Thursday, February 27, 2025

जीनेफर कपूर

#07sep #28feb 
जेनिफर कपूर
🎂जन्म 28 फरवरी 1933 
⚰️07 सितम्बर 1984 
पति: शशि कपूर (विवा. 1958–1984)
बच्चे: करण कपूर, संजना कपूर, कुनाल कपूर
पोते या नाती: ज़हान पृथ्वीराज कपूर, जॉच कपूर, शाईरा लौरा कपूर, ज़्यादा
बहन: फेलिसिटी केंडल
जेनिफर कपूर के नाम से नाम से ही जानी जाती थीं। 
ये एक अंग्रेजी अभिनेत्री और पृथ्वी थिएटर की संस्थापक थी। 1981 की फिल्म 36 चौरंगी लेन के लिए एक अग्रणी भूमिका में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए बाफ्टा पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। 

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         जेनिफर कपूर
 ⚰️28 फ़रवरी 1933, साउथपोर्ट, यूनाइटेड किंगडम
 🎂07 सितंबर 1984, लंदन, यूनाइटेड किंगडम

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जेनिफर केंडल का जन्म साउथपोर्ट , इंग्लैंड में हुआ था , लेकिन उन्होंने अपनी युवावस्था का अधिकांश समय भारत में बिताया। उनका और छोटी बहन फेलिसिटी केंडल का जन्म जेफ्री केंडल और लॉरा लिडेल से हुआ था, जो एक ट्रैवलिंग थिएटर कंपनी, "शेक्सपियराना" चलाते थे, जो किताब और फिल्म, शेक्सपियर वाला (1965) में दर्शाए अनुसार भारत भर में घूमती थी, जिसमें केंडल बिना श्रेय के दिखाई दिए थे। और जिसमें उनके पति शशि कपूर , उनके माता-पिता और उनकी बहन ने अभिनय किया।


शशि कपूर और केंडल की पहली मुलाकात 1956 में कलकत्ता में हुई, जहां वह पृथ्वी थिएटर कंपनी का हिस्सा थे, जबकि वह शेक्सपियराना के हिस्से के रूप में नाटक द टेम्पेस्ट में मिरांडा की भूमिका निभा रही थीं।जल्द ही, शशि कपूर ने भी शेक्सपियराना कंपनी के साथ दौरा करना शुरू कर दिया,  और इस जोड़े ने जुलाई 1958 में शादी कर ली। केंडल और उनके पति ने मुंबई में अपने थिएटर के उद्घाटन के साथ पृथ्वी थिएटर के कायाकल्प में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1978 में शहर का जुहू क्षेत्र।  केंडल और कपूर ने एक साथ कई फिल्मों में अभिनय किया, खासकर मर्चेंट आइवरी प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित फिल्मों में ।. उनकी पहली संयुक्त अभिनीत भूमिकाएँ बॉम्बे टॉकी (1970) में थीं, जो मर्चेंट आइवरी द्वारा निर्मित पहले की फिल्मों में एक थी।
1980: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - जुनून - नामांकित
1982: इवनिंग स्टैंडर्ड ब्रिटिश फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री : 36 चौरंगी लेन - जीता
1983: मुख्य भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए बाफ्टा पुरस्कार - 36 चौरंगी लेन - नामांकित
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शेक्सपियर वालाह (1965)

बॉम्बे टॉकी (1970)

जूनून (1978)

36 चौरंगी लेन (1981)

हीट एंड डस्ट (1983)

द फार पैवेलियन्स (1984)

घारे-बेयर (1984)

सप्तपदी (1961 बंगाली फिल्म)

👗पोशाक

मुक्ति (1977)
जुनून (1978)

रविंदर जैन

रविन्द्र जैन🎂जन्म: 28 फ़रवरी 1944⚰️मृत्यु: 09 अक्तूबर 2015
पत्नी: दिव्या जैन (विवा. ?–2015)
बच्चे: आयुष्मान जैन
भाई: मनिन्द्र जैन, अखिलेश जैन, महेंद्र कुमार जैन,
महान संगीतकार गायक रविन्द्र जैन
🎂जन्म: 28 फ़रवरी 1944
⚰️मृत्यु: 09 अक्तूबर 2015, नागपुर

रविन्द्र जैन भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार तथा गायक थे। मुख्यत: उन्हें भजन गायक के रूप में ख्याति मिली थी। रविन्द्र जैन हिन्दी सिनेमा के ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने मन की आँखों से दुनिया को समझा। सरगम के सात सुरों के माध्यम से उन्होंने जितना समाज से पाया, उससे कई गुना अधिक अपने श्रोताओं को लौटाया। वे मधुर धुनों के सर्जक होने के साथ बेहतरीन गायक भी रहे और अधिकांश गीतों की आशु रचना भी उन्होंने करके सबको चौंकाया। मन्ना डे के दृष्टिहीन चाचा कृष्णचन्द्र डे के बाद रवीन्द्र जैन दूसरे व्यक्ति थे, जिन्होंने दृश्य-श्रव्य माध्यम में केवल श्रव्य
के सहारे ऐसा इतिहास रचा, जो युवा-पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बन गया।

प्रख्यात संगीतकार तथा गायक रविन्द्र जैन का जन्म 28 फ़रवरी, सन 1944 में उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित इन्द्रमणि जैन तथा माता किरणदेवी जैन थीं। अपने सात भाइयों तथा एक बहन में रवीन्द्र जैन का क्रम चौथा था। जन्म से उनकी आँखें बंद थीं, जिसे पिता के मित्र डॉ. मोहनलाल ने सर्जरी से खोला। साथ ही यह भी कहा कि बालक की आँखों में रोशनी है, जो धीरे-धीरे बढ़ सकती है, लेकिन इसे कोई काम ऐसा मत करने देना, जिससे आँखों पर जोर पड़े। 

रविन्द्र जैन के पिता ने डॉक्टर की नसीहत को ध्यान में रखकर संगीत की राह चुनी, जिसमें आँखों का कम
उपयोग होता है। रवीन्द्र ने अपने पिता तथा भाई की आज्ञा शिरोधार्य कर मन की आँखों से सब कुछ जानने-समझने की सफल कोशिश की। बड़े भाई से आग्रह कर अनेक उपन्यास सुने। कविताओं के भावार्थ समझे। धार्मिक-ग्रंथों तथा इतिहास-पुरुषों की जीवनियों से जीवन का मर्म समझा। वे बचपन से इतने कुशाग्र बुद्धि के थे कि एक बार सुनी गई बात को कंठस्थ कर लेते, जो हमेशा उन्हें याद रहती। परिवार के धर्म, दर्शन और अध्यात्ममय माहौल में उनका बचपन बीता। वे प्रतिदिन मंदिर जाते और वहाँ एक भजन गाकर सुनाना उनकी दिनचर्या में शामिल था। बदले में पिताजी एक भजन गाने पर एक रुपया इनाम भी दिया करते थे।

रविन्द्र जैन भले ही दृष्टिहीन रहे हों, मगर उन्होंने बचपन में खूब शरारतें कीं। परिवार का नियम था कि सूरज ढलने से पहले घर में कदम रखो और भोजन करो। रवीन्द्र ने इस नियम का कभी पालन नहीं किया। रोज देर रात को घर आते। पिताजी के डंडे से माँ बचाती। उनके कमरे में पलंग के नीचे खाना छिपाकर रख देतीं ताकि बालक भूखा न रहे। अपनी दोस्त मंडली के साथ रवीन्द्र गाने- बजाने की टोली बनाकर अलीगढ़ के रेलवे स्टेशन के आसपास मँडराया करते थे। उनके दोस्त के पास टिन का छोटा डिब्बा था, जिस पर थाप लगाकर वे गाते और हर आने-जाने वाले का मनोरंजन करते। एक दिन न जाने क्या सूझी कि डिब्बे को सीधा कर दिया। उसका खुला मुँह देख श्रोता उसमें पैसे डालने लगे। चिल्लर से डिब्बा भर गया। घर आकर उन्होंने माँ के चरणों में चिल्लर उड़ेल दी। पिताजी ने यह देखा तो गुस्से से लाल-पीले हो गए और सारा पैसा देने वालों को लौटाने का आदेश दिया। अब परेशानी यह आई कि अजनबी लोगों को खोजकर पैसा कैसे वापस किया जाए? दोस्तों ने योजना बनाई कि चाट की दुकान पर जाकर चाट-पकौड़ी जमकर खाई जाए और मजा लिया जाए। 

रविन्द्र जैन ने कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) तथा वहाँ के ' रवीन्द्र संगीत ' के बारे में काफ़ी सुन रखा था। ताऊजी के बेटे पद्म भाई ने वहाँ चलने का प्रस्ताव दिया, तो फौरन राजी हो गए। पिताजी ने पचहत्तर रुपए जेब खर्च के लिए दिए। माँ ने कपड़े की पोटली में चावल-दाल बाँध दिए। कानपुर स्टेशन पर भाई के साथ नीचे उतरे, तो ट्रेन चल पड़ी। पद्म भाई तो चढ़ गए। रवीन्द्र ने भागने की कोशिश की। डिब्बे से निकले एक हाथ ने उन्हें अंदर खींच लिया। उस अजनबी ने कहा कि- "जब तक भाई नहीं मिले, हमारे साथ रहना।" फ़िल्म निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला के जरिए रवीन्द्र को संगीत सिखाने की एक ट्यूशन मिली। मेहनताने में चाय के साथ नमकीन समोसा। पहली नौकरी बालिका विद्या भवन में 40 रुपए महीने पर लगी। इसी शहर में उनकी मुलाकात पण्डित जसराज तथा पण्डित मणिरत्नम् से हुई। नई गायिका हेमलता से उनका परिचय हुआ। वे मिलकर बांग्ला तथा अन्य भाषाओं में धुनों की रचना करने लगे। हेमलता से
नजदीकियों के चलते उन्हें ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कम्पनी से ऑफर मिलने लगे। एक पंजाबी फ़िल्म में हारमोनियम बजाने का मौका मिला। सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुति के 151 रुपए तक मिलने लगे। इसी सिलसिले में वे हरिभाई जरीवाला ( संजीव कुमार ) के संपर्क में आए। कलकत्ता का यह पंछी उड़कर मुंबई आ गया।

सन 1968 में राधेश्याम झुनझुनवाला के साथ रवीन्द्र जैन मुंबई आए तो पहली मुलाकात पार्श्वगायक मुकेश से हुई। रामरिख मनहर ने कुछ महफिलों में गाने के अवसर जुटाए। नासिक के पास देवलाली में फ़िल्म 'पारस' की शूटिंग चल रही थी। संजीव कुमार ने वहाँ बुलाकार निर्माता एन. एन. सिप्पी से मिलवाया। रवीन्द्र ने अपने खजाने से कई अनमोल गीत तथा धुनें एक के बाद एक सुनाईं। श्रोताओं में शत्रुघ्न सिन्हा , फ़रीदा जलाल और नारी सिप्पी भी थे। उनका पहला फ़िल्मी गीत 14 जनवरी, 1972 को मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में रिकॉर्ड हुआ

रामरिख मनहर के जरिये 'राजश्री प्रोडक्शन' के ताराचंद बड़जात्या से मुलाकात रवीन्द्र जैन के फ़िल्म करियर को सँवार गई। अमिताभ बच्चन, नूतन अभिनीत 'सौदागर' में गानों की गुंजाइश नहीं थी। उसके बावजूद रवीन्द्र ने गुड़ बेचने वाले सौदागर के लिए मीठी धुनें बनाईं, जो यादगार हो गईं। यहीं से रवीन्द्र और राजश्री का सरगम का कारवाँ आगे बढ़ता गया।'तपस्या', 'चितचोर', 'सलाखें', 'फ़कीरा' के गाने लोकप्रिय हुए और मुंबइया संगीतकारों में रवीन्द्र जैन का नाम स्थापित हो गया। 'दीवानगी' के समय सचिन देव बर्मन बीमार हो गए तो यह फ़िल्म उन्होंने रवीन्द्र जैन को सौंप दी। एक महफिल में रवीन्द्र जैन-हेमलता गा रहे थे। श्रोताओं में राज कपूर भी थे। 'एक राधा एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा' गीत सुनकर राज कपूर झूम उठे, बोले- "यह गीत किसी को दिया तो नहीं?" पलटकर रवीन्द्र जैन ने कहा, "राज कपूर को दे दिया है।"
बस, यहीं से उनकी एंट्री राज कपूर के शिविर में हो गई। आगे चलकर 'राम तेरी गंगा मैली' का संगीत रवीन्द्र जैन ने
ही दिया और फ़िल्म तथा संगीत बेहद लोकप्रिय हुए।

रविन्द्र जैन का निधन 9 अक्टूबर, 2015 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ।
📺टेलीविजन

रामायण (1987)
श्री कृष्ण (1993)
अलिफ़ लैला (1993)
जय वीर हनुमान (1995)
जय हनुमान (1997)
साईं बाबा (2005)
संकट मोचन हनुमान (2012)
जय गंगा मैया
जय महालक्ष्मी
श्री ब्रह्मा विष्णु महेश
जय माँ दुर्गा
महाकाव्य महाभारत
रामायण (2008)

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1972 कांच और हीरा
1973 सौदागर
हाथी के दांत
1974 चोर मचाये शोर
1975 गीत गाता चल
दो जासूस
1976
चितचोर
फकीरा
चढ़ी जवानी बुढे नू पंजाबी फिल्म
दीवानगी
तपस्या
ज़िद
1977
सुजाता मलयालम फिल्म
दुल्हन वही जो पिया मन भाये
पहेली
डाकू और महात्मा
राम भरोसे
कोतवाल साब
महा बदमाश
1978
अंखियों के झरोखों से
मेरा रक्षक
पति पत्नी और वो
1979
आतिश
गोपाल कृष्ण
हर हर गंगे
आखिरी कसम
घर की लाज
राधा और सीता
सुनयना
1980
ख्वाब
इंसाफ का तराजू
1984
अबोध
हरिश्चंद्र शैब्या बंगाली
श्री एक्स
1985 राम तेरी गंगा मैली
1987
प्रतिघाट
मार्टे डैम टाक
1988 पाप को जला कर राख कर दूंगा
1990
कारनामा
सुखम सुखकरम मलयालम
1991

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तेलुगू
ये आग कब बुझेगी
मेंहदी
1993 मेरी आन
1994 बेटा हो तो ऐसा
2006 विवाह
2008 एक विवाह...ऐसा भी
2011 जाना पहचानना
2014 कहीं है मेरा प्यार

Wednesday, February 26, 2025

रागनी (मृत्यु)

रागिनी 🎂11 दिसंबर 1923⚰️ 27 फरवरी 2007

भारतीय और पाकिस्तानी सिनेमा की भूली-बिसरी अभिनेत्री रागिनी को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

रागिनी या रागिनी (11 दिसंबर 1923 - 27 फरवरी 2007) भारतीय सिनेमा और बाद में पाकिस्तानी सिनेमा की एक अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी/उर्दू और पंजाबी फिल्मों में काम किया। रागिनी को अपने समय की सबसे ज़्यादा पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री कहा जाता है, उन्हें "शाहजहाँ" (1946) में उनकी भूमिका के लिए ए.आर. कारदार ने एक लाख रुपये का भुगतान किया था। अपनी खूबसूरत हिरणी जैसी आँखों के लिए जानी जाने वाली रागिनी को 'आहू चस्म' के नाम से भी जाना जाता था। 

रागिनी का जन्म शमशाद बेगम के रूप में वर्ष 1923 में गुजरांवाला अविभाजित भारत (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। जब रागिनी बहुत छोटी थीं, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई और उनके पिता सेठ दीवान परमानंद उन्हें अपने साथ लाहौर ले गए।  लाहौर में फिल्म निर्माता रोशन लाल शौरी ने उन्हें देखा और दीवान को रागिनी को फिल्मों में लॉन्च करने के लिए राजी किया।

रागिनी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म "दुल्ला भट्टी" (1940) से की, जिसमें उनके साथ एम. डी. कंवर थे। यह फिल्म एक बड़ी सफलता थी और रागिनी रातों-रात स्टार बन गईं। रागिनी ने लाहौर में हिंदी और पंजाबी में कई प्रोडक्शन में काम किया, जैसे सेहती मुराद (1941), निशानी (1942), रवि पर (1942), पूंजी (1943), दासी (1944) और कैसे कहूं (1945)।

नेक परवीन (1946) एक और सफल फिल्म थी जिसने रागिनी की स्थिति को एक शीर्ष स्टार के रूप में मजबूत किया। फिल्म निर्माता एआर कारदार ने रागिनी को मुमताज महल शाहजहां (1946) की भूमिका निभाने की पेशकश की, ऐसा कहा जाता है कि रागिनी को इस फिल्म के लिए एक लाख रुपये का भुगतान किया गया था, जिससे वह उस समय की सबसे अधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्री बन गईं।  विभाजन के बाद रागिनी ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने कुछ भारतीय फिल्में भी कीं, जो सफल नहीं रहीं।

रागिनी की हिरण जैसी आंखें उनकी सबसे बड़ी खूबी थीं। लाहौर के भाटी गेट पर लगी सेहती मुराद की फिल्म के पोस्टर पर उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी और नीचे कैप्शन लिखा था: “जब ये आंखें खुलेंगी तो क्या होगा?” उनकी अन्य फिल्मों में शिरीन फरहाद (1945) का विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने जयंत के फरहाद के सामने शिरीन का किरदार निभाया था।

50 के दशक के आखिर में रागिनी ने खुद को सहायक भूमिकाएं निभाते हुए पाया, मुख्य नायिका के तौर पर उनके दिन पीछे छूट गए। फिर भी उन्होंने बेदारी (1957) में रतन कुमार की मां की भूमिका निभाई और अनारकली (1958) में नूरजहां की अनारकली की प्रतिद्वंद्वी दिल आराम की भूमिका निभाई।  इसके बाद उन्होंने हुस्न-ए-इश्क (1962), नैला (1965), साज़-ओ-आवाज़ (1965), सैक़ा (1968) और पाक दमन (1969) जैसी फ़िल्मों में चरित्र भूमिकाएँ निभाईं। उनकी आखिरी फ़िल्म पश्तो फ़िल्म आब-ए-हयात (1983) थी।

रागिनी ने 1940 के दशक की शुरुआत में मोहम्मद असलम से शादी की, यह शादी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली लेकिन उनकी पहली शादी से उनके दो बच्चे हुए, सायरा और आबिद। उन्होंने 1947 में पाकिस्तान में फिर से एस. गुल से शादी की, जिन्होंने "बेक़रार" फ़िल्म का निर्माण और सह-अभिनय किया। रागिनी ने अपने जीवन के अंतिम दिन अकेले और उपेक्षित गुलबर्ग में बिताए।

रागिनी उर्फ़ शमशाद बेगम का 27 फ़रवरी 2007 को लाहौर (पाकिस्तान) में निधन हो गया।

 🎬रागिनी की फिल्मोग्राफी -
 ● भारत में -
 1941 हिम्मत
 1942 निशानी
 1943 पूंजी
 1944 दासी
 1945 शिरीन फरहाद, धमकी और नेक पर्विन
 1946 बिंदिया और शाहजहाँ
 1947 मनमानी और फ़र्ज़
 1952 चक्कर और इंसान 

 ● पाकिस्तान में -
 1949 मुंदरी
 1950 बेकरार और कुन्दन
 1951 अकेली
 1953 गुलाम
 1954 गुमनाम
 1955 नौकर, शर्रे, नज़राना और इल्तिजा
 1957 बेदारी
 1958 बहार, अनारकली और मुमताज
 1964 गेहरा दाग़
 1965 नैला
 1970 सय्यान
 1971 ऊंचा ना प्यार दा और सुल्तान
 1973 फ़र्ज़  
1983 आब-ए-हयात 

Tuesday, February 25, 2025

अमित बोस(जनम)

अमित बोस 🎂26 फरवरी 1930⚰️13 दिसंबर 2019
अमित बोस एक फ़िल्म निर्देशक थे. उन्होंने शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास देवदास का निर्देशन किया था. उन्होंने इस फ़िल्म में देवदास का किरदार भी निभाया था. 
भारतीय सिनेमा के कम चर्चित फिल्म निर्देशक, संपादक अमित बोस को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

 अमित बोस (जन्म 26 फरवरी 1930 - 13 दिसंबर 2019) एक भारतीय फिल्म निर्माता, फिल्म निर्देशक और संपादक हैं, जिन्होंने अभिलाषा (1968) जैसी सर्वकालिक क्लासिक फिल्मों का निर्देशन किया, एक संपादक के रूप में, मधुमती (1958), सुजाता (1959), परख (1960), उसने कहा था (1960), काबुलीवाला (1961), प्रेम पत्र (1962), बंदिनी (1963) और शेक्सपियर वाला (1965) जैसी फिल्मों पर काम किया। उन्होंने बिमल रॉय और संजय खान सहित कई अन्य निर्देशकों के साथ मुख्य फिल्म संपादक के रूप में काम किया। 

 अमित बोस का जन्म 26 फरवरी 1930 को अविभाजित भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी के जमशेदपुर में हुआ था, जो बाद में बिहार का एक शहर था, जो अब झारखंड में है। उनके दादा भूविज्ञानी प्रमथ नाथ बोस थे, जिन्होंने समृद्ध लौह अयस्कों की खोज की, जिसने जेआरडी टाटा के साम्राज्य को संभव बनाया, जो आज टाटा समूह के स्वामित्व में है। उनकी माँ मीरा देवी (जन्म शर्मा) एक बंगाली अभिनेत्री थीं। अपनी पहली शादी के तलाक में समाप्त होने के बाद, उन्होंने प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और अभिनेता पहाड़ी सान्याल से शादी की, जो बोस के लिए पिता की तरह थे। अमित का नाम रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था, जो कोलकाता में बोस की मां के चचेरे भाई थे।

एक बच्चे के रूप में अनिता बोस बोलपुर, शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर की ओपन-एयर संस्था विश्व भारती में एक छात्र थे। एक युवा व्यक्ति के रूप में उन्होंने 1946 में कोलकाता में फिल्म उद्योग में अपना पहला कदम रखा।  उन्होंने "चिन्ना मूल" ("ब्रोकन ब्रांच" - महान अकाल के दौरान राष्ट्र की जड़ों को उजाड़ने वाली फिल्म) के निर्माण के दौरान प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक निमाई घोष के सहायक के रूप में काम किया। इस फिल्म ने भारत और विदेश दोनों में कई पुरस्कार जीते। इसे आज भी भारतीय सिनेमा की महान क्लासिक्स में से एक माना जाता है। बोस इसके बाद बॉम्बे आए और 1947 में मलाड में बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में निर्देशक फणी मजूमदार के सहायक के रूप में काम किया। उन्होंने मजूमदार की फिल्म "तमाशा" में एक छोटी भूमिका भी निभाई, जिसमें सभी समय की महान भारतीय स्क्रीन हीरोइन मीना कुमारी ने अभिनय किया था। 
1952 में, अमित बोस इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने पाइनवुड स्टूडियो और ए.बी. पाथे में प्रशिक्षुता की। 1953 में उन्होंने शरत चंद्र चटर्जी के क्लासिक उपन्यास "देवदास" का निर्देशन और अभिनय किया, जिसमें उन्होंने मंच पर देवदास की भूमिका निभाई (अंग्रेजी में, मोनिका सेन द्वारा अनुवादित)।

 अगले कुछ वर्षों के दौरान अमित बोस ने रोम, इटली में सेंट्रो स्पीरिमेंटेल डे सिनेमेटोग्राफ़िया में फ़िल्म निर्देशन, पटकथा लेखन और फ़िल्म संपादन में अपना डिप्लोमा किया। रोम में उस अवधि के दौरान, वे रागाज़े डी'ओगी "गर्ल्स ऑफ़ टुडे", 1955, विटोरियो डी सिका (स्टेज़ियोन टर्मिनी / "टर्मिनल स्टेशन", 1953 और इल टेट्टो / "द रूफ", 1956) और मारियो सोल्दाती (गुएरा ई पेस / "वॉर एंड पीस", 1956) के निर्माण के दौरान लुइगी ज़म्पा के प्रशिक्षु सहायक भी थे।

सितंबर 1957 में कोलकाता में मोनिका के साथ अपनी शादी के बाद और भारत लौटने पर, अमित बोस बॉम्बे में बस गए, जहाँ उन्होंने बिमल रॉय के लिए मुख्य फ़िल्म संपादक के रूप में काम किया।  उन्होंने मधुमती (1958, अमेरिकी ऑस्कर में प्रवेश के लिए छोटा अंग्रेजी संस्करण), सुजाता (1959), परख (1960), उसने कहा था (1960), काबुलीवाला (1961), प्रेम पत्र (1962) और बंदिनी (1963) जैसी फिल्मों का संपादन किया, जिन्हें उन्होंने पूरा होने से पहले ही छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें एक बाल फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला, जिसके लिए उन्हें उसी वर्ष सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार दिया गया।

भारत में, अमित बोस ने बिमल रॉय से लेकर संजय खान, कृष्णा शाह, फिरोज खान, केवल कश्यप और कई अन्य निर्देशकों के साथ काम किया, और सुनील दत्त, नूतन, साधना, मीना कुमारी, शशि कपूर, राज कुमार, फेलिसिटी केंडल, रेक्स हैरिसन, जॉन सैक्सन, सुलोचना, कामिनी कौशल, धर्मेंद्र और रहमान जैसे अभिनेताओं को करीब से जाना।

विदेश में अमित बोस ने यूके, यूनाइटेड स्टेट्स, इटली, फ्रांस, जर्मनी, साइप्रस, मॉरीशस और लेबनान सहित कई अन्य देशों में काम किया।  उन्होंने दुनिया भर में तीस से ज़्यादा फ़ीचर फ़िल्मों का निर्देशन और/या संपादन किया है, जिसमें विटोरियो डी सिका, लुइगी ज़म्पा, फ्रेंको ज़ेफ़रेली, लुइस मैले, जेम्स आइवरी और दुनिया भर के कई अन्य जाने-माने फ़िल्मकारों जैसे प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ काम किया है। 
अमित बोस ने चिल्ड्रन्स फिल्म सोसाइटी इंडिया के लिए बच्चों की फिल्म फाइव पपेट्स (पंच पुथलियान) का निर्देशन भी किया, जिसके लिए उन्हें 1964 में भारत के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार दिया गया।

कई अन्य फीचर फिल्मों के अलावा, बोस ने मुंबई में फिल्म्स डिवीजन द्वारा निर्मित भारत पर चीनी आक्रमण पर एक वृत्तचित्र का संपादन किया, जो 1961 - 1962 में हुआ था।

उनके क्रेडिट में चोरी चोरी (1956), गोदान (1963), काजल (1965) घोस्ट डायरेक्टर और एडिटर के रूप में, 40 से अधिक पुरस्कारों के विजेता), अभिलाषा (1968), एट फाइव पास्ट फाइव (1969) (महात्मा गांधी की हत्या के बारे में एक नाटक), चांदी सोना (1977) और द कोर्टेसंस ऑफ बॉम्बे (1983) जैसी फिल्में शामिल हैं।

अमित बोस ने भारत के पुणे में फिल्म संस्थान में फिल्म प्रौद्योगिकी पढ़ाया।  उन्होंने कई अज्ञात अभिनेताओं को स्टारडम तक पहुंचाया और 20 से अधिक संपादकों को सहायक पद से लेकर पूर्ण संपादक पद तक पहुंचाया। उन्होंने युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ने में मदद की, उन्हें अपने सभी रहस्य बताकर, जैसा कि एक बार डी सिका ने उन्हें बताया था।

अमित बोस अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अपनी पत्नी मोनिका के साथ लंदन, यूके में रहते हैं। अपने खाली समय में, वह स्थानीय दृष्टिहीन संघ में स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं। उनकी बेटियाँ रोमा और पापरी-तारा अपने परिवारों के साथ जर्मनी और इंग्लैंड में बस गई हैं। उनके पाँच पोते-पोतियाँ हैं, जिनमें टेलीविज़न निर्माता सिमोन थोरोगुड भी शामिल हैं। 

 13 दिसंबर 2019 को अमित बोस का निधन हो गया

 🎬 अमित बोस की फिल्मोग्राफी -
 1952 तमाशा: अभिनेता
 1959 प्रेम विवाह : संपादक
           सुजाता : संपादक
 1960 पारख : संपादक
           उसने कहा था : संपादक
 1962 प्रेम पत्र
 1965 शेक्सपियर वालाः संपादक
 1963 पंच पुतलियां: निदेशक
           गोदान : संपादक
 1968 अभिलाषा: निदेशक
 1973 चोरी-चोरी: संपादक
 1977 चंडी सोना: संपादक
 1978 शालीमार: संपादक
 1979 सिनेमा सिनेमा: संपादक
 1980 कातिल कौन: निर्देशक

मोहन कृष्ण

मनमोहन कृष्ण🎂26 फ़रवरी 1922⚰️
3 नवंबर 1990

26 फ़रवरी 1922, लाहौर, पाकिस्तान
मृत्यु की जगह और तारीख: 3 नवंबर 1990, मुम्बई
नामांकन: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ सहायक


पुराने जमाने के चरित्र अभिनेता मनमोहन कृष्ण

मनमोहन कृष्ण (11 अगस्त 1921 - 03 नवंबर 1990), जिन्हें अक्सर मनमोहन के नाम से जाना जाता है, एक लोकप्रिय भारतीय फिल्म अभिनेता और निर्देशक थे, जिन्होंने चार दशकों तक हिंदी फिल्मों में काम किया, ज्यादातर एक चरित्र अभिनेता के रूप में। उन्होंने रेडियो पर कैडबरी की फुलवारी नामक शो की एंकरिंग की, जो एक गायन प्रतियोगिता थी। वे चोपड़ा बंधुओं के पसंदीदा थे और उन्होंने उनके द्वारा निर्देशित या निर्मित फिल्मों में छोटी या बड़ी भूमिकाएँ निभाईं। दीवार, त्रिशूल, दाग, हमराज, जोशीला, कानून, काला पत्थर, धूल का फूल, वक्त और नया दौर कुछ उदाहरण हैं। 
मनमोहन कृष्ण का जन्म 26 फरवरी 1922 को लाहौर, पंजाब, अविभाजित भारत में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है, उनका पूरा नाम मनमोहन कृष्ण चड्ढा था।

 मनमोहन कृष्ण ने लगभग 250 फिल्मों में काम किया, जिनमें नया दौर (1957), साधना (1958), वक्त (1965) और हमराज़ (1967) शामिल हैं। उन्होंने बीस साल बाद (1962) में अपने काम के लिए प्रशंसा प्राप्त की और धूल का फूल (1960) में अब्दुल रशीद की भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता, जहाँ नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक गीत "तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा..." उन पर फिल्माया गया था। इनके अलावा, उन्होंने 12 पंजाबी फिल्मों में भी काम किया, के.ए. अब्बास की शहर और सपना (1963) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता, और पहली इंडो-सोवियत सह-निर्माण परदेसी (1957) में अभिनय किया, जिसे 1958 के कान फिल्म समारोह में गोल्डन पाम के लिए नामांकित किया गया था।  बाद में अपने करियर में उन्होंने यशराज फिल्म्स के लिए हिट फिल्म "नूरी" (1980) का निर्देशन किया, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया।  03 नवंबर 1990 को लोकमान्य तिलक अस्पताल, मुंबई में मनमोहन कृष्ण की मृत्यु हो गई। चयनित फिल्मोग्राफी: अभिनेता के रूप में - 1949 अपना देश 1952 बैजू बावरा शंकर और राही के रूप में 1953 अनारकली परवेज के रूप में 1957 नया दौर जुम्मन दादा और परदेसी के रूप में 1958 साधना लल्लू भाई के रूप में 1960 अंगुलिमाल 1962 बीस साल बाद रामलाल जे के रूप में हेड कांस्टेबल सुंदरलाल के रूप में हुला 1963 गृहस्थी डॉक्टर के रूप में दिल एक मंदिर, शहर और सपना और सेहरा 1965 वक्त मिस्टर मित्तल के रूप में 1967 हमराज़ मिस्टर वर्मा के रूप में नौनिहाल उस्ताद मंशाराम के रूप में उपकार बिसना के रूप में 1968 इज्जत फादर अब्राहम के रूप में 1970 पुष्पांजलि महाराज, रसोइया के रूप में 1972 रामपुर का  लक्ष्मण के रूप में केदारनाथ 1973 जोशीला के रूप में जेलर 1976 मेहबूबा के रूप में बंदे अली खान 1979 काला पत्थर ढाबा मालिक के रूप में 
🎬 निर्देशक के रूप में - 1979 नूरी 

🎥कुछ फिल्में 

1949 अपना देश 'अपना देश है अपना देश' गाना भी गाया
1950 अफसर पार्श्व गायक भी
1951 आराम पार्श्व गायक भी
1951 नादान
1951 सनम
1952 बैजू बावरा शंकर आनंद
1952 राही
1953 अनारकली परवेज
1957 नया दौर जुम्मन दादा
1955 रेलवे प्लेटफ़ार्म सहायक के रूप में कहानी, गीत नाटक, संवाद
1957 परदेसी
1958 साधना लल्लू भाई
1959 धूल का फूल अब्दुल रशीद
1960 अंगुलिमाल अहिंसाक के पिता (राज पुरोहित)
1961 धर्मपुत्र अमृत ​​राय
1962 बीस साल बाद रामलाल/राधेश्याम
1962 झूला हेड कांस्टेबल सुंदरलाल
1963 ग्रहस्ति चिकित्सक
1963 दिल एक मंदिर फ़िलिप
1963 शहर और सपना
1963 सेहरा चीफ तैलब
1964 मैं जट्टी पंजाब दी दारमू पंजाबी फिल्म
1965 वक्त मित्तल
1965 खानदान शंकर लाल
1966 चाड्डियन डि डोली पिता पंजाबी फिल्म
1967 हमराज़ श्री वर्मा
1967 नौनिहाल उस्ताद मंशाराम
1967 उपकार बिस्ना
1968 इज्जत पिता अब्राहम
1969 आदमी और इंसान श्री खन्ना
1970 महाराजा वकील रामदास
पुष्पांजलि महाराज, रसोइया
परदेसी
1972 अपना देश दीनानाथ चंद्र
1972 जोरू का गुलाम मोहनलाल
1972 रामपुर का लक्ष्मण केदारनाथ भार्गव
1973 अनोखी अदा गुप्ता
1973 किशोर चोर दुकांदर
1973 दाग दीवान
1973 जोशीला जलिक
1975 दो जासूस पत्रकार, वी.एन. सिन्हा
1975 दीवार डीसीपी नारंग
1975 मित्तर प्यारे नु बाबा जी पंजाबी फिल्म
1976 आज का महात्मा खन्ना
मजदूर जिंदाबाद सेठ चुन्नीलाल
चरस विजय रमणिकलाल
सैंटो बांतो करतारा पंजाबी फिल्म
महबूबा बंधे अली खान
1977 शिरडी के साईं बाबा गणपतराव
1977 गुरु मानिओ ग्रंथ पंजाबी फिल्म
1978 तुम्हारी कसम रामप्रसाद
1978 त्रिशूल सेठ दीनदयाल
1979 काला पत्थर ढाबा मालिक
1980 सौ दिन सास के सुखलाल, नौकर
1980 नूरी सैजी (कहानीकार) फिल्म के निर्देशक
1981 खून की टक्कर
1982 गोपीचंद जासूस बैंक मैनेजर गिरधारीलाल
1982 सवाल स्वर्गीय दीनानाथ मिश्रा अमान्य
1983 एक दिन बहू का स्कूल मास्टर
न्यायमूर्ति चौधरी
1984 प्रेरणा चौधरी
1985 एक चिट्ठी प्यार भारी दूधवाला
युद्ध (फिल्म) न्यायाधीश
1987 मददगार सोहनलाल
1988 कँवर लाल शास्त्रीजी
विजय न्यायाधीश

दिव्या भारती (जनम)

दिव्या भारती🎂25 फ़रवरी 1974 ⚰️05 अप्रैल 1993
दिव्या भारती
25 फ़रवरी 1974
मुंबई, भारत
मौत
5 अप्रैल 1993 (उम्र 19 वर्ष)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
आवास
मुंबई, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री

दिव्या भारती हिन्दी फिल्मों की एक अभिनेत्री थीं, जिनकी अभिनय विविधता से उन्हें "अपनी पीढ़ी के सबसे चित्ताकर्षक युवा अभिनेत्री " होने का गौरव मिला। 90 के दशक से अपनी करियर की शुरुवात करने वाली दिव्या ने कई प्रकार के व्यावसायिक रूप से सफल गति चित्रों में अभिनय किया है।हिंदी फिल्मों के अलावा दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी दर्शकों से उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। अधिक तत्परता से भारती ने अपनी करियर की शुरुआत तमिल एवं तेलुगु से ही की थी। अभिनय के अतिरिक्त भारती में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की छवि नज़र आती थी।

भारती ने अपने अभिनय की शुरुवात तेलुगु फिल्म बोब्बिली राजा से सन् 1990 में की। शुरुआती समय में भारती को कम महत्व संबंधित भूमिकाएँ दी जाती थीं। फ़िल्मी सफर में उन्हें सफलता हिंदी फिल्म विश्वात्मा से मिली। इसी फिल्म के "सात समुन्दर पार गाने" से उन्हें एक अलग पहचान मिली। सन् 1992 तक भारती स्वयं को बॉलीवुड में एक सफल नायकत्व के रूप में स्थापित कर लिया था। अन्य फिल्में सरूप शोला और शबनम, एक नाटकीय फिल्म जिसमें भारती को निडर रास के भूमिका को दर्शाया। वर्ष 1992 में बनी प्रेम प्रसंगयुक्त फिल्म दीवाना में भारती के निष्पादन ने उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष1992-1993 के मध्य तक भारती ने मात्र 19 वर्ष की आयु में 14-7हिंदी और 7 दक्षिण भारतीय फिल्में की। अपने कम समय के करियर के दौरान मुख्यधारा के सिनेमा के अलावा भारती ने एक शक्तिशाली अभिनय की उत्पत्ति की। उनकी अंतिम पूरी की हुई फिल्में रंग, सह अभिनीत कमल सदानाह और शतरंज, सह अभिनीत जैकी श्रॉफ थी, जिन्हें भारती के वर्ष 5 अप्रैल 1993 में रहस्यमय मरण के बाद जारी किया गया।

यद्यपि भारती को अपने सम्पूर्ण करियर में कई अवनतियों का सामना करना पड़ा, उन्होंने खुद को ढूंढा और स्वयं को बॉलीवुड में एक सफल मुकाम बनाने में कामयाब भी रहीं। वर्ष 1993 में हुई उनकी रहस्मयी मृत्यु से उनका करियर भी समाप्त हो गया।
05 अप्रैल 1993 की देर शाम को, भारती मुंबई के अंधेरी पश्चिम के वर्सोवा में तुलसी बिल्डिंग्स में अपने पांचवें मंजिल के अपार्टमेंट की बालकनी की खिड़की से गिर गईं ।  जब उनकी मेहमान नीता लुल्ला , नीता के पति श्याम लुल्ला , भारती की नौकरानी अमृता कुमारी और पड़ोसियों को पता चला कि क्या हुआ है, तो उन्हें एम्बुलेंस में कूपर अस्पताल के आपातकालीन विभाग में ले जाया गया , जहाँ उनकी मृत्यु हो गई। वह 19 साल की थी। हालांकि उनकी मौत साजिश के सिद्धांतों के अधीन थी, लेकिन उनके पिता ने किसी भी गलत काम से इनकार किया। उनकी मौत का आधिकारिक कारण सिर में चोट और आंतरिक रक्तस्राव माना गया। उनका अंतिम संस्कार 7 अप्रैल 1993 को मुंबई के विले पार्ले श्मशान घाट में किया गया।

भारती का जन्म मुंबई में 25 फरवरी 1974 को हुआ था  उनके पिता ओम प्रकाश भारती और माता मीता भारती थीं।  उनका एक छोटा भाई कुणाल और एक सौतेली बहन पूनम थी, जो ओम प्रकाश भारती की पहली शादी से हुई थी। अभिनेत्री कायनात अरोड़ा उनकी दूसरी चचेरी बहन हैं।  वह हिंदी , अंग्रेजी और मराठी धाराप्रवाह बोलती थीं। अपने शुरुआती वर्षों में, वह अपने चुलबुले व्यक्तित्व और गुड़िया जैसी दिखने के लिए जानी जाती थीं।  उन्होंने मुंबई के जुहू में मानेकजी कूपर हाई स्कूल से पढ़ाई की । भारती स्कूल में एक बेचैन छात्रा थीं और उन्होंने अभिनय करियर बनाने से पहले 9वीं कक्षा पूरी की। 
शोला और शबनम के सेट पर काम करने के दौरान भारती की मुलाकात अभिनेता गोविंदा के माध्यम से निर्देशक-निर्माता साजिद नाडियाडवाला से हुई , जिसके बाद उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया , अपना नाम बदलकर सना रख लिया और 10 मई 1992 को नाडियाडवाला से शादी कर ली मुंबई में नाडियाडवाला के तुलसी बिल्डिंग निवास पर अपने हेयरड्रेसर और दोस्त संध्या, संध्या के पति और एक काजी की उपस्थिति में एक निजी निकाह समारोह में । शादी को गुप्त रखा गया था ताकि उनके समृद्ध फिल्मी करियर पर असर न पड़े।
🎥1993 अंधा इंसाफ़ 
1993 थोली मुद्धू तेलुगु फ़िल्म
1993 शतरंज 
1993 क्षत्रिय 
1993 रंग 
1992 धर्म क्षेत्रम तेलुगु फ़िल्म
1992 शोला और शबनम 
1992 दीवाना 
1992 दिल आशना है 
1992 विश्वात्मा 
1992 दुश्मन ज़माना 
1992 दिल ही तो है 
1992 बलवान 
1992 गीत 
1992 जान से प्यारा 
1992 दिल का क्या कसूर 
1991 राउडि अल्लुडु तेलुगु फ़िल्म
1990 बोब्बिली राजा अभिनेत्री तेलुगु फ़िल्म

दिव्या भारती ने अपनी मृत्यु के समय जो 12 फिल्में साइन की थीं या जिनमें वे अभिनय कर रही थीं उनकी सूची इस प्रकार है 

🎥दिव्या की अधूरी रह गयी फिल्मे

1993 Chinthamani Chinthamani तेलुगू हटाया हुआ 
धनवान अंजलि चोपड़ा हिन्दी करिश्मा कपूर द्वारा प्रतिस्थापित 
1994 लाडला शीतल जेटली हिन्दी श्रीदेवी द्वारा प्रतिस्थापित 
मोहरा रोमा सिंह हिन्दी रवीना टंडन द्वारा प्रतिस्थापित 
दिलवाले स्वप्ना हिन्दी रवीना टंडन द्वारा प्रतिस्थापित 
विजयपथ मोहिनी / वृषाली हिन्दी तब्बू द्वारा प्रतिस्थापित 
1995 आंदोलन गुड्डी हिन्दी ममता कुलकर्णी द्वारा प्रतिस्थापित 
Kartavya काजल हिन्दी जूही चावला द्वारा प्रतिस्थापित 
Kanyadaan — हिन्दी मनीषा कोइराला द्वारा प्रतिस्थापित 
हलचल शर्मिली हिन्दी काजोल द्वारा प्रतिस्थापित 
अंगरक्षक प्रियंका हिन्दी पूजा भट्ट द्वारा प्रतिस्थापित 
दो कदम — हिन्दी
🏆पुरस्कार

1991 फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री – तेलुगु बोब्बिली राजा मनोनीत
1993 नंदी पुरस्कार विशेष जूरी पुरस्कार चित्तेम्मा मोगुडु जीता 
फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री – तेलुगु मनोनीत
फिल्मफेयर पुरस्कार लक्स वर्ष का नया चेहरा दीवाना जीत गया

विशेष;

भारती ने फिल्म में एक अनाम लड़की का किरदार निभाया है, जिसका नाम बाद में सूर्या रखा जाता है।
 इस नाम की कई अलग-अलग वर्तनी हैं। इनमें दिव्या भारती और दिव्या भारती शामिल हैं।
 नौवीं कक्षा, प्रथम वर्ष या ग्रेड 9 भारत में स्कूली शिक्षा का नौवां पोस्ट-किंडरगार्टन वर्ष है
 फ़िल्मों को रिलीज़ की तारीख के क्रम में सूचीबद्ध किया गया है।
 फ़िल्मों को उनके रिलीज़ वर्ष के क्रम में सूचीबद्ध किया गया है।

Monday, February 24, 2025

शहीद कपूर (जनम)

शाहिद कपूर
25 फ़रवरी 1981 
 नई दिल्ली
पत्नी: मीरा राजपूत (विवा. 2015)
माता-पिता: पंकज कपूर, नीलिमा अज़ीम
लंबाई: 1.73 मी
भाई: ईशान खट्टर, रूहान कपूर, सनाह कपूर
उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत, संगीत विडियो और विज्ञापन में काम कर के की। कपूर ने पहली बार बॉलीवुड में सुभाष घई की ताल (१९९९) में पृष्ठभूमि डांसर के रूप में काम किया। ४ साल के बाद, उन्होंने इश्क विश्क (२००३) में मुख्य अभिनेता के रूप में काम किया और अपने अच्छे प्रदर्शन के लिए फ़िल्म फेयर बेस्ट मेल डेब्यू पुरस्कार (Filmfare Best Male Debut Award) जीता। अपनी फिल्मों जैसे फिदा (२००४) और शिखर (Shikhar) (२००५) में किए गए प्रदर्शन के लिए उनकी बहुत अधिक समीक्षा की गई, उन्हें अपनी पहली व्यावसायिक सफलता सूरज बड़जात्या की विवाह (Vivah) (२००६), उनकी सबसे बड़ी व्यापारिक सफलता थी और बाद में उन्होंने इसे जब वी मेट (२००७) के साथ जारी रखा। तब से, उन्होंने अपने आप को फ़िल्म उद्योग का एक सफल अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया है।शाहिद कपूर का जन्म २५ फ़रवरी १९८१ को हुआ। शाहिद कपूर भारतीय कलाकार हैं। शाहिद कपूर पंकज कपूर के बेटे हैं। वह रझन्स विद्यालय में पड़ते थे। यह विद्यालय मुंबई में स्थित है। जो कि इसका संघठन है।

कैरियर

कैरियर की शुरुआत, २००५ तक
एक अभिनेता के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने से पहले, शाहिद कई संगीत विडियो और विज्ञापनों में काम कर चुके थे, जिनमें पेप्सी (Pepsi) का व्यावसायिक विज्ञापन शामिल है, उन्होंने कुछ कुछ होता है के बाद शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी के साथ काम किया, (१९९८)। ऐसा करने के दौरान, उन्होंने कला के प्रदर्शन के लिए (Shiamak Davar Institute for the Performing Arts) शामक डावर संस्थान (SDIPA) में जाने का निश्चय किया, जहाँ बाद में उन्हें सुभाष घई (Subhash Ghai) की फ़िल्म ताल (Taal) में पृष्ठभूमि डाँसर के रूप में देखा गया, यह डाँस उन्होंने अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के साथ, गाने कहीं आग लगे लग जावे में किया।

२००३ में कपूर ने केन घोष की सामान्य रूप से सफल प्रेम कहानी इश्क विश्क में प्रमुख भूमिका निभाई, जिसमे वे राजीव माथुर नामक स्वछंद युवा बने थे।अमृता राव और शहनाज़ ट्रेज़रीवाला के विपरीत प्रदर्शन करने वाली फ़िल्म का आलोचकों ने स्वागत किया और कपूर के प्रदर्शन ने उन्हें फ़िल्म फेयर बेस्ट मेल डेब्यू पुरस्कार (Filmfare Best Male Debut Award) दिलाया। फिल्म समीक्षक तरण आदर्श ने (Taran Adarsh) भारत FM से लिखा (indiaFM) था, "शाहिद कपूर एक देखने योग्य अभिनेता है। उसमें शीर्ष स्थान पर पहुँचने के लिए सभी गुण मौजूद हैं। वह न केवल देखने में अच्छे हैं, बल्कि वो एक अद्भुत कलाकार भी हैं। एक प्रदर्शनकर्ता के रूप में मौलिक लगने वाले, इस युवा ने नाटकीय और भावनात्मक क्षणों को सजीव प्रकार से निभाया है। वह एक असाधारण डाँसर भी है। उसे सिर्फ़ इतना करने की जरुरत है कि वह सावधानी के साथ अपने आगामी कार्य को चुने, ताकि शीर्ष स्थान तक पहुँचने के लिए उसे बाधाओं का कम से कम सामना करना पड़े."

अगले वर्ष कपूर ने निर्देशक केन घोष के साथ रोमांचक फ़िल्म फिदा दी, जिसमें उन्होंने करीना कपूर और फरदीन खान के साथ काम किया। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कमाल नहीं दिखा पायी, फिर भी कपूर के प्रदर्शन की सराहना की गई . द ट्रिब्यून ने निष्कर्ष निकाला, " ...शाहिद कपूर अपनी भूमिका में शाईन कर रहे हैं। वो फ्रेश दिखाई देते हैं। एक भावुक और मासूम लड़के के रूप में, जो अपने इन गुणों के कारण अपराध की दुनिया में भेजा जा चुका है, वो आपकी सहानुभूति पाने की कोशिश कर रहा है।"इसके बाद वे रोमांटिक कॉमेडी दिल मांगे मोर में सोहा अली खान, ट्यूलिप जोशी और आयशा टाकिया के विपरीत दिखाई दिए। उनके प्रदर्शन को एक मिश्रित समीक्षा मिली; Rediff.com ने लिखा कि " शाहिद अक्सर शाहरुख खान की नकल करने की बहुत कोशिश करते हैं। उन्होंने कुछ दृश्यों में अच्छा किया है, कुछ में जरुरत से ज्यादा.....

२००५ में तीन और फिल्में आईं, जिन्होंने कपूर की सफलता को जारी रखा।यद्यपि, उन्होंने जयदेव वर्धन नामक व्यक्ति की भूमिका निभायी, जो धन और लालच की दुनिया में आकर जॉन एम॰ बन गया। Matthan की ड्रामा शिखर (Shikhar) समीक्षकों द्वारा सराही गई। इसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के नामांकन के लिए (Star Screen Award for Best Actor) स्टार स्क्रीन पुरस्कार दिलाया। इंडिया FM के अनुसार," शहीद कपूर एक ऐसे अभिनेता हैं जो हर फ़िल्म के साथ अपने आप को बेहतर बना रहे हैं। वे लगभग सभी दृश्यों में अजय के समान लगते हैं।"

सफलता, २००६ - वर्तमान
२००६ में स्थितिओं में परिवर्तन आया कपूर को बॉक्स ऑफिस पर अपनी पहली सफलता मिली, ये सफलता multi-starrer फ़िल्म ३६ चाईना टाऊन के लिए मिली। सात व्यक्तियों और एक हत्या, के चारों और घूमती हुई इस कहानी को, आर्थिक सफलता प्राप्त करने के बावजूद, आलोचकों की मिश्रित समीक्षा प्राप्त हुई.फ़िल्म के रिलीज़ होने के कुछ समय बाद ही, कपूर की साल की दूसरी रिलीज़ हुई ; प्रियदर्शन (Priyadarshan) की कॉमेडी चुप चुप के (Chup Chup Ke)। फ़िल्म को बॉक्स ऑफिस पर मध्यम सफलता मिली।

कपूर की २००६ की अंतिम रिलीज़ थी सूरज आर॰ बड़जात्या की रोमांटिक ड्रामा विवाह (Vivah), इसमें दो लोगों की सगाई से लेकर शादी तक के समय का सजीव चित्रण किया गया है। सह कलाकार अमृता राव के साथ काम करते हुए, फ़िल्म ने अधिकाँश समीक्षकों की सराहना प्राप्त की। यह साल की सबसे अधिक आमदनी वाली फ़िल्म बन गई, साथ ही यह अब तक कपूर की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता थी।कपूर के प्रदर्शन को दर्शकों और समीक्षकों के द्वारा सराहा गया, उन्हें लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के स्टार स्क्रीन पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। तरण आदर्श ने लिखा, " शाहिद कपूर ने ऐसा प्रदर्शन पहले कभी नहीं किया है। यदि वे इश्क विश्क में सुपर-कूल थे, और फिदा में उन्होंने अपनी योग्यता की चमक को दर्शाया, तो आपको उन्हें एक विकसित महान अभिनेता के रूप में विवाह में देखना ही होगा। भावनात्मक दृश्यों में वे बहुत ही अच्छे रहे हैं।

२००६ की गर्मियों के दौरान, कपूर अपने पहले विश्व दौरे पर Rockstars Concert बॉलीवुड के सितारों के साथ, सलमान खान, करीना कपूर, जॉन अब्राहम, ईशा देओल, मल्लिका शेरावत और जायेद खान गए (Zayed Khan).

२००७ में, कपूर दो फिल्मों में आए। उनकी पहली रिलीज़ थी अहमद खान की Fool and Final (Fool and Final)। फ़िल्म को नकारात्मक समीक्षा मिली और बॉक्स ऑफिस पर ये बहुत अच्छा नहीं कर पाई। कपूर के प्रदर्शन को बहुत अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया गया। उनकी अगली फिल्म, इम्तियाज़ अली की कॉमेडी- रोमांस (comedy-romance)जब वे मेट (Jab We Met) करीना कपूर के विपरीत, साल की एक सबसे बड़ी हिट बन गई।फ़िल्म की कहानी दो विपरीत व्यक्तित्व वाले लोगों के बारे में है जो एक दूसरे से एक ट्रेन में मिलते हैं और अंत में उन्हें एक दूसरे से प्यार हो जाता है। कपूर, आदित्य कश्यप के भूमिका में हैं जो एक युवा, निराश उद्योगपति है। फ़िल्म की समीक्षकों के द्वारा बहुत अधिक सराहना की गई, यह सामान्य रूप से दो लोगों के बीच की केमिस्ट्री को बता रही है। कपूर के प्रदर्शन की भी प्रशंसा की गई। उन्हें फ़िल्म फेयर सहित कई पुरस्कार समारोहों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए कई नामांकन मिले। CNN-IBN से राजीव मसंद (CNN-IBN) ने लिखा," उनके साथ काम कर रही करीना कपूर के सामने छुपने के जोखिम के बावजूद, शाहिद ने अपनी परिपक्व भूमिका के साथ, एक अमिट छाप छोड़ी है और वास्तव में करीना के उग्र व्यवहार के लिए वे सफल साबित हुए हैं। दोनों मिलकर ऐसा प्रदर्शन कर रहे हैं कि उन दोनों की केमिस्ट्री की क्षमता, पट कथा में कई विसंगतियों को ढकने के लिए पर्याप्त है,"

निजी जीवन

अभिनेता पंकज कपूर और अभिनेत्री / शास्त्रीय नर्तकी नीलिमा अज़ीम, कपूर उनके माता-पिता हैं, उनका तलाक हो गया जब वे तीन साल के थे। उनके माता-पिता के तलाक के बाद, वे सामान्यतः अपनी माता के साथ रहते थे, उनके पिता और सौतेली माँ सुप्रिया पाठक (Supriya Pathak) के साथ भी अच्छे सम्बन्ध थे। कपूर, जो शाकाहारी हैं, की एक बहन सना और एक भाई ईशान कपूर (Ishaan Kapoor) भी है ; उनके भाई ने उनके साथ फ़िल्म वाह ! में काम किया है। लाइफ हो तो ऐसी (Vaah! Life Ho To Aisi) (2005).उनके नाना अनवर अज़ीम (Anwar Azeem) एक जाने माने मार्क्सवादी (Marxist) पत्रकार और बिहार से लेखक हैं

7 जुलाई 2015 को उनकी शादी दिल्ली की मीरा राजपूत के साथ हुई।

२००४ में कपूर ने अभिनेत्री करीना कपूर के साथ डेटिंग शुरू की, जो उनसे तीन साल बाद अलग हो गईं। उनके अनुसार, उन दोनों के सम्बन्ध अच्छे रहे हैं, वे कहते हैं कि " मैं चाहता हूँ कि उसे [ करीना ] दुनिया में हर खुशी मिले। मैं उसका बहुत सम्मान करता हूँ। वह एक बहुत ही अच्छी लड़की है".

🎥फिल्मोग्राफी

१९९९ ताल (Taal) 
२००३ इश्क विश्क 
२००४ 
फिदा 
दिल मागे मोर
२००५ 
दीवाने हुए पागल 
वाह ! लाइफ हो तो ऐसी (Vaah! Life Ho To Aisi)
शिखर (Shikhar)
२००६ 
36 चाईना टाउन (36 China Town) 
चुप चुप के (Chup Chup Ke) 
विवाह (Vivah)
२००७ 
Fool and Final (Fool and Final) 
जब वी मेट (Jab We Met)
२००८ किस्मत कनेक्शन (Kismat Konnection)
२००९ 
कमिने (Kaminey) 
दिल बोले हड़प्पा (Dil Bole Hadippa!)
२०१० 
मिलेंगे मिलेंगे (Milenge Milenge) 
चांस पे डांस (Chance Pe Dance) 
बदमाश कंपनी (Badmaash Company) 
पाठशाला (Paathshaala)
२०११ Mausam 
२०१२ तेरी मेरी कहानी
२०१३ 
बॉम्बे टॉकीज 
फटा पोस्टर निकला हीरो 
आर ... राजकुमार
२०१४ 
हैदर Haider 
एक्शन जैक्सन
२०१५ शानदार 
२०१६ उड़ता पंजाब 
२०१७ रंगून
२०१७ पद्मावती 
२०१९ कबीर सिंह

डैनी डेन्जोंगपा (जनम)

डैनी डेन्जोंगपा जन्म 25 फरवरी 1948

डैनी डेन्जोंगपा को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं

डैनी डेन्जोंगपा  भूटिया वंश के एक भारतीय अभिनेता, गायक और फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने मुख्य रूप से बॉलीवुड फिल्मों में काम किया है, हालांकि वे कई नेपाली, तमिल, बंगाली और तेलुगु और असमिया फिल्मों में भी दिखाई दिए हैं। उन्होंने 1971 से अब तक लगभग 190 हिंदी फिल्मों में अभिनय किया है। 2003 में, डेन्जोंगपा को भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनका फ़िल्मी करियर 4 दशकों से भी ज़्यादा लंबा है। उन्होंने कुछ अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट में भी काम किया है, जिनमें सबसे मशहूर है सेवन इयर्स इन तिब्बत जिसमें उन्होंने हॉलीवुड अभिनेता ब्रैड पिट के साथ अभिनय किया था।  उनकी सबसे प्रसिद्ध खलनायक भूमिकाएँ धुंध, 36 घंटे, बंदिश फ़िल्म (1980), जियो और जीने दो, धर्म और क़ानून और अग्निपथ में हैं और उन्हें फ़कीरा, चोर मचाए शोर, देवता (1978), कालीचरण, बुलुंडी और अधिकार (1986 फ़िल्म) जैसी सकारात्मक भूमिकाओं में उनके प्रदर्शन के लिए याद किया जाता है। उनके निर्देशन में बनी फ़िल्म फिर वही रात को हिंदी सिनेमा की शीर्ष पाँच सर्वश्रेष्ठ हॉरर सस्पेंस फ़िल्मों में से एक माना जाता है।

डैनी डेन्जोंगपा का जन्म 25 फ़रवरी 1948 को गंगटोक में एक बौद्ध परिवार में शेरिंग फ़िंटसो डेन्जोंगपा के रूप में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा बिरला विद्या मंदिर, नैनीताल से की और उसके बाद 1964 में सेंट जोसेफ़ कॉलेज, दार्जिलिंग से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। डेन्जोंगपा का घोड़ों और घुड़सवारी के प्रति प्रेम कम उम्र में ही शुरू हो गया था, क्योंकि उनका परिवार घोड़ों के प्रजनन में लगा हुआ था। वह एक चित्रकार, लेखक और मूर्तिकार भी हैं।

डैनी डेन्जोंगपा की भारतीय सेना में शामिल होने की महत्वाकांक्षा थी और उन्होंने पश्चिम बंगाल से सर्वश्रेष्ठ कैडेट का पुरस्कार जीता और गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार को दिए एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रतिष्ठित सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय, पुणे के लिए अर्हता प्राप्त की थी, लेकिन फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII), पुणे में शामिल होने के लिए प्रवेश वापस ले लिया। उन्होंने अपने तत्कालीन सहयोगी जया बच्चन की सिफारिश पर अपना नाम बदलकर एक सरल ध्वनि वाला "डैनी" रखने का फैसला किया, क्योंकि उनका मूल नाम - शेरिंग फिंटसो डेन्जोंगपा - उच्चारण करने में कठिन पाया गया था। उनके बेटे रिनजिंग डेन्जोंगपा ने एक्शन फिल्म स्क्वाड में अपने अभिनय की शुरुआत की।

डैनी डेन्जोंगपा ने 1971 में बी.आर. इशारा की ज़रूरत (1972 में रिलीज़) से शुरुआत की, जो उनकी पहली फ़िल्म थी। उन्हें गुलज़ार की मेरे अपने (1971) में अपना बड़ा ब्रेक मिला, जहाँ उन्होंने एक सकारात्मक भूमिका निभाई थी।  उन्होंने बी.आर. चोपड़ा की धुंध (1973) में अपनी पहली प्रमुख नकारात्मक भूमिका निभाई थी। जहाँ उन्होंने एक अपंग और निराश पति की भूमिका निभाई थी। 1970 के दशक में डैनी, विभिन्न भूमिकाएँ करने के लिए तेज़ी से खुले थे।

ऐसा कहा जाता है कि डैनी फिल्म शोले में "गब्बर सिंह" की प्रतिष्ठित भूमिका निभाने के लिए पहली पसंद थे। हालाँकि, चूँकि वे फिरोज खान की फिल्म धर्मात्मा की शूटिंग पर थे, इसलिए अंततः गब्बर की भूमिका अमजद खान को मिल गई।

डैनी डेन्जोंगपा ने सत्तर के दशक में चोर मचाए शोर, 36 घंटे, फकीरा, संग्राम (1976), कालीचरण, काला सोना और देवता (1978) जैसी व्यावसायिक रूप से सफल समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों में दूसरे मुख्य नायक की भूमिका निभाई और अधिक सकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं। फिल्म देवता (1978) में उनके प्रदर्शन के बाद, उन्हें अधिक महत्वपूर्ण लंबी भूमिकाएँ मिलनी शुरू हो गईं।  उन्होंने आशिक हूँ बहारों का, पापी, बंदिश, द बर्निंग ट्रेन और चुनौति जैसी बड़ी बजट की फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं।

1980 के दशक की शुरुआत में, डैनी डेन्जोंगपा ने फ़िल्में छोड़ने के बारे में सोचा था। एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने फ़िल्म निर्देशित करने का फ़ैसला क्यों किया, तो उन्होंने कहा, "मुझे याद है कि 80 के दशक में मैं अपनी फ़िल्मों से बहुत ऊब गया था। उन दिनों हर खलनायक डाकू होता था और मुझे याद है कि मैं सेट पर जाता था जहाँ तिवारी नाम का एक अभिनेता मेरा गुर्गा था और मेरा अड्डा लालटेन वाली एक गुफा थी। अगले दिन मैं दूसरे सेट पर गया और मैंने देखा कि तिवारी फिर से मेरा गुर्गा था, और वही लालटेनें थीं। मैंने खुद से पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ? मैंने मुंबई छोड़ दिया। मैंने बहुत सारी ट्रेकिंग की और कुछ सालों तक फ़िल्में नहीं कीं। मैंने एनएन सिप्पी को एक स्क्रिप्ट के बारे में बताया जो मेरे दिमाग में थी। और उन्होंने मुझे निर्देशन करने के लिए कहा।
मैंने राजेश खन्ना और अपनी तत्कालीन गर्लफ्रेंड किम के साथ फिर वही रात बनाई थी।" अपने निर्देशन की पहली फिल्म की सफलता के बाद, उन्हें 1981 में बुलुंडी और हम से बढ़कर कौन जैसी फिल्मों में फिर से नायक के रूप में अभिनय करने के प्रस्ताव मिले, जो सफल रहीं। उन्होंने फिल्म बुलुंडी में दोहरी भूमिका निभाई। हालांकि, 1981-83 के बीच डैनी की अधिकांश बाद की फिल्में सफल नहीं रहीं। वह अपनी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म अभी तो जी ले की असफलता से निराश थे, जिसमें "तू लाली है सवेरीवाली" जैसे लोकप्रिय गाने थे। इसलिए, डैनी ने सहायक भूमिकाएँ स्वीकार करना शुरू कर दिया, अक्सर अपनी वास्तविक उम्र से काफी बड़े किरदार निभाते थे। उन्होंने लव स्टोरी (1981) में कुमार गौरव के ससुर और बॉक्सर (1984) में मिथुन चक्रवर्ती के पिता की भूमिका निभाई।

डैनी डेन्जोंगपा को फिर वही रात, जियो और जीने दो और धर्म और कानून फिल्मों की सफलता के बाद हिंदी फिल्मों में नकारात्मक किरदार निभाने के लिए लगातार प्रस्ताव मिलने लगे  1984 से लेकर 1990 के दशक तक डैनी मुख्य रूप से उस समय के सभी प्रमुख अभिनेताओं जैसे राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, विनोद खन्ना, अनिल कपूर और सनी देओल के साथ मुख्य नकारात्मक किरदार में नज़र आए। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा;  "अगर ऐसा नहीं होता कि मैंने चार विशेष नकारात्मक भूमिकाएँ नहीं की होतीं - राजेश खन्ना के साथ, मुख्य भूमिका में - फिर वही रात, धर्म और कानून, बंदिश और आशिक हूँ बहारों का, तो लोग मुझे खलनायक भूमिकाओं के लिए नहीं मानते। अधिकार (1986 फ़िल्म) में मेरी सकारात्मक भूमिका थी।

डैनी डेन्जोंगपा के सबसे प्रशंसित नकारात्मक किरदार बंदिश (1980) में कपिल के रूप में हैं;  कुमार, फिर वही रात "अशोक" के रूप में, धर्म और कानून (1984), एसपी "करण" के रूप में, कानून क्या करेगा (1984), "रघुवीर सिंह" के रूप में, अंदर बाहर (1984), "शेरा" के रूप में, ऊंचे लोग (1985), "ठाकुर मान सिंह", आंधी तूफान (1986) के रूप में "बलबीर" भगवान दादा (1986), के रूप में  "गंगवा", अग्निपथ (1990),  "कांचा चीना", हम (1991), "बख्तावर", घातक: घातक, "कात्या", क्रांतिवीर (1994), "चतुर सिंह", पुकार, (2000) "भ्रष्ट" और इंडियन, "शंकर सिंघानिया" के रूप में। उन्हें फिल्म सनम बेवफा और 1942: ए लव स्टोरी में प्राण के खिलाफ खड़ा किया गया था। हिंदी भाषा पर उनकी पकड़ सावन कुमार की सनम बेवफा और मुकुल आनंद की खुदा गवाह जैसी फिल्मों में काम आई।

एक समय में, जब डैनी डेन्जोंगपा तेजी से नकारात्मक मुख्य भूमिकाएँ कर रहे थे, राजकुमार संतोषी ने उन्हें चाइना गेट (1998) में सकारात्मक भूमिका के लिए कास्ट किया। 2000 के दशक की शुरुआत में, डैनी ने अशोका और 16 दिसंबर (2002) जैसी फिल्मों में शानदार प्रदर्शन किया। उनके द्वारा निभाई गई कुछ एंटीहीरो भूमिकाओं में एक बेईमान राजनेता, भ्रष्ट पुलिसकर्मी, देशद्रोही और कंजूस जमींदार शामिल थे।  उन्होंने कुछ अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं में भी काम किया है, जिनमें सबसे मशहूर है सेवन इयर्स इन तिब्बत, जिसमें उन्होंने हॉलीवुड अभिनेता ब्रैड पिट के साथ काम किया। उन्होंने लहू के दो रंग, बुलुंडी, बॉक्सर, हमसे बढ़कर कौन, खुदा गवाह, 16 दिसंबर और चाइना गेट में सकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं।

डैनी ने 2003 की शुरुआत में फिल्मों से ब्रेक लेने का फैसला किया क्योंकि वह अलग लेकिन मजबूत भूमिकाएँ करना चाहते थे, भले ही वह नकारात्मक किरदार ही क्यों न हो। वह 2003 से 2009 के बीच केवल 10 फिल्मों में दिखाई दिए।

डैनी डेन्जोंगपा ने फिर एंथिरन में अपनी भूमिका के साथ खलनायक के रूप में एक मजबूत वापसी की। उन्होंने एंथिरन के साथ तमिल फिल्मों में अपनी शुरुआत की, जिसमें रजनीकांत और ऐश्वर्या राय मुख्य भूमिका में थे। डेन्जोंगपा ने बोहरा की खलनायक भूमिका निभाई, जो एक प्रमुख वैज्ञानिक है जो "चिट्टी" (रजनीकांत द्वारा अभिनीत) को एक दुष्ट रोबोट में बदल देता है।  इसके बाद उन्होंने जय हो (2014), जिसमें सलमान खान ने सह-अभिनय किया और बैंग बैंग (2014), जिसमें ऋतिक रोशन ने सह-अभिनय किया, जैसी बड़ी बजट की फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभानी शुरू की।

डैनी डेन्जोंगपा ने 2015 की हिट फिल्म बेबी में कोऑर्डिनेटर "फ़िरोज़ खान" की भूमिका निभाई है, जिसमें अक्षय कुमार ने सह-अभिनय किया था। उन्होंने फिल्म के स्पिन-ऑफ प्रीक्वल नाम शबाना में "फ़िरोज़ खान" की अपनी भूमिका को दोहराया डैनी डेन्जोंगपा एक निपुण गायक हैं, जिन्होंने भारतीय संगीत की तीन दिग्गज गायिकाओं लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और आशा भोसले के साथ गाने गाए हैं। उन्हें सबसे पहले 1972 में देव आनंद ने फ़िल्म ये गुलिस्ताँ हमारा में गाने का मौक़ा दिया था। डैनी ने लता मंगेशकर के साथ एक युगल गीत गाया - मेरा नाम आओ... जिसे जॉनी वॉकर और जयश्री.टी पर फ़िल्माया गया था। उन्होंने नेपाली गाने रिलीज़ किए हैं और नेपाली फ़िल्मों के लिए गाने गाए हैं।  1970 के दशक में रिकॉर्ड किए गए उनके दो सबसे मशहूर गाने, लेकिन आज भी लोकप्रिय हैं, "चिसो चिसो हवामा" ("ठंडी हवा में") और "मनको कुरा लाई बांधी नारखा... ("दिल की बातों को बांध कर मत रखो")। उन्होंने आशा भोसले के साथ काला सोना में युगल गीत "सुन सुन कसम से" गाया और 1978 की फ़िल्म नया दौर में मोहम्मद रफ़ी के साथ युगल गीत "मुझे दोस्तों तुम गले लगालो" गाया - दोनों ही आर. डी. बर्मन द्वारा रचित थे।

डैनी डेन्जोंगपा ने 1976 में आशा भोसले के साथ एक नेपाली युगल गीत "आगे आगे टोपी को गोला पच्ची पच्ची मशीनगन बरारा" गाया है। यह गीत डैनी ने राजेश खन्ना को दिखाया था, जिन्हें यह गीत बेहद पसंद आया था। फिर राजेश खन्ना ने आर. डी. बर्मन से 1981 की फ़िल्म  फिर वही रात, जिसका निर्देशन डैनी ने खुद किया था - डैनी द्वारा गाए गए नेपाली लोकगीत "आगे आगे टोपाइको गोला" की धुन से प्रेरित होकर। आर. डी. बर्मन ने अंतराल और छंदों की धुन बदल दी, लेकिन शुरुआत की धुन को बरकरार रखा।

उनके सभी नेपाली गाने हिट हैं और लोग आज भी उन्हें पसंद करते हैं।  "ह्युन वंदा चिसो, आगो वंदा तातो..."
("बर्फ से भी ठंडा, आग से भी गर्म.."), "नाचना होई मच्यान हौ नचना", ("डांस ओ प्यारी लड़की"), "झिमकई देउ परेली मनमा बजछा मिठो मुरली...", ("कृपया अपनी आँखें झपकाएँ और दिल में बांसुरी की मधुर ध्वनि बजती है), "रतो रानी फुले घैं संजामा", "पानी है परयो झ्योरे" आदि उनके कुछ हिट नंबर हैं। उन्होंने 1975-1990 की अवधि में विशेष रूप से नेपाल, दार्जिलिंग, सिक्किम और असम जैसी जगहों पर एक गायक के रूप में लोकप्रियता हासिल की।

डैनी डेन्जोंगपा ने नेपाली फिल्म सैनो ​​लिखी और उसमें अभिनय किया जो सुपरहिट रही। उनके भतीजे उग्येन छोपेल ने इसका निर्देशन किया। उन्होंने इसका शीर्षक गीत और उदित नारायण की पत्नी दीपा नारायण के साथ एक युगल गीत गाया है। बाद में, यह फिल्म हिंदी में अजनबी नाम से बनाई गई  दूरदर्शन डीडी के लिए एक टेलीफिल्म)।

डैनी, जिन्होंने सिक्किम की राजकुमारी और अपने गृहनगर गंगटोक के अंतिम चोग्याल की भतीजी गवा डेन्जोंगपा से विवाह किया। उनका एक बेटा है जिसका नाम रिनजिंग और एक बेटी है जिसका नाम पेमा है। उनके भाई के पास सिक्किम के मेली में एक बौज और बीयर फैक्ट्री है।

🎥डैनी डेन्जोंगपा की फिल्मोग्राफी -

1971 मेरे अपने
1972 जरुरत, मिलाप, राखी और हथकड़ी
           ये गुलिस्तां हमारा
1973 नई दुनिया नये लोग, धुंध
           नया नशा कथावाचक अप्रकाशित
           खून खून, चालाक
1974 घाटना, खोटे सिक्के
           चोर मचाये शोर,
           वड़ा तेरा वड़ा, 36 घंटे
           एक लड़की बदनाम सी
1975 अपने रंग हज़ार, ज़ोरो
           धर्मात्मा, काला सोना, रफ़्तार     
           पोंगा पंडित रॉकी, माउंटो
           आखिरी दाओ
           रानी और लाल परी विशेष प्रस्तुति
1976 कालीचरण, फकीरा, लैला मजनू
           संग्राम, गुमराह
1977 अभी तो जी लें, पापी
           आशिक हूं बहारों का 
           चांदी सोना, खेल खिलारी का
1978 नया दौर, देवता
           लाल कुथी (बंगाली फिल्म)
1979 पहरेदार, गृह प्रवेश
           लहू के दो रंग, हीरा-मोती
           आज की धारा
1980 काली घटा, चुनौती, बंदिश
           द बर्निंग ट्रेन, अब्दुल्ला
           चोरों की बारात, फिर वही रात
1981 बुलुंडी, लव स्टोरी
           हम से बढ़कर कौन
1982 प्रहरी (बंगाली फ़िल्म)
           कच्चे हीरे, डायल 100, लक्ष्मी
           राज महल, जियो और जीने दो
           उस्ताद करो
1983 सिसकियाँ, गंगा मेरी माँ
           कंकू नी किमत (गुजराती फिल्म)
           अंधा कानून, प्रेमी
           मुझे इन्साफ चाहिए
           मुझे वचन दो,  नौकर बीवी का
हम से है जमाना
1984 बॉक्सर, फरिश्ता, धर्म और कानून
           अन्दर बाहर, जागीर, मंजिल मंजिल
           करिश्मा, कानून क्या करेगा
           मेरा दोस्त मेरा दुश्मन
           दिलावर
1985 पत्थर, प्यार झुकता नहीं
           ऐतबार, आँधी तूफ़ान, जवाब
           युद्ध, बायें हाथ का खेल
           महाशक्तिमान, ऊँचे लोग
           ज़ुल्म का बदला, पत्थर दिल
           राम तेरे कितने नाम
1986 भगवान दादा, अधिकार
           चंबल का बादशाह, अल्लाह रक्खा
1987 इतिहास, आग ही आग, फ़क़ीर बादशाह
           मिट जायेंगे मिटाने वाले, दिलजला
           कौन कितने पानी में
           दीवाना तेरे नाम का
1988 अंजाम खुदा  जाने
           मर्दों वाली बात, पाप की दुनिया
           एक ही मकसद, शूरवीर
           कमांडो, सूरमा भोपाली
           जनम जनम, यतीम, ज़लज़ला
           मेरा शिकार, जीते हैं शान से
           गुनाहों का फैसला
           सैनो (नेपाली फिल्म)
1989 उस्ताद, सौ साल बाद, साया
           कसम सुहाग की, दो यार
           जंग बाज़, खोज, शहजादे
           पांच पापी, गलियों का बादशाह
1990 प्यार के नाम कुर्बान, अग्निपथ
           शानदार, गुनाहों का देवता
           शेषनाग, जगीरा, चिंगारियाँ
           शेषनाग
1991 सनम बेवफ़ा, हम, विष्णु-देवा
           योद्धा, लक्ष्मणरेखा
           पहला प्रेम पत्र
1992 बहादुर (बंगाली फ़िल्म)
           खुले-आम, खुदा गवाह, बंधु
           बलवान, एंथम
           किसमें कितना है दम
1993 संग्राम, धरतीपुत्र, गुरुदेव
           तहकीकात, प्रतीक्षा, जय देवा, बुलंद
1994 अजनबी (दूरदर्शन टीवी श्रृंखला)
           एपिसोड: "परिचयात्मक"
           चौराहा, मोहब्बत की आरज़ू
1994 1942: ए लव स्टोरी, क्रांतिवीर
           विजयपथ
1995 फैसला मैं करूंगी, बरसात
           सरहद: अपराध की सीमा
1996 मुट्ठी भर ज़मीन, राजकुमार
           सेना, शस्त्र, घातक : घातक
           राम और श्याम
1997 तिब्बत में सात वर्ष, उड़ान
           हिमालय पुत्र
           ढाल: कानून की लड़ाई
1998 विनाशक: विध्वंसक 
           ज़ुल्म ओ सितम, चीन  दरवाज़ा
1999 सिलसिला है प्यार का, हंगामा
           दहेक: एक ज्वलंत जुनून
2000 पुकार, तूने मेरा दिल ले लिया
2001 जगीरा, अधिकारी, लज्जा, अशोक
           भारतीय, मोक्ष
2002 ये मोहब्बत है, 16 दिसंबर
           अब के बरस सोच
2003 संध्या, शिकार
           एक हिंदुस्तानी: विशेष उपस्थिति
2004 अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
2005 दिल जो भी कहे... कथावाचक
2007 हैट्रिक, बिग ब्रोथ, फ्रोज़न कर्मा
2008 चमकू, करज़्ज़, लक ई
2009 एसिड फैक्ट्री
2010 एंथिरन (तमिल फ़िल्म)
2013 बॉस बिग बॉस
2014 जय हो, बैंग बैंग!  उमर जफर
2015 बेबी
2017 नाम
2018 बायोस्कोपवाला
2019 मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ़ झाँसी
           गुलाम गौस खान
2022 उंचाई


शाहिद कपूर

#25feb 
शाहिद कपूर
25 फरवरी 1981 
नई दिल्ली , भारत
अन्य नामों
शाहिद कपूर
शाहिद खट्टर
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
2003-वर्तमान
काम करता है
पूरी सूची
जीवनसाथी
मीरा राजपूत ​( एम.  2015 )
अभिभावक)
पंकज कपूर
नीलिमा अज़ीम
रिश्तेदार
ईशान खट्टर (सौतेला भाई)
सुप्रिया पाठक (सौतेली माँ)

एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी फ़िल्मों में दिखाई देते हैं। शुरुआत में रोमांटिक भूमिकाओं को चित्रित करने के लिए पहचाने जाने वाले, उन्होंने बाद में एक्शन फ़िल्मों और थ्रिलर में भूमिकाएँ निभाईं, और तीन फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों सहित कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता हैं।

उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत, संगीत विडियो और विज्ञापन में काम कर के की। कपूर ने पहली बार बॉलीवुड में सुभाष घई की ताल (1999) में पृष्ठभूमि डांसर के रूप में काम किया। 4साल के बाद, उन्होंने इश्क विश्क (2003) में मुख्य अभिनेता के रूप में काम किया और अपने अच्छे प्रदर्शन के लिए फ़िल्म फेयर बेस्ट मेल डेब्यू पुरस्कार (Filmfare Best Male Debut Award) जीता। अपनी फिल्मों जैसे फिदा (2004) और शिखर (Shikhar) (2005) में किए गए प्रदर्शन के लिए उनकी बहुत अधिक समीक्षा की गई, उन्हें अपनी पहली व्यावसायिक सफलता सूरज बड़जात्या की विवाह (Vivah) (2006), उनकी सबसे बड़ी व्यापारिक सफलता थी और बाद में उन्होंने इसे जब वी मेट (2007) के साथ जारी रखा। तब से, उन्होंने अपने आप को फ़िल्म उद्योग का एक सफल अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया है।शाहिद कपूर का जन्म  25फ़रवरी 1981को हुआ। शाहिद कपूर भारतीय कलाकार हैं। शाहिद कपूर पंकज कपूर के बेटे हैं। वह रझन्स विद्यालय में पड़ते थे। यह विद्यालय मुंबई में स्थित है। जो कि इसका संघठन है।
अभिनेता पंकज कपूर और अभिनेत्री / शास्त्रीय नर्तकी नीलिमा अज़ीम, कपूर उनके माता-पिता हैं, उनका तलाक हो गया जब वे तीन साल के थे। उनके माता-पिता के तलाक के बाद, वे सामान्यतः अपनी माता के साथ रहते थे, उनके पिता और सौतेली माँ सुप्रिया पाठक  के साथ भी अच्छे सम्बन्ध थे। कपूर, जो शाकाहारी हैं, की एक बहन सना और एक भाई ईशान कपूर  भी है ; उनके भाई ने उनके साथ फ़िल्म वाह ! में काम किया है।वाह लाइफ हो तो ऐसी  (2005).उनके नाना अनवर अज़ीम  एक जाने माने मार्क्सवादी (Marxist) पत्रकार और बिहार से लेखक हैं,

7 जुलाई 2015 को उनकी शादी दिल्ली की मीरा राजपूत के साथ हुई।

2004 में कपूर ने अभिनेत्री करीना कपूर के साथ डेटिंग शुरू की, जो उनसे तीन साल बाद अलग हो गईं। उनके अनुसार, उन दोनों के सम्बन्ध अच्छे रहे हैं, वे कहते हैं कि " मैं चाहता हूँ कि उसे [ करीना ] दुनिया में हर खुशी मिले। मैं उसका बहुत सम्मान करता हूँ। वह एक बहुत ही अच्छी लड़की है".

🎥

ताल (Taal)1999
 इश्क विश्क 2003
 2004
फिदा 
दिल मांगे मोर
 2005
दीवाने हुए पागल (Deewane Huye Pagal) 
वाह ! लाइफ हो तो ऐसी (Vaah! Life Ho To Aisi) 
शिखर (Shikhar)
 2006
36 चाईना टाउन (36 China Town) 
चुप चुप के (Chup Chup Ke)
 2007
Fool and Final 
जब वी मेट (Jab We Met)
2008 किस्मत कनेक्शन (Kismat Konnection
2009
कमिने (Kaminey) 
दिल बोले हड़प्पा (Dil Bole Hadippa!)
 2010
मिलेंगे मिलेंगे (Milenge Milenge) 
चांस पे डांस (Chance Pe Dance) 
बदमाश कंपनी (Badmaash Company) 
पाठशाला (Paathshaala)
2011 मौसम (Mausam)
2012 तेरी मेरी कहानी
 2013
बॉम्बे टॉकीज 
फटा पोस्टर निकला हीरो
एक्शन जैक्सन
2015 शानदार
 2016 उड़ता पंजाब 
2017 रंगून 
2017 पद्मावती
2019 कबीर सिंह

बी नागी रेडी(मृत्यु)

बी नागी रेड्डी 🎂02 दिसंबर 1912⚰️25 फरवरी 2004

 बोम्मीरेड्डी नागी रेड्डी बोम्मीरेड्डी नागी रेड्डी (02 दिसंबर 1912 - 25 फरवरी 2004) एक तेलुगु फिल्म निर्माता थे।  उन्होंने चेन्नई में विजया वाहिनी स्टूडियो की स्थापना की, जो उस समय एशिया का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो था।  चूंकि उनके बड़े भाई (जो एक निर्देशक भी थे) के शुरुआती अक्षर भी वही थे और उन्हें बी.एन. रेड्डी के नाम से जाना जाता था, नागी रेड्डी को लोकप्रिय रूप से बी. नागी रेड्डी के नाम से जाना जाता था।  नागी रेड्डी द्वारा निर्मित कुछ फिल्मों में पाताल भैरवी (1951), मिसम्मा (1955), माया बाजार (1957), गुंडम्मा कथा (1962), कन्नड़ में मडुवे मदिनोडु (1965), राम और श्याम (1967), श्रीमान श्रीमती (  1982), जूली (1975), और स्वर्ग नरक (1978)।  रेड्डी 1960-61 और 1962-63 के दौरान दो बार भारतीय फिल्म फेडरेशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्ष 1986 में उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार है।  
बी..नागी रेड्डी का जन्म 02 दिसंबर 1912 को कोथापल्ली गांव, मद्रास प्रेसीडेंसी, अविभाजित भारत, अब पुलिवेंदुला, कडप्पा जिला, आंध्र प्रदेश में हुआ था। उनका विवाह शेषम्मा बोम्मिरेड्डी से हुआ और उनके 3 बेटे थे, लक्ष्मी नरसिम्हा प्रसाद रेड्डी, वेणुगोपाल रेड्डी  और वेंकटरमण रेड्डी। उनके एक बेटे वेंकटरमण रेड्डी भी एक फिल्म निर्माता हैं। बी नागी रेड्डी ने अपने दोस्त और साथी अलूर चक्रपाणि के साथ चार दशकों में चार दक्षिण भारतीय भाषाओं और हिंदी में पचास से अधिक फिल्मों का निर्माण किया। उन्होंने पौराणिक कथाओं का निर्माण किया।  -तार्किक, भक्ति और ऐतिहासिक तेलुगु फिल्में।  उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों में पथला भैरवी, माया बाज़ार और मिसम्मा शामिल हैं। उन्होंने अपनी ज़्यादातर फ़िल्में पटकथा लेखक चक्रपाणि के साथ मिलकर बनाईं। 1970 के दशक में तमिल फ़िल्म उद्योग के स्टूडियो से बाहर चले जाने के बाद नागी रेड्डी ने विजया-वाहिनी को बंद कर दिया।  और विजया अस्पताल और विजया स्वास्थ्य केंद्र की शुरुआत की।

उनके 100वें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में एक नया पुरस्कार शामिल किया गया, बी. नागी रेड्डी, सर्वश्रेष्ठ तेलुगु और तमिल पारिवारिक मनोरंजन के लिए स्मारक पुरस्कार।

बी. नागी रेड्डी ने न्यासी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया  1980 से 1983 के बीच तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के अध्यक्ष और वैकुंठम कतार परिसर के निर्माण का श्रेय उन्हें जाता है जो अब तिरुमाला वेंका-तेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए तीर्थयात्रियों को नियंत्रित करने का काम करता है। नागी रेड्डी ने 1972 में विजया मेडिकल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट की स्थापना की। ट्रस्ट चलाता है  विजया अस्पताल (1972), विजया स्वास्थ्य केंद्र (1987) और विजया हार्ट फाउंडेशन (1996)।  नागी रेड्डी ने चार बार दक्षिण भारतीय फिल्म चैंबर ऑफ कॉमर्स और दो बार अखिल भारतीय फिल्म सम्मेलन का नेतृत्व किया।

 बी. नागी रेड्डी ने 1945 में आंध्र ज्योति अखबार शुरू किया। उन्होंने जुलाई 1947 में बच्चों की पत्रिका "चंदामामा" की भी स्थापना की। पत्रिका अंततः लगभग एक दर्जन विभिन्न भाषाओं में छपी।  वह चेन्नई के वडापलानी में विजया हॉस्पिटल के संस्थापक थे।

 बी. नागी रेड्डी का निधन 25 फरवरी 2004 को चेन्नई (तमिलनाडु) में हुआ।

 🎬 निर्माता के रूप में बी. नागी रेड्डी की फिल्मोग्राफी (हिंदी मूवी)
 1982 श्रीमान श्रीमती 
 1980 स्वयंवर 
 1978 स्वर्ग नरक 
 1977 यही है जिंदगी 
 1975 जूली 
 1970 घर घर की कहानी 
 1969 चक्रपाणि के साथ नन्हा फरिश्ता
 1967 राम और श्याम 
 

Sunday, February 23, 2025

एस मोहिंदर(जनम)

एस मोहिंदर 🎂24 फरवरी 1925

एस मोहिंदर
🎂जन्म24 फरवरी 1925
⚰️06 सितंबर 2020
सरगोधा जिला , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत06 सितंबर 2020 (आयु 95 वर्ष)

पेशा फ़िल्म संगीतकार
पुरस्कार
वर्ष के 'सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (1969)

उनका जन्म 1925 में सरगोधा जिले के सिलानवाली तहसील में हुआ था । मोहिंदर के पिता बख्शी सुजान सिंह पुलिस बल में सब-इंस्पेक्टर थे। बाद में उनके पिता ने भी साहीवाल (पुराना नाम मोंटगोमरी क्षेत्र) में सेवा की। वह साहीवाल में उस समय के एक प्रसिद्ध संगीतकार पंडित रतन मूर्ति के छात्र थे, जो बाबे वाला चौक पर रहते थे।

उनके पिता बख्शी सुजान सिंह का स्थानांतरण हो गया और परिवार तुलनात्मक रूप से बड़े शहर लायलपुर , ब्रिटिश भारत अब फैसलाबाद , पाकिस्तान में चला गया, जहां 1930 के दशक में युवा मोहिंदर ने एक कुशल सिख धार्मिक गायक संत सुजान सिंह के साथ प्रशिक्षुता शुरू की।

उन्होंने संत सुजान सिंह के संरक्षण में कई वर्षों तक शास्त्रीय संगीत के अनुरूप अपने कौशल को निखारा। प्रारंभ में, उन्होंने गायक बनने का प्रयास किया। बाद में, उनका परिवार सिख धर्म के संस्थापक ( गुरु नानक ) के जन्मस्थान ननकाना साहिब के करीब, शेखूपुरा (अब पाकिस्तान में) चला गया।

बाद में उन्होंने सिख धार्मिक संगीतकार भाई समुंद सिंह से शास्त्रीय संगीत में आगे का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके पिता के बार-बार स्थानांतरण से परिवार चलता रहा। चूंकि मोहिंदर की शिक्षा प्रभावित हुई, इसलिए उनके पिता ने उन्हें 1940 के दशक में अमृतसर के कैरों गांव में खालसा हाई स्कूल में दाखिला दिलाया । एस. मोहिंदर उर्दू और पंजाबी दोनों भाषाओं में पारंगत थे। उन्हें हिंदी भाषा सीखने में कुछ समय लगा। 

1947 में, उनका बाकी परिवार भारत में पूर्वी पंजाब चला गया । शास्त्रीय संगीत के प्रति प्रेम एस. मोहिंदर को भारतीय शास्त्रीय संगीत के मक्का कहे जाने वाले बनारस ले आया। कुछ वर्षों की तैयारी के बाद, एस. मोहिंदर फिल्म उद्योग के केंद्र मुंबई चले गए। उनकी पहली सफल फिल्म नीली (1950) थी, जो म्यूजिकल हिट थी लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।

मोहिंदर सिंह अंततः फिल्मिस्तान स्टूडियो में संगीत निर्देशक बनने में कामयाब रहे , जो उस समय फिल्में बना रहा था। उन्होंने लगभग आधे दशक तक उनके लिए संगीत तैयार किया। 1980 के दशक की शुरुआत में, वह अमेरिका चले गए और 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिए अक्सर स्थानीय संगीत प्रेमियों के साथ बैठकों में भाग लेते थे। वह 2013 में मुंबई, भारत लौट आए।

उनकी बेटी नरेन चोपड़ा के अनुसार, उनके करियर के विकास में सुरैया , फिल्म निर्माता और निर्देशक के. आसिफ , एस. मुखर्जी और मधुबाला ने मदद की थी । उनकी बेटी ने यह भी कहा कि वह मधुबाला के परिवार और पृथ्वीराज कपूर के करीबी थे ।

06 सितंबर, 2020 को 95 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया
📽️
अप्रकाशित फ़िल्में - गीत और आँसू (1940), दो दोस्त (1950), माँ दी गोध (पंजाबी), 1970

सेहरा (1948)
जीवन साथी (1949)
नीली (1950)
श्रीमती जी (1952) - संगीत और पृष्ठभूमि संगीत भी
वीर अर्जुन (1952)
बहादुर (1953)
पापी (1953)
नाता (1955) 
अलादीन का बेटा (1955)
सौ का नोट (1955)
शहजादा (1955)
सुल्तान-ए-आलम (1956)
शिरीन फरहाद (1956)
कारवां (1956)
पाताल परी (1957)
सुन तो ले हसीना (1958)
नया पैसा (1958)
ख़ूबसूरत धोखा (1959)
परदेसी ढोला (1959) (निर्माता और संगीत निर्देशक के रूप में पंजाबी फिल्म)
भगवान और शैतान (1959)
दो दोस्त (1960)
एक लड़की सात लड़के (1961  विनोद के साथ )
ज़मीन के तारे (1960)
महलों के ख्वाब (1960)
जय भवानी (1961)
बांके सांवरिया (1962)
रिपोर्टर राजू (1962)
ज़राक खान (1963)
कैप्टन शेरू (1963)
सरफरोश (1964)
बेखबर (1965)
सुनहरे कदम (1966)
प्रोफेसर-एक्स (1966)
पिकनिक (1966) 
नानक नाम जहाज है (1969) (उन्होंने इस पंजाबी भाषा की फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता ) 
मन जीते जग जीत (1973) (पंजाबी फिल्म) 
दुख भंजन तेरा नाम (1974) पंजाबी फिल्म
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड 1
एल्बम में विभिन्न कलाकारों को 10 ट्रैक मिले (1975)

शबद गुरबानी (1975) गायक कंवल सिद्धू का निजी एल्बम
सीस गंज (1975) गुरु तेग बहादुर - हिंद दी चादर) महेंद्र कपूर, मन्ना डे, एस. मोहिंदर, रागी तिरलोचन ग्रेवाल के साथ निजी एल्बम
तेरी मेरी इक जिंदरी (1975)
पापी तारे अनेक (1976) पंजाबी फिल्म
सैंटो बंटो (1976) पंजाबी फिल्म
लाडली (1978) पंजाबी फिल्म
सुखी परिवार (1979) पंजाबी फिल्म
फौजी चाचा (1980) पंजाबी फिल्म
दहेज (1981) पंजाबी फिल्म 
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड। मोहम्मद रफ़ी , नीलम साहनी के साथ 2 निजी एल्बम
सारेगामा पर लेबल 06 जनवरी, (1985) को रिलीज़ हो रहा है

संदली (1985)
मौला जट्ट (1990) (पंजाबी फिल्म)

जय ललिता (जन्म)

जय ललिता 🎂24 फरवरी 1948⚰️05 दिसंबर 2016

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री से राजनीतिज्ञ बनीं जे. जयललिता  को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि

जयराम जयललिता जयराम जयललिता (24 फरवरी 1948 - 05 दिसंबर 2016) एक फिल्म अभिनेत्री और एक भारतीय राजनीतिज्ञ थीं, जिन्होंने 1991 से 2016 के बीच चौदह वर्षों तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में पाँच कार्यकाल पूरे किए। 1989 से वह द्रविड़ पार्टी, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) की महासचिव थीं। मीडिया और विपक्ष में उनके आलोचकों ने उन पर एक व्यक्तित्व पंथ को बढ़ावा देने और AIADMK विधायकों, मंत्रियों से पूर्ण वफादारी की माँग करने का आरोप लगाया, जो अक्सर सार्वजनिक रूप से उनके सामने झुक जाते थे। 
अभिनेत्री कंगना रनौत ने दिवंगत तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की बायोपिक 'थलाइवी' में उनकी भूमिका निभाई, जो तमिल, तेलुगु, हिंदी भाषाओं में बनी है।

 जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को मैसूर राज्य में स्थित मांड्या जिले के पांडवपुरा तालुका के मेलुकोटे में हुआ था, जो अब भारत के कर्नाटक राज्य में आता है। उनके पिता का नाम तमिल ब्राह्मण अयंगर परिवार में जयराम और वेदवल्ली था। जयललिता का नाम एक वर्ष की आयु में स्कूल और कॉलेजों में नाम के इस्तेमाल के उद्देश्य से रखा गया था। यह नाम मैसूर में उनके निवास के दो घरों के नामों से लिया गया था। एक का नाम "जया विलास" और दूसरा "ललिता विलास" था। उनके दादा, नरसिम्हन रंगाचारी, मैसूर साम्राज्य में एक शल्य चिकित्सक के रूप में सेवारत थे और मैसूर के महाराजा कृष्ण राजा वाडियार चतुर्थ के दरबारी चिकित्सक के रूप में सेवा करते थे। उनके नाना, रंगास्वामी अयंगर, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में काम करने के लिए श्रीरंगम से मैसूर चले गए थे। उनके एक बेटा और तीन बेटियाँ थीं - अम्बुजावल्ली, वेदवल्ली और पद्मावल्ली। वेदवल्ली का विवाह नरसिम्हन रेंगाचारी के बेटे जयराम से हुआ था।  जयराम वेदवल्ली दंपति के दो बच्चे थे, एक बेटा जयकुमार और एक बेटी, जयललिता।

जयललिता स्कूल में बहुत अच्छी थीं और उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी छात्रवृत्ति की पेशकश की गई थी। उन्होंने तमिलनाडु राज्य में 10वीं कक्षा में प्रथम आने के लिए गोल्ड स्टेट अवार्ड जीता। उन्होंने चेन्नई के स्टेला मैरिस कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन अपनी माँ के दबाव के कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और एक फिल्म अभिनेत्री बन गईं। वह तमिल, अरबी, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी, मलयालम और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में पारंगत थीं।

जयललिता ने 1995 में शशिकला के भतीजे सुधाकरन को गोद लिया था और 1996 में उसे त्याग दिया था। उन्हें अपने पालतू जानवरों के रूप में कुत्ते पालने का शौक था। लेकिन 1998 में जूली नामक स्पिट्ज की मृत्यु के बाद वह इस नुकसान को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और इसलिए उन्होंने अपने घर पर पालतू कुत्ते रखना बंद कर दिया।

हालांकि, बहुत कम लोगों को याद होगा या बल्कि यह भी पता होगा कि उन्होंने किशोर कुमार और साधना अभिनीत एक फिल्म में काम किया था।  यह निर्देशक कृष्णन की "मनमौजी" (1962) थी। जयललिता एक गाने में दिखीं, जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण की भूमिका निभाई थी। यह सिर्फ़ तीन मिनट का गाना था। जयललिता ने हिंदी फ़िल्म "इज्जत" में धर्मेंद्र के साथ काम किया। दोनों ने 1968 में काम किया। जयललिता की एकमात्र हिंदी फ़िल्म में उन्हें धर्मेंद्र के साथ देखा गया, उन्हें एक चुलबुली आदिवासी लड़की की भूमिका में लिया गया, जिसे धर्मेंद्र द्वारा निभाए गए दिलीप से प्यार हो जाता है। उन्होंने हिंदी फ़िल्म "हरे कृष्णा" (1974) में अभिनय किया, जिसमें एन.टी. रामा राव और हेमा मालिनी ने अप्सरा की भूमिका निभाई और "तू ही राम तू ही कृष्णा" (1977) में सत्यभामा की भूमिका निभाई। मद्रास (अब चेन्नई) में, जयललिता ने कर्नाटक संगीत, पश्चिमी शास्त्रीय पियानो और भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम, मणिपुरी, कथक सहित शास्त्रीय नृत्य के विभिन्न रूपों का प्रशिक्षण लिया।  उन्होंने के. जे. सरसा से भरतनाट्यम और नृत्य विधाएँ सीखीं। उन्होंने पद्म भूषण गुरु डॉ. वेम्पति चिन्ना सत्यम से कुचिपुड़ी भी सीखी थी। वह निपुण नर्तकी बन गईं और मई 1960 में मायलापुर में रसिका रंजनी सभा में उन्होंने अपना पहला नृत्य प्रदर्शन दिया। अरंगेत्रम के मुख्य अतिथि शिवाजी गणेशन थे, जिन्होंने इच्छा व्यक्त की कि जयललिता भविष्य में एक फिल्म स्टार बनें। बचपन में, जयललिता ने कन्नड़ भाषा की फिल्म "श्री शैला महाथमे" (1961) में अभिनय किया, जिसमें राजकुमार और कृष्णा कुमारी मुख्य भूमिकाओं में थे।
जयललिता पहली बार 1960 के दशक के मध्य में एक प्रमुख फिल्म अभिनेत्री के रूप में प्रमुखता में आईं। हालाँकि उन्होंने परिवार का समर्थन करने के लिए अपनी माँ के आग्रह पर अनिच्छा से इस पेशे में प्रवेश किया था, लेकिन जयललिता ने खूब काम किया। वह 1961 से 1980 के बीच 140 फिल्मों में नज़र आईं, मुख्य रूप से तमिल, तेलुगु और कन्नड़ भाषाओं में। जयललिता को एक अभिनेता के रूप में उनकी बहुमुखी प्रतिभा और उनके नृत्य कौशल के लिए प्रशंसा मिली, जिससे उन्हें "तमिल सिनेमा की रानी" का खिताब मिला। उनके अक्सर सह-कलाकारों में एम. जी. रामचंद्रन या एमजीआर थे, जो एक तमिल सांस्कृतिक प्रतीक थे, जिन्होंने जनता के बीच अपनी अपार लोकप्रियता का लाभ उठाकर एक सफल राजनीतिक करियर बनाया।

जयललिता और सरोजा देवी को तमिल सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार के रूप में उद्धृत किया गया है। उन्होंने आठ फिल्मों में दोहरी भूमिकाएँ कीं।

1982 में, जब एमजीआर मुख्यमंत्री थे, जयललिता AIADMK में शामिल हो गईं, जिसकी स्थापना उन्होंने की थी। उनका राजनीतिक उदय तेज़ी से हुआ;  कुछ ही वर्षों में वह AIADMK की प्रचार सचिव बन गईं और भारत की संसद के ऊपरी सदन, राज्यसभा के लिए चुनी गईं। 1987 में एमजीआर की मृत्यु के बाद, जयललिता ने खुद को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया और एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन के नेतृत्व वाले गुट से लड़कर, AIADMK की एकमात्र नेता के रूप में उभरीं। 1989 के चुनाव के बाद, वह अपने कट्टर विरोधी करुणानिधि के नेतृत्व वाली DMK के नेतृत्व वाली सरकार में विपक्ष की नेता बनीं। 1991 में जयललिता पहली बार तमिलनाडु की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनीं। केवल एक रुपये प्रति माह के आधिकारिक वेतन के बावजूद, जयललिता ने धन का सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जिसकी परिणति 1995 में अपने पालक बेटे की एक भव्य शादी में हुई। 1996 के चुनाव में, AIADMK का लगभग सफाया हो गया था, जयललिता खुद अपनी सीट हार गईं।  नई करुणानिधि सरकार ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए और उन्हें जेल में समय बिताना पड़ा। 1998 के आम चुनाव में उनकी किस्मत चमक उठी, क्योंकि AIADMK प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 1998-99 की सरकार का एक प्रमुख घटक बन गई; उनके समर्थन वापस लेने से यह सरकार गिर गई और एक साल बाद ही फिर से आम चुनाव हुए।

AIADMK 2001 में सत्ता में लौट आई, हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों के कारण जयललिता को व्यक्तिगत रूप से चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। सितंबर 2001 में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के कुछ महीनों के भीतर, उन्हें पद संभालने से अयोग्य घोषित कर दिया गया और उन्हें अपने वफादार ओ. पन्नीरसेल्वम को कुर्सी सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ा। छह महीने बाद बरी होने पर, जयललिता अपना कार्यकाल पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री के रूप में वापस लौटीं। राजनीतिक विरोधियों के प्रति अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्ध, जिनमें से कई को आधी रात को छापेमारी में गिरफ्तार किया गया था, उनकी सरकार अलोकप्रिय हो गई।  विपक्ष में एक और अवधि (2006- 2011) के बाद, उन्होंने चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जब AIADMK ने 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। ​​अपने कार्यकाल के तीन साल बाद, आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण उन्हें पद संभालने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। मई 2015 में बरी होने के बाद वह मुख्यमंत्री के रूप में लौट आईं। 2016 के विधानसभा चुनाव में, वह 1984 में एमजीआर के बाद से फिर से पद पर आने वाली तमिलनाडु की पहली मुख्यमंत्री बनीं। सितंबर 2016 में, वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं और 75 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद, 05 दिसंबर 2016 को हृदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गई। भारत। भारत सरकार ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया  तमिलनाडु सरकार और केरल सरकार तथा पुडुचेरी सरकार द्वारा 6 से 8 दिसंबर 2016 तक तीन दिवसीय राजकीय शोक मनाया गया। 

🎬 जे. जयललिता की हिंदी फ़िल्में -
1962 मनमौजी - भगवान कृष्ण के रूप में - हिंदी फ़िल्म में पहली बार बाल कलाकार के रूप में। 3 मिनट के सीक्वेंस में बेबी नाज़ के साथ नृत्य किया।
1968 इज़्ज़त झुमकी के रूप में
1974 हरे कृष्णा (हिंदी में डब की गई फ़िल्म)

नक्श लायलपुरि (जन्म)

नक्श लायलपुरी⚰️22 जनवरी 2017 🎂24 फ़रवरी 1928
बचपन का नाम
जसवंत राय शर्मा
24 फ़रवरी 1928
लायलपुर (वर्तमान में फैसलाबाद), ब्रिटिश भारत
मौत
22 जनवरी 2017 (उम्र 88 वर्ष)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
आवास
मुंबई
पेशा
गीतकार
कार्यकाल
1953–2007
महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी

🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017

पंजाब के लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा में 24 फरवरी, 1928 को जन्मे लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है।नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
कुछ प्रसिद्ध गीत
धानी चुनर मोरी हाए रे
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
कई सदियों से कई जन्मों से
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे
ये मुलाक़ात इक बहाना है
क़दर तूने ना जानी
चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है
चिट्ठिए
तुम्हें हो न हो मुझको तो
प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा
सीने में भी तूफ़ां है
न जाने क्या हुआ,जो तूने छू दिया
तुझ संग प्रीत लगाई सजना
नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं
जिंदगी की न टूटे लड़ी,प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती
उनकी बतौर गीतकार पहली फिल्म ‘जुग्गू’ (वर्ष 1952) थी जिसमें उन्होंने ‘अगर तेरी आंखों से आंखें मिला दूं’ गीत लिखा था। उनकी अन्य प्रसिद्ध फिल्मों में ‘चेतना’, ‘आहिस्ता आहिस्ता’ ‘तुम्हारे लिए’ एवं ‘घरौंदा’ भी शामिल हैं।

करण सिंह ग्रोवर

करन सिंह ग्रोवर 🎂जन्म की तारीख और समय: 23 फ़रवरी 1982 , नई दिल्ली पत्नी: बिपाशा बसु (विवा. 2016), जेनिफर विंगेट (विवा. 2012–2014), करन सिंह...