआई की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में पंचोली को बरी कर दिया।
🎥
2007 निशब्द
2008 गजनी
2010 हाउसफुल

करण सिंह ग्रोवर

करन सिंह ग्रोवर 🎂जन्म की तारीख और समय: 23 फ़रवरी 1982 , नई दिल्ली पत्नी: बिपाशा बसु (विवा. 2016), जेनिफर विंगेट (विवा. 2012–2014), करन सिंह...