एस मोहिंदर 🎂24 फरवरी 1925
एस मोहिंदर
🎂जन्म24 फरवरी 1925⚰️06 सितंबर 2020
सरगोधा जिला , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत06 सितंबर 2020 (आयु 95 वर्ष)
पेशा फ़िल्म संगीतकार
पुरस्कार
वर्ष के 'सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (1969)
उनका जन्म 1925 में सरगोधा जिले के सिलानवाली तहसील में हुआ था । मोहिंदर के पिता बख्शी सुजान सिंह पुलिस बल में सब-इंस्पेक्टर थे। बाद में उनके पिता ने भी साहीवाल (पुराना नाम मोंटगोमरी क्षेत्र) में सेवा की। वह साहीवाल में उस समय के एक प्रसिद्ध संगीतकार पंडित रतन मूर्ति के छात्र थे, जो बाबे वाला चौक पर रहते थे।
उनके पिता बख्शी सुजान सिंह का स्थानांतरण हो गया और परिवार तुलनात्मक रूप से बड़े शहर लायलपुर , ब्रिटिश भारत अब फैसलाबाद , पाकिस्तान में चला गया, जहां 1930 के दशक में युवा मोहिंदर ने एक कुशल सिख धार्मिक गायक संत सुजान सिंह के साथ प्रशिक्षुता शुरू की।
उन्होंने संत सुजान सिंह के संरक्षण में कई वर्षों तक शास्त्रीय संगीत के अनुरूप अपने कौशल को निखारा। प्रारंभ में, उन्होंने गायक बनने का प्रयास किया। बाद में, उनका परिवार सिख धर्म के संस्थापक ( गुरु नानक ) के जन्मस्थान ननकाना साहिब के करीब, शेखूपुरा (अब पाकिस्तान में) चला गया।
बाद में उन्होंने सिख धार्मिक संगीतकार भाई समुंद सिंह से शास्त्रीय संगीत में आगे का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके पिता के बार-बार स्थानांतरण से परिवार चलता रहा। चूंकि मोहिंदर की शिक्षा प्रभावित हुई, इसलिए उनके पिता ने उन्हें 1940 के दशक में अमृतसर के कैरों गांव में खालसा हाई स्कूल में दाखिला दिलाया । एस. मोहिंदर उर्दू और पंजाबी दोनों भाषाओं में पारंगत थे। उन्हें हिंदी भाषा सीखने में कुछ समय लगा।
1947 में, उनका बाकी परिवार भारत में पूर्वी पंजाब चला गया । शास्त्रीय संगीत के प्रति प्रेम एस. मोहिंदर को भारतीय शास्त्रीय संगीत के मक्का कहे जाने वाले बनारस ले आया। कुछ वर्षों की तैयारी के बाद, एस. मोहिंदर फिल्म उद्योग के केंद्र मुंबई चले गए। उनकी पहली सफल फिल्म नीली (1950) थी, जो म्यूजिकल हिट थी लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
मोहिंदर सिंह अंततः फिल्मिस्तान स्टूडियो में संगीत निर्देशक बनने में कामयाब रहे , जो उस समय फिल्में बना रहा था। उन्होंने लगभग आधे दशक तक उनके लिए संगीत तैयार किया। 1980 के दशक की शुरुआत में, वह अमेरिका चले गए और 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिए अक्सर स्थानीय संगीत प्रेमियों के साथ बैठकों में भाग लेते थे। वह 2013 में मुंबई, भारत लौट आए।
उनकी बेटी नरेन चोपड़ा के अनुसार, उनके करियर के विकास में सुरैया , फिल्म निर्माता और निर्देशक के. आसिफ , एस. मुखर्जी और मधुबाला ने मदद की थी । उनकी बेटी ने यह भी कहा कि वह मधुबाला के परिवार और पृथ्वीराज कपूर के करीबी थे ।
06 सितंबर, 2020 को 95 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया
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अप्रकाशित फ़िल्में - गीत और आँसू (1940), दो दोस्त (1950), माँ दी गोध (पंजाबी), 1970
सेहरा (1948)
जीवन साथी (1949)
नीली (1950)
श्रीमती जी (1952) - संगीत और पृष्ठभूमि संगीत भी
वीर अर्जुन (1952)
बहादुर (1953)
पापी (1953)
नाता (1955)
अलादीन का बेटा (1955)
सौ का नोट (1955)
शहजादा (1955)
सुल्तान-ए-आलम (1956)
शिरीन फरहाद (1956)
कारवां (1956)
पाताल परी (1957)
सुन तो ले हसीना (1958)
नया पैसा (1958)
ख़ूबसूरत धोखा (1959)
परदेसी ढोला (1959) (निर्माता और संगीत निर्देशक के रूप में पंजाबी फिल्म)
भगवान और शैतान (1959)
दो दोस्त (1960)
एक लड़की सात लड़के (1961 विनोद के साथ )
ज़मीन के तारे (1960)
महलों के ख्वाब (1960)
जय भवानी (1961)
बांके सांवरिया (1962)
रिपोर्टर राजू (1962)
ज़राक खान (1963)
कैप्टन शेरू (1963)
सरफरोश (1964)
बेखबर (1965)
सुनहरे कदम (1966)
प्रोफेसर-एक्स (1966)
पिकनिक (1966)
नानक नाम जहाज है (1969) (उन्होंने इस पंजाबी भाषा की फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता )
मन जीते जग जीत (1973) (पंजाबी फिल्म)
दुख भंजन तेरा नाम (1974) पंजाबी फिल्म
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड 1
एल्बम में विभिन्न कलाकारों को 10 ट्रैक मिले (1975)
शबद गुरबानी (1975) गायक कंवल सिद्धू का निजी एल्बम
सीस गंज (1975) गुरु तेग बहादुर - हिंद दी चादर) महेंद्र कपूर, मन्ना डे, एस. मोहिंदर, रागी तिरलोचन ग्रेवाल के साथ निजी एल्बम
तेरी मेरी इक जिंदरी (1975)
पापी तारे अनेक (1976) पंजाबी फिल्म
सैंटो बंटो (1976) पंजाबी फिल्म
लाडली (1978) पंजाबी फिल्म
सुखी परिवार (1979) पंजाबी फिल्म
फौजी चाचा (1980) पंजाबी फिल्म
दहेज (1981) पंजाबी फिल्म
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड। मोहम्मद रफ़ी , नीलम साहनी के साथ 2 निजी एल्बम
सारेगामा पर लेबल 06 जनवरी, (1985) को रिलीज़ हो रहा है
संदली (1985)
मौला जट्ट (1990) (पंजाबी फिल्म)
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Sunday, February 23, 2025
नक्श लायलपुरि (जन्म)
नक्श लायलपुरी⚰️22 जनवरी 2017 🎂24 फ़रवरी 1928
बचपन का नाम
जसवंत राय शर्मा
24 फ़रवरी 1928
लायलपुर (वर्तमान में फैसलाबाद), ब्रिटिश भारत
मौत
22 जनवरी 2017 (उम्र 88 वर्ष)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
आवास
मुंबई
पेशा
गीतकार
कार्यकाल
1953–2007
महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी
🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017
पंजाब के लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा में 24 फरवरी, 1928 को जन्मे लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-
कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में
भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-
हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर
नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-
मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं
ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–
ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है।नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-
ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी
गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।
इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा-
माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं
हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-
बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
कुछ प्रसिद्ध गीत
धानी चुनर मोरी हाए रे
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
कई सदियों से कई जन्मों से
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे
ये मुलाक़ात इक बहाना है
क़दर तूने ना जानी
चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है
चिट्ठिए
तुम्हें हो न हो मुझको तो
प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा
सीने में भी तूफ़ां है
न जाने क्या हुआ,जो तूने छू दिया
तुझ संग प्रीत लगाई सजना
नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं
जिंदगी की न टूटे लड़ी,प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती
नसीम बानो (पाकिस्तानी गायिका)
#29sep #24feb
नसीम बेगम
🎂24 फरवरी 1936
अमृतसर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत29 सितम्बर 1971 (आयु 35 वर्ष)
लाहौर , पाकिस्तान
राष्ट्रीयता पाकिस्तानी
अन्य नामों
द ट्रेजेडी क्वीन
पेशा
पार्श्वगायक
सक्रिय वर्ष
1956 – 1971
जीवनसाथी
दीन मोहम्मद (पति)
बच्चे
6
पुरस्कार
निगार पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका (1960), (1961), (1963) और (1964) में
1950 के दशक के अंत में वह प्रमुखता से उभरीं और 1964 तक, उन्होंने चार मौकों पर प्रतिष्ठित निगार पुरस्कार जीते थे। मूल रूप से दूसरी नूरजहां के रूप में पहचाने जाने के बावजूद , नसीम बेगम ने जल्दी ही पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में अपनी सफल जगह बना ली ।
वह लोकप्रिय गीत "ऐ रहे हक के शहीदो" की मूल गायिका थीं।
नसीम ने लाहौर में दीन मोहम्मद नाम के एक पुस्तक प्रकाशक से शादी की और उनके पांच बच्चे थे लेकिन उनके छह सबसे छोटे बेटे की गर्भावस्था की जटिलताओं के दौरान मृत्यु हो गई।
उसे प्रसव पीड़ा हो रही थी और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, क्योंकि वह गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी। हालांकि, गर्भावस्था से संबंधित जटिलताओं के कारण और उन्हें मस्तिष्क रक्तस्राव का सामना करना पड़ा, 29 सितंबर 1971 को 35 वर्ष की आयु में लाहौर , पाकिस्तान में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें लाहौर के मियां साहिब कब्रिस्तान में दफनाया गया।
नसीम बेगम ने कई देशभक्ति गीत भी गाए थे जो श्रोताओं की आत्मा को झकझोर देने वाले थे। "ऐ रह-ए-हक के शहीदो वफ़ा की तसवीरो, तुम्हें वतन की हवाएं सलाम करती हैं", मुशीर काज़मी ने ऐ राह-ए-हक के शहीदो के गीत लिखे जबकि संगीत मियां शहरयार ने दिया था और गायक नसीम बेगम थीं। 1965 में रेडियो पाकिस्तान रिकॉर्डिंग के लिए ।अधिकांश श्रोता अभी भी गलत मानते हैं कि ऐ राह-ए-हक के शहीदो को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने गाया था ।बाद में 1966 में, अनुभवी पाकिस्तानी फिल्म निर्माता/निर्देशक सैफुद्दीन सैफ ने इस गीत का उपयोग अपनी फिल्म मादर-ए-वतन (1966) में किया, जिसमें इस गीत का संगीत सलीम इकबाल द्वारा व्यवस्थित किया गया था।
📽️
कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में जिनके लिए नसीम बेगम ने कुछ दिल छू लेने वाले गीत गाए:
गुड्डी गुड्डा (1956)
करतार सिंह (1959)
सलमा (1960)
शाम ढले (1960)
सहेली (1960)
घुंघट (1962)
शहीद (1962)
औलाद (1962)
बाजी (1963)
दुल्हन (1963)
इक तेरा सहारा (1963)
हवेली (1964)
बेटी (1964)
फरंगी (1964)
कनीज़ (1965)
आग का दरिया (1966)
मादर-ए-वतन (1966)
पायल की झंकार (1966)
शहंशा-ए-जहाँगीर (1968)
ज़र्का (1969)
इन फिल्मों के अलावा, उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों के लिए भी गाना गाया, जिनमें से कुछ हैं तीस मार खां (1963),
जीदार (1965),
मुखरा चन्न वर्गा और जेंटर मैन (1969)।
उनके खाते में कुछ बड़ी संगीतमय फिल्में हैं लुटेरा (1964),
कौन किसी का, कौसर , छन्न पुत्तर (1970),
मेरा वीर (1967),
छन्न वीर (1969),
लंगोटिया और ये रास्ते हैं प्यार के ।
नसीम बेगम
🎂24 फरवरी 1936
अमृतसर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत29 सितम्बर 1971 (आयु 35 वर्ष)
लाहौर , पाकिस्तान
राष्ट्रीयता पाकिस्तानी
अन्य नामों
द ट्रेजेडी क्वीन
पेशा
पार्श्वगायक
सक्रिय वर्ष
1956 – 1971
जीवनसाथी
दीन मोहम्मद (पति)
बच्चे
6
पुरस्कार
निगार पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका (1960), (1961), (1963) और (1964) में
1950 के दशक के अंत में वह प्रमुखता से उभरीं और 1964 तक, उन्होंने चार मौकों पर प्रतिष्ठित निगार पुरस्कार जीते थे। मूल रूप से दूसरी नूरजहां के रूप में पहचाने जाने के बावजूद , नसीम बेगम ने जल्दी ही पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में अपनी सफल जगह बना ली ।
वह लोकप्रिय गीत "ऐ रहे हक के शहीदो" की मूल गायिका थीं।
नसीम ने लाहौर में दीन मोहम्मद नाम के एक पुस्तक प्रकाशक से शादी की और उनके पांच बच्चे थे लेकिन उनके छह सबसे छोटे बेटे की गर्भावस्था की जटिलताओं के दौरान मृत्यु हो गई।
उसे प्रसव पीड़ा हो रही थी और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, क्योंकि वह गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी। हालांकि, गर्भावस्था से संबंधित जटिलताओं के कारण और उन्हें मस्तिष्क रक्तस्राव का सामना करना पड़ा, 29 सितंबर 1971 को 35 वर्ष की आयु में लाहौर , पाकिस्तान में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें लाहौर के मियां साहिब कब्रिस्तान में दफनाया गया।
नसीम बेगम ने कई देशभक्ति गीत भी गाए थे जो श्रोताओं की आत्मा को झकझोर देने वाले थे। "ऐ रह-ए-हक के शहीदो वफ़ा की तसवीरो, तुम्हें वतन की हवाएं सलाम करती हैं", मुशीर काज़मी ने ऐ राह-ए-हक के शहीदो के गीत लिखे जबकि संगीत मियां शहरयार ने दिया था और गायक नसीम बेगम थीं। 1965 में रेडियो पाकिस्तान रिकॉर्डिंग के लिए ।अधिकांश श्रोता अभी भी गलत मानते हैं कि ऐ राह-ए-हक के शहीदो को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने गाया था ।बाद में 1966 में, अनुभवी पाकिस्तानी फिल्म निर्माता/निर्देशक सैफुद्दीन सैफ ने इस गीत का उपयोग अपनी फिल्म मादर-ए-वतन (1966) में किया, जिसमें इस गीत का संगीत सलीम इकबाल द्वारा व्यवस्थित किया गया था।
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कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में जिनके लिए नसीम बेगम ने कुछ दिल छू लेने वाले गीत गाए:
गुड्डी गुड्डा (1956)
करतार सिंह (1959)
सलमा (1960)
शाम ढले (1960)
सहेली (1960)
घुंघट (1962)
शहीद (1962)
औलाद (1962)
बाजी (1963)
दुल्हन (1963)
इक तेरा सहारा (1963)
हवेली (1964)
बेटी (1964)
फरंगी (1964)
कनीज़ (1965)
आग का दरिया (1966)
मादर-ए-वतन (1966)
पायल की झंकार (1966)
शहंशा-ए-जहाँगीर (1968)
ज़र्का (1969)
इन फिल्मों के अलावा, उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों के लिए भी गाना गाया, जिनमें से कुछ हैं तीस मार खां (1963),
जीदार (1965),
मुखरा चन्न वर्गा और जेंटर मैन (1969)।
उनके खाते में कुछ बड़ी संगीतमय फिल्में हैं लुटेरा (1964),
कौन किसी का, कौसर , छन्न पुत्तर (1970),
मेरा वीर (1967),
छन्न वीर (1969),
लंगोटिया और ये रास्ते हैं प्यार के ।
सम्मुख उपाध्याए
#13sep #24feb
सन्मुख बाबू उपाध्याय
🎂13 सितंबर 1920
⚰️24 फरवरी 1984
सूरत, गुजरात में हुआ था। अपने बड़े भाई के साथ वे गुजराती नाटकों की रचना करते थे। वे पंडित ओंकारनाथ ठाकुर के शिष्य थे। वे एक विशेषज्ञ वायलिन और जलतरंग वादक भी थे। वे 1942 में बॉम्बे (अब मुंबई) आए और संगीत निर्देशक अविनाश व्यास के साथ सहायक के रूप में जुड़ने से पहले कुछ वर्षों तक आकाशवाणी, बॉम्बे में काम किया। उन्होंने 1956 में फिल्म 'ललकार' से शुरुआत की। उन्होंने
'अमर सिंह राठौड़ (1957),
'नाग पद्मिनी (1957)',
'सती परीक्षा (1957)',
'राज प्रतिज्ञा (1958)',
'अमर प्रेम (1960)'
'हमीर हाथ (1964)' के लिए संगीत रचना की। बाद वाली फिल्म संगीतकार के तौर पर उनकी आखिरी हिंदी फिल्म थी। हम देख सकते हैं कि उनका मुख्य काम ऐतिहासिक, धार्मिक फिल्मों और बी ग्रेड फिल्मों के लिए था। "हमीर हाथ" मुबारक बेगम और सुमन कल्याणपुर द्वारा गाए गए एकल गीतों के लिए लोकप्रिय है। अधिकांश फिल्मों के लिए, आशा भोसले, गीता दत्त और मन्ना डे उनकी पसंदीदा गायिका थीं।
सन्मुख बाबू उपाध्याय को बड़े बैनरों से प्रस्ताव नहीं मिले, हालाँकि उनके गाने मधुर हुआ करते थे। बाद में उन्होंने गुजराती नाटकों के लिए काम किया और पूरे भारत में वायलिन पर भी प्रस्तुति दी।
सनमुख बाबू का निधन 24 फरवरी 1984 को हुआ।
संगीतकार के रूप में सनमुख बाबू उपाध्याय फिल्मोग्राफी -
1964 हमीर हाथ
1962 अमर प्रेम
1958 राज प्रतिज्ञा
1957 सती परीक्षा और नाग पद्मनी 1956 ललकार और अमरसिंह राठौड़ 1954
संगीत सहायक के रूप में अधिकार सनमुख बाबू उपाध्याय द्वारा रचित चयनित गीतों की सूची -
* आ ना पास मेरे सुंदरी... अमर प्रेम (1962)। )
* आग के पुतले जरा खामोश रहना रे... अमर प्रेम (1962) कवि प्रदीप के बोल
* आओ रे झूम के... अमर प्रेम (1962)
* अपनी नींद गई... अमर प्रेम (1962)
* जिया लगा जिया हो... अमर प्रेम (1962) * कहां है छुपे सनम... अमर प्रेम (1962)
* प्यारी ओ प्यारी राजदुलारी... अमर प्रेम (1962) गीत विनोद शर्मा द्वारा
* ओ रे परदेसिहया मोरे मन बसिया ओ रे परदेसिहया मोरे मन बसिया... सती परीक्षा (1957) आशा भोसले द्वारा - गीतकार सरस्वती कुमार दीपक
* बाजे रे पायल बाजे... हमीर हाथ (1964) मन्ना डे द्वारा - गीतकार नीलकंठ तिवारी
* निगाहों से दिल में चले... हमीर हाथ (1964) मुबारक बेगम द्वारा - गीतकार सरस्वती कुमार दीपक
* जा रा बेदर्दी तूने... हमीर हाथ (1964) सुमन कल्याणपुर द्वारा - गीतकार उदय खन्ना
* कभी पलकें झुकती हो... हमीर हाथ (1964)
* गगन का चंदा पास जो आया... हमीर हाथ (1964)
* कोटि कोटि जनता ने जिसको समझा...हमीर हाथ (1964)
* ना जीने की इजाजत है... हमीर हाथ (1964) आशा भोसले द्वारा - गीतकार उदय खन्ना
* ओ जानेवाले भूल ना जाना...हमीर हाथ (1964) - गीतकार नीलकंठ तिवारी
* चोरी चोरी चोरी मत देखो जी भंवर जी... अमर सिंह राठौड़ (1957) सुधा मल्होत्रा, मन्ना डे - गीतकार भरत व्यास जी
* एस दिन से मिले तुम हम... ललकार (1956) लता मंगेशकर द्वारा
* सपनों के गांव में तारों की छांव... राज प्रतिज्ञा (1958) लता मंगेशकर द्वारा
* दो अंखियां दो अंखियों से लड़ गई... राज प्रतिज्ञा (1958) लता मंगेशकर द्वारा
* राधा प्यारी प्यारी हाथ में पिचकारी... राज प्रतिज्ञा (1958) लता मंगेशकर द्वारा * दिन है सुहाने मस्ताने... नाग पद्मिनी (1957) सुधा मल्होत्रा, मधुबाला झावेरी - गीतकार प्रेम धवन
Monday, August 12, 2024
श्रीदेवी
#13aug
#24feb
श्री अम्मा यंगर अय्यपन
श्री देवी
13 अगस्त 1963
सिवकासी, मद्रास
(अभी तमिलनाडु), भारत
मौत
24 फ़रवरी 2018 (उम्र 54)
दुबई, संयुक्त अरब अमीरात
मौत की वजह
पानी में डूबना
पेशा
अभिनेत्री, निर्माता
कार्यकाल
1967–1997, 2012–2018
जीवनसाथी
बोनी कपूर (वि॰ 1996)
बच्चे
2
संबंधी
देखें कपूर परिवार
पुरस्कार
पद्म श्री (2013)1975 की फिल्म जूली से उन्होंने हिन्दी सिनेमा में बाल अभिनेत्री के रूप में प्रवेश किया था। अपनी पहली फिल्म मून्द्र्हु मुदिछु नामक तमिल में थी। श्रीदेवी का बॉलीवुड में प्रवेश 1978की फिल्म सोलहवाँ सावन से हुआ। लेकिन उन्हे सबसे अधिक पहचान 1983 की फिल्म हिम्मतवाला से मिली। एक के बाद एक सुपरहिट महिला प्रधान फिल्मो की वजह से उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्री के तौर पर भी जाना जाता है। सदमा, नागिन,निगाहें, मिस्टर इन्डिया, चालबाज़, लम्हे, ख़ुदागवाह और जुदाई उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। ⚰️24फरवरी 2018को दुबई में उनका निधन हुआ।अपने फिल्मी करियर में श्रीदेवी ने 63 हिंदी, 62 तेलुगु, 58 तमिल, 21 मलयालम तथा कुछ कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया।
1972 से 1994 के बीच अपनी फिल्मों की शूटिंग के दौरान श्रीदेवी हमेशा अपनी मां राजेश्वरी या अपनी बहन श्रीलता के साथ फिल्म सेट पर जाती थीं। संजय रामासामी 1989 से अपनी बहन श्रीलता से विवाहित हैं।
श्रीदेवी ने अपने पिता के लिए प्रचार किया जब उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनावों में शिवकाशी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा , लेकिन अंततः चुनाव हार गईं। उनके पिता की 1990 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, जब वह लम्हे की शूटिंग कर रही थीं । उनकी माँ की मृत्यु 1996 में हुई, जो 1995 में न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर में ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन से हुई जटिलताओं के परिणामस्वरूप हुई। न्यूरोसर्जन ने उनके मस्तिष्क के गलत हिस्से पर ऑपरेशन किया जिससे उनकी दृष्टि और हाल की स्मृति के महत्वपूर्ण ऊतक नष्ट हो गए। उस समय अमेरिकी मीडिया में इसकी व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई थी, जिसके बाद एक सफल अदालती लड़ाई हुई और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अस्पतालों को उनकी चिकित्सा त्रुटियों का खुलासा करने के लिए एक कार्यक्रम का प्रस्ताव दिया। श्रीदेवी अपनी निजता को लेकर बेहद सतर्क थीं और शायद ही कभी इंटरव्यू देती थीं या उनमें अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में बात करती थीं। 1996 में, उन्होंने निर्माता बोनी कपूर से शादी की । इस जोड़े की दो बेटियाँ हैं, जान्हवी (जन्म 1997) और ख़ुशी (जन्म 2000)। उनकी दोनों बेटियाँ अभिनेत्रियाँ हैं।
स्क्रीन पर एक मजबूत, जीवंत और उत्साही महिला के रूप में अपनी भूमिका के लिए मशहूर होने के बावजूद, श्रीदेवी स्क्रीन के पीछे एक बेहद अंतर्मुखी और आरक्षित व्यक्ति थीं। CNN-IBN संवाददाता राजीव मसंद कहते हैं; "मैंने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो स्क्रीन के पीछे इतना शर्मीला, इतना शांत हो, जो कैमरे के सामने आते ही प्रकृति की शक्ति में बदल जाए। वह एक साक्षात्कारकर्ता के लिए दुःस्वप्न थी, लेकिन फिल्म-प्रेमियों के लिए सपना थी"। उनके आरक्षित स्वभाव पर टिप्पणी करते हुए, फ़र्स्टपोस्ट कहता है; "चमकती, जादुई आँखों और तेजस्वी चेहरे वाली ग्लैमरस नायिका के पीछे, एक स्वाभाविक रूप से शर्मीली महिला थी, जिसे अक्सर अभिमानी समझ लिया जाता था। सच्चाई यह है कि वह शर्मीली थी। जब वह सिर्फ 4 साल की थी, तब अभिनय करना शुरू कर दिया था, उसने औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं की थी या अपनी उम्र के बच्चों के साथ बातचीत करने का ज़्यादा मौका नहीं मिला था। नतीजतन, उसे भीड़ और शोर से सख्त नफरत हो गई।"
⚰️श्रीदेवी का निधन २४ फरवरी २०१८ को दुबई में हुआ। हालांकि यह पहले घोषित किया गया था कि मौत का कारण दिल का दौरा है, लेकिन बाद में दुबई पुलिस द्वारा जारी की गयी फोरेंसिक रिपोर्ट में संकेत मिले है कि इनकी मृत्यु होटल में बाथटब में दुर्घटनाग्रस्त रूप से डूबने से हुई है।
🎥
प्रमुख फिल्में
जैसे को तैसा (1973)
जूली (1975)
सोलहवां सावन (1978)
हिम्मतवाला (1983)
जस्टिस चौधरी (1983)
जानी दोस्त (1983)
कलाकार (1983)
सदमा (1983)
अक्लमंद (1984)
इन्कलाब (1984)
जाग उठा इंसान (1984)
नया कदम (1984)
मकसद (1984)
तोहफा (1984)
बलिदान (1985)
मास्टर जी (1985)
सरफ़रोश (1985)
आखिरी रास्ता (1986)
भगवान दादा (1986)
धर्म अधिकारी (1986)
घर संसार (1986)
नगीना (1986)
कर्मा (1986)
सुहागन (1986)
सल्तनत (1986)
औलाद (1987)
हिम्मत और मेहनत (1987)
नज़राना (1987)
मजाल (1987)
जोशीले (1987)
जवाब हम देंगे (1987)
मिस्टर इंडिया (1987)
शेरनी (1988)
राम अवतार (1988)
वक़्त की आवाज़ (1988)
सोने पे सुहागा (1988)
चालबाज़ (1989)
चांदनी (1989)
गुरु (1989)
गैर कानूनी (1989)
निगाहें (1989)
बंजारन (1991)
फ़रिश्ते (1991)
पत्थर के इंसान (1991)
लम्हे (1991)
खुदा गवाह (1992)
हीर राँझा (1992)
चन्द्रमुखी (1993)
गुमराह (1993)
गुरुदेव (1993)
रूप की रानी चोरों का राजा (1993)
चाँद का टुकड़ा (1994)
लाडला (1994)
आर्मी (1996)
मि. बेचारा (1996)
कौन सच्चा कौन झूठा (1997)
जुदाई (1997)
मेरी बीबी का जवाब नहीं (2004)
मि. इंडिया 2 (2007)
2017 मॉम (फ़िल्म) हिन्दी फ़िल्म
2012 इंग्लिश विंग्लिश हिन्दी फ़िल्म
2007 हल्ला बोल
2004 मेरी बीवी का जवाब नहीं दुर्गा
1997 जुदाई हिन्दी फ़िल्म
1997 कौन सच्चा कौन झूठा
1996 आर्मी
1996 मिस्टर बेचारा
1996 ग्रेट रॉबरी
1994 चाँद का टुकड़ा
1993 गुमराह हिन्दी फ़िल्म
1992 खुदा गवाह हिन्दी फ़िल्म
1991 लाम्हे हिन्दी फ़िल्म
1989 चान्दनी हिन्दी फ़िल्म
1989 चालबाज़ हिन्दी फ़िल्म
1987 मिस्टर इण्डिया हिन्दी फ़िल्म
1986 नगिना हिन्दी फ़िल्म
1983 हिम्मतवाला हिन्दी फ़िल्म
1983 सदमा हिन्दी फ़िल्म
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