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Wednesday, February 26, 2025

रागनी (मृत्यु)

रागिनी 🎂11 दिसंबर 1923⚰️ 27 फरवरी 2007

भारतीय और पाकिस्तानी सिनेमा की भूली-बिसरी अभिनेत्री रागिनी को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

रागिनी या रागिनी (11 दिसंबर 1923 - 27 फरवरी 2007) भारतीय सिनेमा और बाद में पाकिस्तानी सिनेमा की एक अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी/उर्दू और पंजाबी फिल्मों में काम किया। रागिनी को अपने समय की सबसे ज़्यादा पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री कहा जाता है, उन्हें "शाहजहाँ" (1946) में उनकी भूमिका के लिए ए.आर. कारदार ने एक लाख रुपये का भुगतान किया था। अपनी खूबसूरत हिरणी जैसी आँखों के लिए जानी जाने वाली रागिनी को 'आहू चस्म' के नाम से भी जाना जाता था। 

रागिनी का जन्म शमशाद बेगम के रूप में वर्ष 1923 में गुजरांवाला अविभाजित भारत (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। जब रागिनी बहुत छोटी थीं, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई और उनके पिता सेठ दीवान परमानंद उन्हें अपने साथ लाहौर ले गए।  लाहौर में फिल्म निर्माता रोशन लाल शौरी ने उन्हें देखा और दीवान को रागिनी को फिल्मों में लॉन्च करने के लिए राजी किया।

रागिनी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म "दुल्ला भट्टी" (1940) से की, जिसमें उनके साथ एम. डी. कंवर थे। यह फिल्म एक बड़ी सफलता थी और रागिनी रातों-रात स्टार बन गईं। रागिनी ने लाहौर में हिंदी और पंजाबी में कई प्रोडक्शन में काम किया, जैसे सेहती मुराद (1941), निशानी (1942), रवि पर (1942), पूंजी (1943), दासी (1944) और कैसे कहूं (1945)।

नेक परवीन (1946) एक और सफल फिल्म थी जिसने रागिनी की स्थिति को एक शीर्ष स्टार के रूप में मजबूत किया। फिल्म निर्माता एआर कारदार ने रागिनी को मुमताज महल शाहजहां (1946) की भूमिका निभाने की पेशकश की, ऐसा कहा जाता है कि रागिनी को इस फिल्म के लिए एक लाख रुपये का भुगतान किया गया था, जिससे वह उस समय की सबसे अधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्री बन गईं।  विभाजन के बाद रागिनी ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने कुछ भारतीय फिल्में भी कीं, जो सफल नहीं रहीं।

रागिनी की हिरण जैसी आंखें उनकी सबसे बड़ी खूबी थीं। लाहौर के भाटी गेट पर लगी सेहती मुराद की फिल्म के पोस्टर पर उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी और नीचे कैप्शन लिखा था: “जब ये आंखें खुलेंगी तो क्या होगा?” उनकी अन्य फिल्मों में शिरीन फरहाद (1945) का विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने जयंत के फरहाद के सामने शिरीन का किरदार निभाया था।

50 के दशक के आखिर में रागिनी ने खुद को सहायक भूमिकाएं निभाते हुए पाया, मुख्य नायिका के तौर पर उनके दिन पीछे छूट गए। फिर भी उन्होंने बेदारी (1957) में रतन कुमार की मां की भूमिका निभाई और अनारकली (1958) में नूरजहां की अनारकली की प्रतिद्वंद्वी दिल आराम की भूमिका निभाई।  इसके बाद उन्होंने हुस्न-ए-इश्क (1962), नैला (1965), साज़-ओ-आवाज़ (1965), सैक़ा (1968) और पाक दमन (1969) जैसी फ़िल्मों में चरित्र भूमिकाएँ निभाईं। उनकी आखिरी फ़िल्म पश्तो फ़िल्म आब-ए-हयात (1983) थी।

रागिनी ने 1940 के दशक की शुरुआत में मोहम्मद असलम से शादी की, यह शादी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली लेकिन उनकी पहली शादी से उनके दो बच्चे हुए, सायरा और आबिद। उन्होंने 1947 में पाकिस्तान में फिर से एस. गुल से शादी की, जिन्होंने "बेक़रार" फ़िल्म का निर्माण और सह-अभिनय किया। रागिनी ने अपने जीवन के अंतिम दिन अकेले और उपेक्षित गुलबर्ग में बिताए।

रागिनी उर्फ़ शमशाद बेगम का 27 फ़रवरी 2007 को लाहौर (पाकिस्तान) में निधन हो गया।

 🎬रागिनी की फिल्मोग्राफी -
 ● भारत में -
 1941 हिम्मत
 1942 निशानी
 1943 पूंजी
 1944 दासी
 1945 शिरीन फरहाद, धमकी और नेक पर्विन
 1946 बिंदिया और शाहजहाँ
 1947 मनमानी और फ़र्ज़
 1952 चक्कर और इंसान 

 ● पाकिस्तान में -
 1949 मुंदरी
 1950 बेकरार और कुन्दन
 1951 अकेली
 1953 गुलाम
 1954 गुमनाम
 1955 नौकर, शर्रे, नज़राना और इल्तिजा
 1957 बेदारी
 1958 बहार, अनारकली और मुमताज
 1964 गेहरा दाग़
 1965 नैला
 1970 सय्यान
 1971 ऊंचा ना प्यार दा और सुल्तान
 1973 फ़र्ज़  
1983 आब-ए-हयात 

करण सिंह ग्रोवर

करन सिंह ग्रोवर 🎂जन्म की तारीख और समय: 23 फ़रवरी 1982 , नई दिल्ली पत्नी: बिपाशा बसु (विवा. 2016), जेनिफर विंगेट (विवा. 2012–2014), करन सिंह...