#20feb
कैफ भोपाली
🎂20 फरवरी 1917
भोपाल रियासत ब्रिटिश भारत
(अब) भोपाल मध्य प्रदेश भारत
मौत
⚰️24 जुलाई 1991
भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत
पेशा
शायर,गीतकार, कवि
भारतीय
विधा
गज़ल, उर्दू शायरी
विषय
प्यार, दर्शन
कैफ़ भोपाली ने कई हिंदी फिल्मों में गीत लिखे, किन्तु 1972 में बनी पाक़ीज़ा उनकी यादगार फिल्म रही। इस फिल्म के लगभग सभी गाने लोकप्रिय हुए, जैसे "तीरे नज़र..", "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...." आदि।
सत्तर-अस्सी के दशक में वे लगातार मुशायरों की जान बने रहे। उन्होंने कई प्रसिद्ध गज़लें कही है, जैसे "तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है", झूम के जब रिन्दों ने पिला दी आदि जिसे आवाज़ दी है जगजीत सिंह ने।कमाल अमरोही की एक और फिल्म रज़िया सुल्तान में उनके द्वारा लिखा एक गाना "ऐ खुदा शुक्र तेरा...." काफी लोकप्रिय हुआ। उनकी पुत्री "परवीन कैफ़" भी उर्दू की मशहूर शायरा हैं।
शायर कै़फ़ भोपाली का जन्म 1917 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था लेकिन उनके पूर्वज कश्मीर से आए थे।
कैफ़ भोपाली ने कई हिंदी फिल्मों में गीत लिखे, किन्तु 1972 में बनी पाक़ीज़ा उनकी यादगार फिल्म रही। इस फिल्म के लगभग सभी गाने लोकप्रिय हुए, जैसे "तीरे नज़र..", "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...." आदि। सत्तर-अस्सी के दशक में वे लगातार मुशायरों की जान बने रहे। उन्होंने कई प्रसिद्ध गज़लें कही है, जैसे "तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है", झूम के जब रिन्दों ने पिला दी आदि जिसे आवाज़ दी है जगजीत सिंह ने।कमाल अमरोही की एक और फिल्म रज़िया सुल्तान में उनके द्वारा लिखा एक गाना "ऐ खुदा शुक्र तेरा...." काफी लोकप्रिय हुआ। उनकी पुत्री "परवीन कैफ़" भी उर्दू की मशहूर शायरा हैं।
सीधा-सरल जीवन जीने वाले क़ैफ़ साहब घुमक्कड़ी स्वभाव के थे और शायरी-शराब उनके दिनचर्या में शामिल रहा। कै़फ़ भोपाली मुशायरों की रूह कहे जाते थे।
कै़फ़ भोपाली साहब की मूल विधा ग़ज़ल और उर्दू शायरी थी लेकिन वो फिल्मों में भी सक्रिय रहे और 'पाकीजा' के लिखे गीत उनकी यादगार रचनाओं में शामिल है। कहते हैं कै़फ साहब की कमाल अमरोही से मुलाकात एक मुशायरे के दौरान ही हुई थी और उसी दरम्यान कमाल अमरोही ने उन्हें गीत लिखने का मशविरा दे डाला।
कमाल साहब की सलाहियत पर अमल करते हुए क़ैफ़ भोपाली शायर से गीतकार बन गए। कैफ़ साहब को मुशायरों की रौनक़ कहा जाता था, वह आम चलन से हटकर शेर कहते थे। अपने अंदाजे बयां का लिए जाने जाते थे। विशिष्ट तरन्नुम में शेर सुनाना उनकी पहचान का हिस्सा था।
रिंदगी और रोमांटिसिज्म की झलक उनकी शायरियों में बख़ूबी दिखती है। 'झूम के जब रिंदों ने पिला दी...' उनकी एक और लोकप्रिय ग़ज़ल है, जिसे गाया था सर्वकालिक मशहूर ग़ज़ल गायक 'पद्मभूषण' जगजीत सिंह ने।
मुशायरों की रूह कहे जाने वाले कै़फ़ भोपाली ने 1991 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनके लिखे गीत-ग़ज़ल हमेशा सुने जाते रहेंगे और इस तरह वो हमेशा हमारे बीच जिंदा रहेंगे।
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पाकीज़ा (1972)
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रजिया सुल्तान (1983)
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