Wednesday, August 14, 2024

उस्ताद आमिर खान

#15aug 
#13feb 
महान शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खान साहब
उस्ताद अमीर ख़ाँ
प्रसिद्ध नाम उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब
🎂जन्म 15 अगस्त, 1912
जन्म भूमि इंदौर, मध्य प्रदेश
⚰️मृत्यु 13 फ़रवरी, 1974
मृत्यु स्थान कलकत्ता (अब कोलकाता) पश्चिम बंगाल
अभिभावक चंगे ख़ान (दादा), शाहमीर ख़ान (पिता)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय गायन
मुख्य फ़िल्में 'बैजू बावरा', 'शबाब', 'झनक झनक पायल बाजे', 'रागिनी', 'गूंज उठी शहनाई' आदि।
पुरस्कार-उपाधि संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण
विशेष योगदान उस्ताद अमीर ख़ाँ ने "अतिविलम्बित लय" में एक प्रकार की "बढ़त" लाकर सबको चकित कर दिया था। इस बढ़त में आगे चलकर सरगम, तानें, बोल-तानें, जिनमें मेरुखण्डी अंग भी है, और आख़िर में मध्यलय या द्रुत लय, छोटा ख़याल या रुबाएदार तराना पेश किया।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी इनके पिता शाहमीर ख़ान भिंडी बाज़ार घराने के सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे और इनके दादा, चंगे ख़ान तो बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में गायक थे।

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उस्ताद अमीर ख़ाँ भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक थे। उस्ताद अमीर ख़ाँ को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा, सन 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

उस्ताद अमीर ख़ाँ का जन्म 15 अगस्त ,1912 को इंदौर में एक संगीत परिवार में हुआ था। पिता शाहमीर ख़ान भिंडी बाज़ार घराने के सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे। उनके दादा, चंगे ख़ान तो बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में गायक थे। अमीर अली की माँ का देहान्त हो गया था जब वे केवल नौ वर्ष के थे। अमीर और उनका छोटा भाई बशीर, जो बाद में आकाशवाणी इंदौर में सारंगी वादक बने, अपने पिता से सारंगी सीखते हुए बड़े होने लगे। लेकिन जल्द ही उनके पिता ने महसूस किया कि अमीर का रुझान वादन से ज़्यादा गायन की तरफ़ है। इसलिए उन्होंने अमीर अली को ज़्यादा गायन की तालीम देने लगे। ख़ुद इस लाइन में होने की वजह से अमीर अली को सही तालीम मिलने लगी और वो अपने हुनर को पुख़्ता, और ज़्यादा पुख़्ता करते गए। अमीर ने अपने एक मामा से तबला भी सीखा। अपने पिता के सुझाव पर अमीर अली ने 1936 में मध्य
प्रदेश के रायगढ़ संस्थान में महाराज चक्रधर सिंह के पास कार्यरत हो गये, लेकिन वहाँ वे केवल एक वर्ष ही रहे। 1937 में उनके पिता की मृत्यु हो गई। वैसे अमीर ख़ान 1934 में ही बम्बई (अब मुम्बई ) स्थानांतरित हो गये थे और मंच पर प्रदर्शन भी करने लगे थे। इसी दौरान वे कुछ वर्ष दिल्ली में और कुछ वर्ष कलकत्ता (अब कोलकाता ) में भी रहे, लेकिन देश विभाजन के बाद स्थायी रूप से बम्बई में जा बसे। उस्ताद अमीर ख़ान के गायकी का
जहाँ तक सवाल है, उन्होंने अपनी शैली अख़्तियार की, जिसमें अब्दुल वाहिद ख़ान का विलंबित अंदाज़, रजब अली ख़ान के तान और अमन अली ख़ान के मेरुखण्ड की झलक मिलती है। इंदौर घराने के इस ख़ास शैली में
आध्यात्मिक्ता, ध्रुपद और ख़याल के मिश्रण मिलते हैं। उस्ताद अमीर ख़ान ने "अतिविलंबित लय" में एक प्रकार की"बढ़त" ला कर सबको चकित कर दिया था। इस बढ़त में आगे चलकर सरगम, तानें, बोल-तानें, जिनमें मेरुखण्डी अंग भी है, और आख़िर में मध्यलय या द्रुत लय, छोटा ख़याल या रुबाएदार तराना पेश किया। उस्ताद अमीर ख़ान का यह मानना था कि किसी भी ख़याल कम्पोज़िशन में काव्य का बहुत बड़ा हाथ होता है, इस ओर उन्होंने 'सुर रंग' के नाम से कई कम्पोज़िशन्स ख़ुद लिखे हैं। अमीर ख़ान ने तराना को लोकप्रिय
बनाया। झुमरा और एकताल का प्रयोग अपने गायन में करते थे, और संगत देने वाले तबला वादक से वो साधारण ठेके की ही माँग करते थे

उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के उस ऐसे फ़नकार थे, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।
इंदौर घराने के उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, जिन्हें ख़याल का अज़ीम-ओ- शान शहंशाह माना जाता है। इसके
बावजूद कि ख़ाँ साहब इंदौर रियासत के आसपास पले-बढ़े, उनके पिता और दादा जी उसी रियासत में संगीत के
रूप में मुलाजिम थे, जिस वजह से उन्होंने अपने घराने को इंदौर का नाम दिया। उनकी गायन शैली में कोई रियासत वाली सोच या प्रोत्साहन नहीं था, बल्कि उनकी शैली में एक ऐसा वैराग्य सुनने में आता है, जिससे आसानी से पता चल जाता है कि असल में और आख़िर तक वे सूफ़ी ही थे। उस्ताद अमीर ख़ाँ रूहानी तौर पर अपने आपको अमीर ख़ुसरो के घराने से जोड़ते थे, एक ऐसी परंपरा, जिसमें गाने-बजाने वाले संगीतकार लोग सूफ़ी संतों के आसपास एक अलौकिक झुंड बनाकर बैठे रहते और उनके काउल और बचन गाते। जहां मौसीकी और संगीत को इबादत का एक जरिया माना जाता। और जैसे-जैसे उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब अपने वक़्त के
कलाकारों को सुनने लगे, उन्होंने अपनी ही सोच से एक ऐसी शैली का निर्माण किया, जो रियासत के फंडों से कोसों दूर भाग चली आई, जहां संगीत की परिभाषा ध्यान और इबादत ही थी। यहां राजाओं और महाराजाओं को रिझाने वाली बात न थी, न महाराजा की नजर में दूसरे कलाकारों से बाजी मारने वाली बात। न संगीत के सामान का कोई प्रदर्शन भी। देखा जाए तो गायकी की इस अनोखी खोज को यदि एक शब्द में कहा जाए तो वह शब्द था सादगी, जो सूफियों की भाषा में एक जबर्दस्त पहुंचा हुए शब्द माना जाता है। आवाज़ की अलग-अलग किस्में होती हैं, और इन अलग-अलग किस्मों से ही ख़याल गायकियां बनीं, लेकिन उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ की कोई किस्म ही न थी। वह तो सिर्फ एक अधूरी भाव से बनी। आप गले को फाड़ कर आवाज़ बाहर की तरफ़ न फेंके। आप आवाज़ को अपने अंदर लगाएं, जब तक उसे कोई अंदर से न पकड़ ले। एक बार यह हो जाए, फिर आप की आवाज़ सुनाई दे, जैसे भी सुनाई दे। इस स्वर की कोई शर्त ही नहीं थी। न यह स्वर समझता, न ही सुंदर ही बनाने की कोशिश करता। न यह स्वर कोई ड्रामा करता, न ऊपरी तौर से श्रृंगारिक बनने की कोशिश रखता। इस स्वर से तो कोई गाता रहता

और इसी स्वर लगाव से उस्ताद अमीर ख़ाँ, अमीर ख़ाँ बने। सूफ़ियों की भाषा में इसे फ़ना कहते हैं, अपने आप में पहले मिट जाना, फिर उस मिटने में से उसको ज़िंदा रखना। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लिए यह गर्व की बात है कि उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के बाद, कई पीढ़ियां- गाने वाले और बजाने वाले- उन्हें पागलपन की हद तक मोहब्बत करने लगे। एक वक़्त ऐसा आया, जब दूरदराज, उनके संगीत को सुने बिना, अब गाना- बजाना ही नामुमकिन हो गया था। सच बात तो यह है कि सुई का कोना पूरी प्रदक्षिणा कर चुका था।

उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रतिभा के अस्वीकार का आरंभ तो उसी समय हो गया था, जब वे शास्त्रीय संगीत के एक
दक्ष गायक बनने के स्वप्न से भरे हुए थे और रायगढ़ दरबार में एक युवतर गायक की तरह अपनी अप्रतिम प्रतिभा के वलबूते संगीत-संसार में एक सर्वमान्य जगह बनाने में लगे हुए थे। एक बार उनके आश्रयदाता ने उन्हें मिर्जापुर में सम्पन्न होने वाली एक भव्य-संगीत सभा में प्रतिभागी की बतौर भेजा, ताकि वे वहाँ जाकर अपनी गायकी की एक प्रभावकारी उपस्थिति दर्ज करवा के
लौटें। लेकिन, उन्होंने जैसे ही अपना गायन शुरू किया चौतरफा एक खलबली-सी होने लगी और रसिकों के
बीच से उनके विरोध के स्वर उठने लगे, जो जल्द ही शोरगुल में बदल गये। उस संगीत- सभा में प्रसिद्ध गायक इनायत खाँ, फैयाज ख़ाँ और केशरबाई भी अपनी
प्रस्तुतियाँ देने के लिए मौजूद थे।हालाँकि इन वरिष्ठ गायकों ने समुदाय से आग्रह करके उनको सुने जाने
की ताक़ीद भी की लेकिन असंयत-श्रोता समुदाय ने उनके उस निवेदन की सर्वथा अनसुनी कर दी। इस घटना से हुए अपमान-बोध ने युवा गायक अमीर ख़ाँ के मन में ‘अमीर‘ बनने के दृढ़ संकल्प से साथ दिया। वे जानते थे, एक गायक की‘सम्पन्नता‘, उसके ‘स्वर‘ के साथ ही साथ
‘कठिन साधना‘ भी है। नतीजतन, वे अपने गृह नगर इन्दौर लौट आये, जहाँ उनकी परम्परा और पूर्वजों की पूँजी दबी पड़ी थी। उनके पिता उस्ताद शाहमीर ख़ाँ थे, जिनका गहरा सम्बन्ध भिण्डी बाजार घराने की प्रसिद्ध
गायिका अंजनीबाई मालपेकर के साथ था। वे उनके साथ सारंगी पर संगत किया करते थे। पिता की यही
वास्तविक ख्वाहिश भी थी कि उनका बेटा अमीर ख़ाँ अपने समय का एक मशहूर सारंगी वादक बन जाये। उन्हें
लगता था, यह डूबता इल्म है। क्योंकि,सारंगी की प्रतिष्ठा काफ़ी क्षीण थी और वह केवल कोठे से जुड़ी महफिलों का अनिवार्य हिस्सा थी, लेकिन वे यह भी जानते थे कि मनुष्य के कण्ठ के बरअक्स ही सारंगी के स्वर हैं। और उनके पास की यह पूँजी पुत्र के पास पहुँच कर अक्षुण्ण हो जाएगी। बहरहाल, पुत्र की वापसी से उन्हें एक किस्म की तसल्ली भी हुई कि शायद वह फिर से अपने पुश्तैनी वाद्य की ओर अपनी पुरानी और परम्परागत आसक्ति बढ़ा ले। लेकिन, युवा गायक ‘अमीर‘ के अवचेतन जगत में मिर्जापुर की संगीत- सभा में हुए अपमान की तिक्त-स्मृति थी, ना भूली जा सकने किसी ग्रन्थि का रूप धर चुकी थी, जिसके चलते वह कोई बड़ा और रचनात्मक-जवाब देने की जिद पाल चुका था। वह अपने उस ‘अपमान’ का उत्तर ‘वाद्य’ नहीं, ‘कण्ठ’ के जरिये ही देना चाहता था। बहरहाल, यह एक युवा सृजनशील-मन के गहरे आत्म- संघर्ष का कालखण्ड था, जहाँ उसे अपने ही भीतर से कुछ ‘आविष्कृत’ कर के उसे विराट बनाना था। नतीजतन, उसने स्वर-साधना को अपना अवलम्ब बनाया, और ऐसी साधना ने एक दिन उसको उसकी इच्छा के निकट लाकर छोड़ दिया। शायद इसी की वजह रही कि बाद में, जब अमीर खाँ साहब देश के सर्वोत्कृष्ट गायकों की कतार में खड़े हो गये तो बड़े-बड़े आमंत्रणों और प्रस्तावों को वे बस इसलिए अस्वीकार कर दिया करते थे कि ‘वहाँ आने-जाने में उनकी ‘रियाज‘ का बहुत ज़्यादा नुक़सान हो जायेगा।

फ़िल्म संगीत में भी उस्ताद अमीर ख़ान का योगदान उल्लेखनीय है। ' बैजू बावरा', 'शबाब', 'झनक झनक पायल बाजे', 'रागिनी', और 'गूंज उठी शहनाई'
जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने अपना स्वरदान किया। बंगला फ़िल्म'क्षुधितो पाशाण' में भी उनका गायन सुनने को मिला था।

एक सड़क दुर्घटना में उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब को 13 फ़रवरी , 1974 के दिन हम से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो गये।

इंदिवर

#15aug 
#27feb 
(श्यामलाल बाबू राय)(इंदिवर)
श्यामलाल बाबू राय
प्रसिद्ध नाम इन्दीवर

🎂जन्म 15 अगस्त, 1924
जन्म भूमि बरूवा सागर, झाँसी, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 27 फ़रवरी, 1997
मृत्यु स्थान मुम्बई

अभिभावक हरलाल राय
पति/पत्नी पार्वती
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, गीतकार
मुख्य रचनाएँ 'बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी क़सम', 'क़समें वादे प्यार वफ़ा सब', 'छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए', 'कोई जब तुम्हार हृदय तोड़ दे', 'दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा' आदि।
प्रसिद्धि गीतकार
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख मनोज कुमार, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल
अन्य जानकारी निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन की फ़िल्मों के लिये इन्दीवर ने सदाबहार गीत लिखकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके सदाबहार गीतों के कारण ही राकेश रोशन की ज़्यादातार फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं।

इन्दीवर भारत के प्रसिद्ध गीतकारों में गिने जाते थे। इनके लिखे सदाबहार गीत आज भी उसी शिद्दत व एहसास के साथ सुने व गाए जाते हैं, जैसे वह पहले सुने व गाए जाते थे। इन्दीवर ने चार दशकों में लगभग एक हज़ार गीत लिखे, जिनमें से कई यादगार गाने फ़िल्मों की सुपर-डुपर सफलता के कारण बने। ज़िंदगी के अनजाने सफ़र से बेहद प्यार करने वाले हिन्दी सिनेमा जगत के मशहूर शायर और गीतकार इन्दीवर का जीवन के प्रति नज़रिया उनकी लिखी हुई इन पंक्तियों- "हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, याद आए कभी तो मत रोना" में समाया हुआ है।

प्रसिद्ध गीतकार इन्दीवर का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद मुख्यालय से बीस किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित 'बरूवा सागर' क़स्बे में 'कलार' जाति के एक निर्धन परिवार में 15 अगस्त , 1924 ई. में हुआ था। आपका मूल नाम 'श्यामलाल बाबू राय' था। इनके पिता हरलाल राय व माँ का निधन इनके बाल्यकाल में ही हो गया था। इनकी बड़ी बहन और बहनोई घर का सारा सामान और इनको लेकर अपने गाँव चले गये थे। कुछ माह बाद ही ये अपने बहन-बहनोई के यहाँ से बरूवा सागर वापस आ गये थे। बचपन था, घर में खाने-पीने का कोई प्रबन्ध और साधन नहीं था। उन दिनों बरूवा सागर में गुलाब बाग़ में एक फक्कड़ बाबा कहीं से आकर एक विशाल पेड़ के नीचे अपना डेरा जमाकर रहने लगे थे। वे कहीं भिक्षा माँगने नहीं जाते थे। धूनी के पास बैठे रहते थे। बहुत अच्छे गायक थे। वे चंग पर जब गाते और आलाप लेते, तो रास्ता चलता व्यक्ति भी उनकी स्वर लहरी के प्रभाव में गीत की समाप्ति तक रुक जाता था। जब लोग उन्हें पैसे भेंट करते थे तो वह उन्हें छूते तक नहीं थे। फक्कड़ बाबा के सम्पर्क में श्यामलाल (इन्दीवर) को गीत लिखने व गाने की रुचि जागृत हुई। फक्कड़ बाबा गांजे का दम लगाया करते थे। अतः बाबा को भेंट हुये पैसों से ही श्यामलाल चरस और गांजे का प्रबन्ध करते थे। श्यामलाल उन बाबा की गकरियाँ बना दिया करते थे, स्वयं खाते और बाबा को खिलाते। फिर बाबाजी का चिमटा लेकर राग बनाकर स्वलिखित गीत, भजन गाया करते थे।

युवा होते श्यामलाल ‘आज़ाद' की शोहरत स्थानीय कवि सम्मेलनों में बढ़ने लगी और उन्हें झाँसी , दतिया , ललितपुर , बबीना, मऊरानीपुर, टीकमगढ़ , ओरछा , चिरगाँव, उरई में होने वाले कवि सम्मेलनों में आमंत्रित किया जाने लगा,जिससे इन्हें कुछ आमदनी होने लगी। इसी बीच इनकी मर्जी के बिना इनका विवाह झाँसी की रहने वाली 'पार्वती' नाम की लड़की से करा दिया गया।

बिना मर्जी के विवाह से ये अनमने रहने लगे और रुष्ट होकर लगभग बीस वर्ष की अवस्था में मुम्बई भागकर चले गए, जहाँ पर इन्होंने दो वर्ष तक कठिन संघर्षों के साथ सिनेजगत में अपना भाग्य गीतकार के रूप में आजमाया। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘डबल फ़ेस' में आपके लिखे गीत पहली बार लिए गए, किन्तु फ़िल्म ज़्यादा सफल नहीं हो सकी और श्यामलाल बाबू ‘आज़ाद' से ‘इन्दीवर' के रूप में बतौर गीतकार अपनी ख़ास पहचान नहीं बना पाए और निराश होकर वापस अपने पैतृक गाँव बरूवा सागर चले आए। वापस आने पर इन्होंने कुछ माह अपनी धर्मपत्नी के साथ गुजारे। इस दौरान इन्हें अपनी पत्नी पार्वती से विशेष लगाव हो गया, जो अंत तक रहा भी। पार्वती के कहने से ही ये पुनः मुम्बई आने जाने लगे और 'बी' व 'सी' ग्रुप की फ़िल्मों में भी अपने गीत देने लगे। यह सिलसिला लगभग पाँच वर्ष तक चलता रहा।

इस बीच इन्होंने धर्मपत्नी पार्वती को अपने साथ मुम्बई चलकर साथ रहने का आग्रह किया, परन्तु पार्वती मुम्बई में सदा के लिए रहने के लिए राजी नहीं हुईं। उनका कहना था, "रहो बरूवा सागर में और मुम्बई आते जाते रहो।" इन्दीवर इसके लिए तैयार नहीं हुए और पत्नी से रुष्ट होकर मुम्बई में रहकर पूर्व की भाँति फ़िल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने लगे। वर्ष 1951 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'मल्हार' की कामयाबी से बतौर गीतकार कुछ हद तक वह अपनी पहचान बनाने मे सफल हो गए। फ़िल्म 'मल्हार' का गीत

"बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम..." श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है।

वर्ष 1963 में बाबू भाई मिस्त्री की संगीतमय फ़िल्म 'पारसमणि' की सफलता के बाद इन्दीवर शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। इन्दीवर के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी निर्माता- निर्देशक मनोज कुमार के साथ बहुत खूब जमी। मनोज कुमार ने सबसे पहले इन्दीवर से फ़िल्म
'उपकार' के लिये गीत लिखने की पेशकश की। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन मे फ़िल्म 'उपकार' के लिए इन्दीवर ने "क़स्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं, बातों का क्या..." जैसे दिल को छू लेने वाले गीत लिखकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के लिये भी इन्दीवर ने "दुल्हन चली वो पहन चली" और "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे" जैसे सदाबहार गीत लिखकर अपना अलग ही समां बांधा। इन्दीवर के सिने कैरियर मे संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के साथ उनकी खूब जमी। "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिये...", "चंदन सा बदन..." और "मैं तो भूल चली बाबुल का देश..." जैसे इन्दीवर के लिखे न भूलने वाले गीतों को कल्याणजी-आनंदजी ने संगीत दिया।

वर्ष 1970 में विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' में "नफ़रत करने वालों के सीने में...", "पल भर के लिये कोई हमें..." जैसे रूमानी गीत लिखकर इन्दीवर ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन मे फ़िल्म 'सच्चा-झूठा' के लिये इन्दीवर का लिखा एक गीत "मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनियां..." को आज भी विवाह आदि के अवसर पर सुना जा सकता है। इसके अलावा राजेश खन्ना अभिनीत फ़िल्म 'सफ़र' के लिये इन्दीवर ने "जीवन से भरी तेरी आंखें..." और "जो तुमको हो पसंद..." जैसे गीत लिखकर श्रोताओं
को भाव विभोर कर दिया।

जाने माने निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन की फ़िल्मों के लिये इन्दीवर ने सदाबहार गीत लिखकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके सदाबहार गीतों के कारण ही राकेश रोशन की ज़्यादातार फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं। इन फ़िल्मों में ख़ासकर 'कामचोर', 'ख़ुदग़र्ज', 'खून भरी मांग', 'काला बाज़ार', 'किशन कन्हैया', 'किंग अंकल', 'करण अर्जुन' और 'कोयला' जैसी फ़िल्में शामिल हैं। राकेश रोशन के अलावा उनके पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में मनोज कुमार , फ़िरोज़ ख़ान आदि प्रमुख रहे। इन्दीवर के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है।कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में इन्दीवर के गीतों को नई पहचान मिली और शायद संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी इन्दीवर के दिल के काफ़ी क़रीब थे। सबसे पहले इस जोड़ी का गीत संगीत वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म'हिमालय की गोद' में पसंद किया गया। इसके बाद इन्दीवर द्वारा रचित फ़िल्मी गीतों में कल्याणजी- आनंदजी का ही संगीत हुआ करता था। ऐसी फ़िल्मों में 'उपकार', 'दिल ने पुकारा', 'सरस्वती चंद्र', 'यादगार', 'सफ़र', 'सच्चा झूठा','पूरब और पश्चिम', 'जॉनी मेरा नाम', 'पारस', 'उपासना', 'कसौटी', 'धर्मात्मा', 'हेराफेरी', 'डॉन', 'कुर्बानी', 'कलाकार' आदि फ़िल्में शामिल हैं

1975 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'अमानुष' के लिये इन्दीवर को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' दिया गया।

प्रसिद्ध गीत

इन्दीवर ने अपने सिने कैरियर में लगभग 300 फ़िल्मों के लिये गीत लिखे। इन्दीवर के प्रसिद्ध गीतों में शामिल हैं-
इन्दीवर द्वारा लिखित कुछ प्रसिद्ध गीत बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम मल्हार ( 1949 )
2. क़समें वादे प्यार वफ़ा सब उपकार ( 1967 )
3. मेरे देश की धरती सोना उगले उपकार ( 1967 )
4. चन्दन सा बदन, चंचल चितवन सरस्वतीचन्द्र ( 1968 )
5. मैं तो भूल चली बाबुल का देश सरस्वतीचन्द्र ( 1968 )
6. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
सरस्वतीचन्द्र ( 1968)
7. दुल्हन चली, ओ पहन चली पूरब और पश्चिम ( 1970 )
8. कोई जब तुम्हार हृदय तोड़ दे पूरब और पश्चिम ( 1970 )
9. पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले जॉनी मेरा नाम ( 1970 )
10. जिन्दगी का सफ़र सफ़र ( 1970 )
11. जीवन से भरी तेरी आँखें सफ़र (1970)
12. जिन्दगी का सफ़र, है ये कैसा सफ़र सफ़र ( 1970 )
13. दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा अमानुष ( 1975)
14. ये मेरा दिल प्यार का दीवाना डॉन ( 1978 )
15. मधुबन ख़ुशबू देता है साजन बिना सुहागन ( 1978)
16. देखा तुझे तो हो गई दीवानी कोयला ( 1997 )
17. होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो प्रेमगीत
⚰️भारतीय सिनेमा में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले और एक गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले इन्दीवर ने अपने सिने-कैरियर में लगभग 300 फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। लगभग तीन दशक तक अपने गीतों से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले इन्दीवर ने 27 फ़रवरी, 1997 को इस दुनिया से विदा ली।

Monday, August 12, 2024

महेश आनंद

#13aug 
#09feb 
महेश आनंद
🎂13 अगस्त 1961
भारत
⚰️09 फरवरी 2019 (आयु 57)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों
मीशी
माशी आनंद
व्यवसायों
अभिनेतानर्तकीयुद्ध कलाकार
सक्रिय वर्ष
1982–2019
एक भारतीय अभिनेता, नर्तक और मार्शल कलाकार थे, जिन्होंने हिंदी , तमिल , तेलुगु और मलयालम फिल्मों में काम किया था।उन्हें हिंदी फिल्मों में खलनायक की भूमिकाएँ निभाने के लिए याद किया जाता है । वह कराटे में ब्लैक बेल्ट थे और अभिनय शुरू करने से पहले एक मॉडल और प्रशिक्षित डांसर थे। उनकी पहली फिल्म करिश्मा 1984 थी जबकि उनकी आखिरी ऑन-स्क्रीन उपस्थिति 2019 की कॉमेडी-ड्रामा रंगीला राजा में थी ।  करिश्मा में अभिनय करने से पहले उन्होंने सनम तेरी कसम 1982 के शुरुआती सीक्वेंस के लिए सिल्हूट में अपने नृत्य के साथ प्रदर्शन किया था।
09 फरवरी 2019 को उनकी नौकरानी ने उनके घर की घंटी कई बार बजाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। फिर उसने तुरंत उनकी बहन को सूचित किया जो वर्सोवा पुलिस के साथ वहां पहुंची । आनंद मृत पाए गए, सोफे पर बैठे थे और उनके बगल में एक मेज पर शराब की बोतल और खाने की प्लेट पड़ी थी।
🎥
1982 सनम तेरी कसम 
1984 करिश्मा 
1985 भवानी जंक्शन 
1986 सस्ती दुल्हन महेंगा दूल्हा 
1987 इन्साफ 
1988 
शहंशाह 
सोने पे सुहागा 
गंगा जमुना सरस्वती 
कब्ज़ा 
1989
 हथियार 
इलाका 
महादेव 
मजबूर 
सिक्का 
मुजरिम 
तूफान 
शहजादे 
आग का गोला 
1990
 पत्थर के इंसान 
Khatarnaak 
मजबूर 
घर हो तो ऐसा  
स्वर्ग 
जंगल 
जुर्म 
थानेदार 
1991
 ख़िलाफ 
Pratikar 
त्रिनेत्र 
इन्द्रजीत 
कसम कलि की 
अकायला 
नर्तकी 
1992 
लंबू दादा 
मुस्कुराहाट 
निश्चय 
ज़ुल्म की हुकुमत 
विश्वात्मा -
1993
 वक़्त हमारा है 
गुमराह टाइगर 
खेल 
महोदय 
तहकीकात 
1994 
पथरीला रास्ता 
खुद्दार 
अंदाज़ 
क्रांतिवीर 
बेताज बादशाह 
1995 
कुली नंबर 1 
जवाब 
1996 
मुक़द्दमा 
विश्वासघात
विजेता 
ज़ोरदार 
हम हैं प्रेमी 
शोहरत 
1997 
लहू के दो रंग 
1998 ज़ुल्म-ओ-सितम 
1999 
आया तूफान 
लाल बादशाह 
2000 
बागी 
कुरूक्षेत्र 
2003 एक और एक ग्यारह 
2005 सुख 
219 रंगीला राजा

श्रीदेवी

#13aug 
#24feb 
श्री अम्मा यंगर अय्यपन
श्री देवी
13 अगस्त 1963
सिवकासी, मद्रास
(अभी तमिलनाडु), भारत
मौत
24 फ़रवरी 2018 (उम्र 54)
दुबई, संयुक्त अरब अमीरात
मौत की वजह
पानी में डूबना
पेशा
अभिनेत्री, निर्माता
कार्यकाल
1967–1997, 2012–2018
जीवनसाथी
बोनी कपूर (वि॰ 1996)
बच्चे
2
संबंधी
देखें कपूर परिवार
पुरस्कार
पद्म श्री (2013)1975 की फिल्म जूली से उन्होंने हिन्दी सिनेमा में बाल अभिनेत्री के रूप में प्रवेश किया था। अपनी पहली फिल्म मून्द्र्हु मुदिछु नामक तमिल में थी। श्रीदेवी का बॉलीवुड में प्रवेश 1978की फिल्म सोलहवाँ सावन से हुआ। लेकिन उन्हे सबसे अधिक पहचान 1983 की फिल्म हिम्मतवाला से मिली। एक के बाद एक सुपरहिट महिला प्रधान फिल्मो की वजह से उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्री के तौर पर भी जाना जाता है। सदमा, नागिन,निगाहें, मिस्टर इन्डिया, चालबाज़, लम्हे, ख़ुदागवाह और जुदाई उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं।  ⚰️24फरवरी 2018को दुबई में उनका निधन हुआ।अपने फिल्मी करियर में श्रीदेवी ने 63 हिंदी, 62 तेलुगु, 58 तमिल, 21 मलयालम तथा कुछ कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया।
1972 से 1994 के बीच अपनी फिल्मों की शूटिंग के दौरान श्रीदेवी हमेशा अपनी मां राजेश्वरी या अपनी बहन श्रीलता के साथ फिल्म सेट पर जाती थीं।  संजय रामासामी 1989 से अपनी बहन श्रीलता से विवाहित हैं। 

श्रीदेवी ने अपने पिता के लिए प्रचार किया जब उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनावों में शिवकाशी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा , लेकिन अंततः चुनाव हार गईं। उनके पिता की 1990 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, जब वह लम्हे की शूटिंग कर रही थीं । उनकी माँ की मृत्यु 1996 में हुई, जो 1995 में न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर में ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन से हुई जटिलताओं के परिणामस्वरूप हुई। न्यूरोसर्जन ने उनके मस्तिष्क के गलत हिस्से पर ऑपरेशन किया जिससे उनकी दृष्टि और हाल की स्मृति के महत्वपूर्ण ऊतक नष्ट हो गए। उस समय अमेरिकी मीडिया में इसकी व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई थी, जिसके बाद एक सफल अदालती लड़ाई हुई और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अस्पतालों को उनकी चिकित्सा त्रुटियों का खुलासा करने के लिए एक कार्यक्रम का प्रस्ताव दिया। श्रीदेवी अपनी निजता को लेकर बेहद सतर्क थीं और शायद ही कभी इंटरव्यू देती थीं या उनमें अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में बात करती थीं। 1996 में, उन्होंने निर्माता बोनी कपूर से शादी की । इस जोड़े की दो बेटियाँ हैं, जान्हवी (जन्म 1997) और ख़ुशी (जन्म 2000)। उनकी दोनों बेटियाँ अभिनेत्रियाँ हैं।

स्क्रीन पर एक मजबूत, जीवंत और उत्साही महिला के रूप में अपनी भूमिका के लिए मशहूर होने के बावजूद, श्रीदेवी स्क्रीन के पीछे एक बेहद अंतर्मुखी और आरक्षित व्यक्ति थीं। CNN-IBN संवाददाता राजीव मसंद कहते हैं; "मैंने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो स्क्रीन के पीछे इतना शर्मीला, इतना शांत हो, जो कैमरे के सामने आते ही प्रकृति की शक्ति में बदल जाए। वह एक साक्षात्कारकर्ता के लिए दुःस्वप्न थी, लेकिन फिल्म-प्रेमियों के लिए सपना थी"। उनके आरक्षित स्वभाव पर टिप्पणी करते हुए, फ़र्स्टपोस्ट कहता है; "चमकती, जादुई आँखों और तेजस्वी चेहरे वाली ग्लैमरस नायिका के पीछे, एक स्वाभाविक रूप से शर्मीली महिला थी, जिसे अक्सर अभिमानी समझ लिया जाता था। सच्चाई यह है कि वह शर्मीली थी। जब वह सिर्फ 4 साल की थी, तब अभिनय करना शुरू कर दिया था, उसने औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं की थी या अपनी उम्र के बच्चों के साथ बातचीत करने का ज़्यादा मौका नहीं मिला था। नतीजतन, उसे भीड़ और शोर से सख्त नफरत हो गई।" 
⚰️श्रीदेवी का निधन २४ फरवरी २०१८ को दुबई में हुआ। हालांकि यह पहले घोषित किया गया था कि मौत का कारण दिल का दौरा है, लेकिन बाद में दुबई पुलिस द्वारा जारी की गयी फोरेंसिक रिपोर्ट में संकेत मिले है कि इनकी मृत्यु होटल में बाथटब में दुर्घटनाग्रस्त रूप से डूबने से हुई है।
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प्रमुख फिल्में

जैसे को तैसा (1973)
जूली (1975)
सोलहवां सावन (1978)
हिम्मतवाला (1983)
जस्टिस चौधरी (1983)
जानी दोस्त (1983)
कलाकार (1983)
सदमा (1983)
अक्लमंद (1984)
इन्कलाब (1984)
जाग उठा इंसान (1984)
नया कदम (1984)
मकसद (1984)
तोहफा (1984)
बलिदान (1985)
मास्टर जी (1985)
सरफ़रोश (1985)
आखिरी रास्ता (1986)
भगवान दादा (1986)
धर्म अधिकारी (1986)
घर संसार (1986)
नगीना (1986)
कर्मा (1986)
सुहागन (1986)
सल्तनत (1986)
औलाद (1987)
हिम्मत और मेहनत (1987)
नज़राना (1987)
मजाल (1987)
जोशीले (1987)
जवाब हम देंगे (1987)
मिस्टर इंडिया (1987)
शेरनी (1988)
राम अवतार (1988)
वक़्त की आवाज़ (1988)
सोने पे सुहागा (1988)
चालबाज़ (1989)
चांदनी (1989)
गुरु (1989)
गैर कानूनी (1989)
निगाहें (1989)
बंजारन (1991)
फ़रिश्ते (1991)
पत्थर के इंसान (1991)
लम्हे (1991)
खुदा गवाह (1992)
हीर राँझा (1992)
चन्द्रमुखी (1993)
गुमराह (1993)
गुरुदेव (1993)
रूप की रानी चोरों का राजा (1993)
चाँद का टुकड़ा (1994)
लाडला (1994)
आर्मी (1996)
मि. बेचारा (1996)
कौन सच्चा कौन झूठा (1997)
जुदाई (1997)
मेरी बीबी का जवाब नहीं (2004)
मि. इंडिया 2 (2007)

2017 मॉम (फ़िल्म) हिन्दी फ़िल्म
2012 इंग्लिश विंग्लिश हिन्दी फ़िल्म
2007 हल्ला बोल 
2004 मेरी बीवी का जवाब नहीं दुर्गा
1997 जुदाई हिन्दी फ़िल्म
1997 कौन सच्चा कौन झूठा 
1996 आर्मी 
1996 मिस्टर बेचारा 
1996 ग्रेट रॉबरी 
1994 चाँद का टुकड़ा
1993 गुमराह हिन्दी फ़िल्म
1992 खुदा गवाह हिन्दी फ़िल्म
1991 लाम्हे हिन्दी फ़िल्म
1989 चान्दनी हिन्दी फ़िल्म
1989 चालबाज़ हिन्दी फ़िल्म
1987 मिस्टर इण्डिया हिन्दी फ़िल्म
1986 नगिना हिन्दी फ़िल्म
1983 हिम्मतवाला हिन्दी फ़िल्म
1983 सदमा हिन्दी फ़िल्म

Friday, August 2, 2024

मनहर देसाई

#03aug
#25feb
मनहर देसाई
🎂03अगस्त 1917,
मुम्बई
⚰️25 फ़रवरी 1992,
मुम्बई

मनहर देसाई उर्फ ​​मलकम अल्फ्रेडो देसाई एक बॉलीवुड अभिनेता थे जिनका जन्म 3 अगस्त 1917 को मुंबई में हुआ था। उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने सती नाग कन्या (1983) नामक फिल्म में रावण की भूमिका निभाई, रतिलाल हेमचंद पुणतार द्वारा निर्देशित मंगलफेरा में मंगल, चतुर्भुज दोषी द्वारा लिखित गुणसुंदरी (1948) में चंद्रकांत की भूमिका निभाई। , वगैरह।

उनकी कुछ अन्य फ़िल्में हैं श्री कृष्ण लीला, जय संतोषी माँ, महाभारत, ज़बक, गीत गाता चल, भगवान श्री कृष्ण, आदि। मनहर देसाई ने ज़्यादातर फ़िल्मों या प्राचीन कहानियों को समझाने वाली फ़िल्मों में काम किया है। 25 फ़रवरी 1992 को मुंबई, महाराष्ट्र में उनका निधन हो गया।


Thursday, August 1, 2024

कमल कपूर

#02aug 
#22feb 
कमल कपूर
🎂22 फ़रवरी 1920,
 लाहौर, पाकिस्तान
⚰️ 02 अगस्त 2010,
 मुम्बई
बच्चे: कपिल कपूर, मधु रमेश बहल
पोते या नाती: गोल्डी बहल, श्रृष्टि बहल
भाई: रविन्द्र कपूर
कमल कपूर (पंजाबी: ਕਮਲ ਕਪੂਰ) एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता थे जिन्होंने लगभग 600 हिन्दी, पंजाबी और गुजराती फ़िल्मों मे काम किया था।

कमल कपूर का जन्म1920 में लाहौर, पंजाब में हुआ। उन्होंने लाहौर के ही डीएवी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। वे पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई और गोल्डी बहल के नाना थे।
उन्होने अपने सफर की शुरुआत 1940-50 के दौर में नायक के रूप में की थी। उनकी पहली फ़िल्म "दूर चलें" थी जो 1946 मे प्रदर्शित हुई। साठ के दशक से उन्होने खलनायक की भूमिका करनी आरंभ की, इनमें से कुछ लोकप्रिय किरदार पाक़ीज़ा (1972) में नवाब जफर अली खान, डॉन (1978) में नारंग और मर्द (1985) में जनरल डायर रहें।
🎥
1947 
डाक बंग्ला 
हातिमताई 
1948 आग
1961 रेशमी रूमाल 
1962 एक मुसाफ़िर एक हसीना 
1965
 जब जब फूल खिले  
शहीद
1967 
तकदीर 
राज
1968 राजा और रंक 
1970 सच्चा झूठा
1972 
पाक़ीज़ा 
सीता और गीता 
गोरा और काला
1973
 बलैक मेल 
हँसते ज़ख़्म
1978 डॉन 
1985 मर्द 
1989 तूफान

भगवान दादा

#01aug 
#04feb 
भगवान दादा
🎂01 अगस्त 1913
अमरावती,भारत
04 फ़रवरी 2002 (उम्र 88)
मुंबई भारत
व्यक्तिगत जीवन
भगवान दादा 1913 में भगवान Abhaji Palav के रूप अमरावती, महाराष्ट्र में में पैदा हुआ था। वह एक कपड़ा मिल मजदूर का बेटा था, लेकिन फ़िल्मों के साथ जुनून सवार था। वह एक मजदूर के रूप में काम किया, लेकिन फ़िल्मों का सपना देखा था। भगवान दादा मूलतः सिंधी समुदाय के थे। उनके पूर्वज बहुत पहले सिंध से महाराष्ट्र आकर बस गए थे। युवा होने पर उनका सपना अभिनेता बनना था।वह मूक फ़िल्मों में बिट भूमिकाओं के साथ उसका तोड़ मिल गया और स्टूडियो के साथ पूरी तरह से शामिल हो गया। उन्होंने फ़िल्म बनाने और कम बजट फ़िल्मों (जिसमें वह सब कुछ कलाकारों के लिए भोजन की व्यवस्था और वेशभूषा की डिजाइन सहित के लिए व्यवस्था) रु. के लिए 65,000 बनाने के लिए इस्तेमाल एक मंच पर सीखा है।भगवान दादा (1 अगस्त 1913 - 4 फरवरी 2002), जिन्हें भगवान के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय अभिनेता और फिल्म निर्देशक थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में काम किया। उन्हें उनकी सामाजिक फिल्म अलबेला (1951) और "शोला जो भड़के" और "ओ बेटा जी ओ बाबूजी किस्मत की हवा कभी नरम" गीतों के लिए जाना जाता है ।

भगवान अभाजी पलव, जिन्हें मुख्य रूप से कुश्ती के प्रति अपने प्रेम के कारण भगवान दादा के नाम से जाना जाता है, ने मूक युग में फिल्म क्रिमिनल से अपनी शुरुआत की ।

उन्होंने 1938 में चंद्रराव कदम के साथ अपनी पहली फिल्म बहादुर किसान का सह-निर्देशन किया । 1938 से 1949 तक, उन्होंने कई कम बजट की स्टंट और एक्शन फिल्मों का निर्देशन किया जो कामकाजी वर्ग के बीच लोकप्रिय थीं। उन्होंने आमतौर पर एक भोले-भाले व्यक्ति की भूमिका निभाई। इस अवधि के दौरान उनकी उल्लेखनीय फिल्मों में से एक तमिल फिल्म वन मोहिनी (1941) थी जिसमें एमके राधा और श्रीलंकाई अभिनेत्री थावमणि देवी ने अभिनय किया था । 

1942 में एक सीन के दौरान उन्हें अभिनेत्री ललिता पवार को जोरदार थप्पड़ मारना था। उन्होंने गलती से उन्हें बहुत जोर से थप्पड़ मारा, जिसके परिणामस्वरूप उनके चेहरे पर लकवा मार गया और उनकी बाईं आंख की नस फट गई। तीन साल के इलाज के बाद पवार की बाईं आंख खराब हो गई। 

उन्होंने 1942 में जागृति पिक्चर्स के साथ निर्माता का काम शुरू किया, कुछ ज़मीन खरीदी और 1947 में चेंबूर में जागृति स्टूडियो की स्थापना की। राज कपूर की सलाह के कारण, उन्होंने अलबेला नामक एक सामाजिक फ़िल्म बनाने का काम शुरू किया , जिसमें भगवान और गीता बाली ने अभिनय किया और उनके दोस्त चितलकर या सी. रामचंद्र ने संगीत दिया । फ़िल्म के गाने, ख़ास तौर पर "शोला जो भड़के" आज भी याद किए जाते हैं। अलबेला एक बड़ी हिट फ़िल्म थी। अलबेला के बाद, भगवान ने सी. रामचंद्र और गीता बाली को फिर से झमेला (1953) में साथ लिया, जहाँ उन्होंने अलबेला की सफलता के फ़ॉर्मूले को फिर से बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें थोड़ी सफलता मिली। उन्होंने 1956 में भागम भाग का निर्देशन और अभिनय भी किया।

उसके बाद, भगवान के पास कोई और हिट नहीं थी और अंततः उन्हें फिल्मों का निर्माण और निर्देशन छोड़ना पड़ा, और जुहू में अपना 25 कमरों वाला वाटरफ्रंट बंगला और अपनी सात कारों (सप्ताह के प्रत्येक दिन के लिए एक) को बेचना पड़ा। उन्होंने जो भी भूमिकाएँ मिल सकीं, उन्हें लिया, लेकिन झनक झनक पायल बाजे (1955), चोरी चोरी (1956) और गेटवे ऑफ़ इंडिया (1957) के अलावा, कोई भी भूमिका उल्लेखनीय नहीं थी, और उन्होंने अंततः छोटे-छोटे हिस्से किए जिनमें उन्होंने अपना प्रसिद्ध नृत्य किया ( अमिताभ बच्चन द्वारा इसे अपने डिफ़ॉल्ट डांस स्टेप के रूप में उपयोग करने से यह और भी प्रसिद्ध हो गया)।

भगवान के अधिकांश सहयोगी उनकी ज़रूरत के समय में उनका साथ छोड़ गए, सिवाय सी. रामचंद्र , ओम प्रकाश और गीतकार राजिंदर कृष्ण के , जो उनकी चॉल में भी उनसे मिलते रहे। 4 फरवरी 2002 को दादर में उनके निवास पर दिल का दौरा पड़ने से भगवान की मृत्यु हो गई। 
2016 में, एक मराठी फिल्म एक अलबेला रिलीज़ हुई जो अभिनेता की बायोपिक थी।
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1951 अलबेला 
1956 भागम भाग 
1964 जादुई कालीन 
1967 छैला बाबू

करण सिंह ग्रोवर

करन सिंह ग्रोवर 🎂जन्म की तारीख और समय: 23 फ़रवरी 1982 , नई दिल्ली पत्नी: बिपाशा बसु (विवा. 2016), जेनिफर विंगेट (विवा. 2012–2014), करन सिंह...