दीप्ति नवल🎂03 फ़रवरी, 1952
को हुआ था। वे अपने खुले विचारों के लिए मशहूर हैं। उनका बचपन अमरीका के न्यूयॉर्क में बीता, जहां उनके पिता सिटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक थे। दीप्ति नवल को बचपन से ही अभिनय के साथ-साथ चित्रकारी एवं फोटोग्राफी का शौक था। उन्होंने 1985 में मशहूर फ़िल्म निर्देशक प्रकाश झा से विवाह किया, लेकिन ये शादी अधिक सफल नहीं रही और चार साल बाद दोनों का तलाक हो गया। प्रकाश झा से दीप्ति नवल को एक बेटी दिशा है। दीप्ति नवल, प्रकाश झा से अलग होने के बाद भी एक अच्छे दोस्त के तौर पर उनसे मिलती हैं। दोनों तलाक के बाद अपनी बेटी और दोस्त विनोद के साथ डिनर पर भी गए थे। दीप्ति की बेटी दिशा सिंगर बनना चाहती हैं। वे अपने पिता की फ़िल्म राजनीति में बतौर कॉस्ट्यूम सुपरवाइजर काम कर चुकी हैं।
दीप्ति नवल की पहली फ़िल्म श्याम बेनेगल की
‘जुनून’ (1978) थी। एक बहुत बड़ी और सीज़न्ड स्टारकास्ट से सजी इस फ़िल्म में दीप्ति का बहुत छोटा सा रोल था। इसके बाद एक लीड एक्ट्रेस के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 1980 में आई। नाम था- ‘एक बार फिर’। विवाहेतर संबंधों पर बनी थी। पहले इस फ़िल्म का सब्जेक्ट कितना बोल्ड कहा गया होगा, ये कल्पना करना मुश्किल नहीं है। ‘एक बार फिर’ में निभाए ‘कल्पना’ के इस किरदार के बारे में दीप्ति नवल ने एक बार बताया कि- 'एक बार फिर’ में पहली बार ऐसा था कि लीड एक्ट्रेस, पुरुष दर्शकों की फेंटेसी को संतुष्ट करने के लिए नहीं थी। इस फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्मों में महिला किरदारों के बिल्कुल नई परिभाषा दी थी। कल्पना का ये किरदार मील का पत्थर था'।
इस फ़िल्म में उनके साथ को-एक्ट्रेस सुरेश ओबरॉय और प्रदीप वर्मा थे। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के बाद दीप्ति नवल ने सुरेश ओबरॉय से किनारा कर लिया और दोनों के बीच ये दूरी 4 साल तक ज़ारी रही। फिर इन दोनों की एक साथ जो फ़िल्म आई उसका नाम था ‘कानून क्या करेगा’ (1984)। इसके बाद दीप्ति नवल पैरलल सिनेमा का पर्यायवाची बन गईं। उनके अनुसार- 'मेरी इस तरह के सिनेमा से ही शुरुआत हुई। उन दिनों जिस तरह की म्यूज़िक फ़िल्में आ रही थीं उन सबके बीच मेरी यात्रा कहीं ज़्यादा रोचक रही थी। मैंने ऐसी फ़िल्में कीं जैसे, ‘कमला’ (जगमोहन मूदंड़ा), ‘मैं ज़िन्दा हूं’ (सुधीर मिश्रा), ‘पंचवटी’ (बासु भट्टाचार्य) और ‘अनकही’ (अमोल पालेकर)'।
फ़िल्म 'अनकही' से जुड़ा अनुभव
‘अनकही’ (1985) में अपने रोल को समझने के लिए दीप्ति नवल एक मेंटल हॉस्पिटल गईं। ये 1983 की बात थी। इससे पहले दीप्ति जब सिर्फ 12 साल की थीं, तब भी उन्हें पागलखाने जाने का अनुभव मिला। उनकी एक दोस्त वहां भर्ती हुई थी। फिर अमोल पालेकर की फ़िल्म के दस साल बाद, 1993 में, वो मेंटल होम में दो हफ्ते तक रहीं। उस वक्त वो एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहीं थीं। उसी की रिसर्च के चलते। हालांकि ये स्क्रिप्ट कभी पूरी न हो सकी लेकिन टेलीग्राफ को दिए एक इंटरव्यू मेंउन्होंने बताया था कि उस अनुभव ने उनका जीवन बदल कर रख दिया।
उनको पागलखाने से बाहर की दुनिया, होशमंद लोगों की दुनिया सतही और काल्पनिक लगने लगी। वहां दीप्ति ऐसे लोगों, ऐसी औरतों से भी मिलीं जो पागल नहीं थीं लेकिन जिनके परिवार वालों ने उन्हें वहां डाल दिया था। क्यूंकि परिवार में अब उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी। इस पूरे अनुभव को बाद में दीप्ति नवल ने एक अंग्रेज़ी कविता के माध्यम से व्यक्त किया- 'होशमंदी की बदबू'
(The Stench of Sanity)।
मिस चमको
अच्छा सुनिए ‘मिस चमको’, आप दीजिए अपना डेमोंस्ट्रेशन।
ये पहली बार था जब ‘चश्मे बद्दूर’ फ़िल्म में सिद्धार्थ, नेहा को ‘मिस चमको’ के नाम से पुकारता है। फ़िल्म में नेहा का किरदार दीप्ति नवल ने और सिद्धार्थ का किरदार फ़ारुख़ शेख़ ने निभाया था। आज कई साल बीत जाने के बाद भी हम नहीं जानते कि ‘चश्मे बद्दूर’ में दीप्ति नवल के किरदार का नाम नेहा था। लेकिन आज भी ‘चमको’ कहते ही आंखों के सामने करीने से साड़ी पहने हुए, हाथ में चमको वाशिंग पाउडर पकड़े हुए दीप्ति नवल का किरदार जीवंत हो जाता है। इस फ़िल्म की डायरेक्टर थीं सईं परांजपे। मराठी रंगमंच से आईं, सईं अपनी आर्टहाउस फ़िल्मज़ के लिए जानी जातीं थीं। ‘चश्मे बद्दूर’ डायरेक्ट करने से पहले उन्हें अपनी पहली हिंदी फ़िल्म 'स्पर्श' (1980) के लिए नेशनल अवॉर्ड मिल चुका था।
सोसायटी वालों का हंगामा
उस ‘चश्मे बद्दूर’ के ठीक बत्तीस साल बाद, 2013 में इसकी ऑफिशियल रीमेक आई थी। 2013 की रीमेक फ़िल्म को डायरेक्ट किया था डेविड धवन ने और दीप्ति नवल वाला किरदार निभाया था तापसी पन्नू ने। जब ये रीमेक रिलीज़ होने वाली थी उसी दौरान का ये एक क़िस्सा है। हुआ यह कि डेविड वाली ‘चश्मे बद्दूर’ की रिलीज़ के साथ-साथ पुरानी, सईं परांजपे वाली ‘चश्मे बद्दूर’ फ़िल्म भी री-रिलीज़ होने वाली थी। इसी मसले पर दीप्ति नवल से पत्रकार मिलने आए थे, उनके घर पर। ‘ओशियेनिक अपार्टमेंट’ के छठे फ्लोर में। उस वक्त उनके घर पर फ़ारूख़ शेख़ भी थे। अभी पत्रकारों से बात चल ही रही थी कि जिस सोसायटी में दीप्ति का घर था, उस सोसायटी में रहने वाले लोग दीप्ति के घर में आ गए और इंटरव्यू को जबरिया रोकने लगे। उन्हें लगा कि ये इंटरव्यू नहीं, किसी फ़िल्म का सीन है। हंगामा खड़ा हो गया। सोसायटी वाले कोई बात सुनने को तैयार न थे। जब दीप्ति ने बताया कि ये इंटरव्यू है तो बोले कि इंटरव्यू लेना भी सोसायटी के नियमों के खिलाफ है।
खैर, दीप्ति नवल को बेवजह शर्मिंदा होकर वो घर छोड़ना पड़ा। जहां दीप्ति को रहते हुए 30 साल से ज़्यादा हो गए थे। इस पूरे वाक़ये पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए दीप्ति नवल ने बताया था कि- 'मैं तब उस अपार्टमेंट में रहने आई थी, जब किसी की हिम्मत नहीं थी वहां रहने की। मैंने पहले भी कई पार्टियां और प्रेस कॉन्फ्रेंस वहां की हैं। ऐसा पहली बार था कि मुझे ऐसा महसूस करवाया गया कि मैं एक वैश्यालय चला रही हूं। मैंने अपनी ज़िंदगी में इतना शर्मसार महसूस नहीं किया था'।
जब ये स्टोरी अख़बार में छपी तो वो थी तो दीप्ति के पक्ष में, लेकिन इसकी हैडिंग थी- 'मैं कोई प्रॉस्टिट्यूट रैकेट नहीं चला रही हूं: दीप्ति नवल'। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इस खबर को प्राइमरी सोर्स मानकर कई अख़बारों और वेब न्यूज़ पोर्टल्स ने खबर चला दी और इस दौरान कई पोर्टल्स ने पूरी खबर पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। अगले कुछ दिनों तक ये खबर चलती रही कि दीप्ति पर सोसायटी वालों ने आरोप लगाया है कि वो सेक्स रैकेट चलाती हैं।
सिनेमा की टॉर्च बियरर
मेनस्ट्रीम सिनेमा के पैरलल में एक आर्टहाउस सिनेमा खड़ा हो रहा था। इस दौर को ‘दी इंडियन पैरलल फ़िल्म मूवमेंट’ कहा गया। दीप्ति नवल, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल इस मूवमेंट की झंडाबरदार बनीं। स्टारडस्ट के कवर में तीनों की तस्वीरें छपी। हैडिंग थी- 'न्यू वेव ग्लैमर क्वीन्स'। हालांकि स्मिता और दीप्ति ने एक साथ सिर्फ एक फ़िल्म की थी। 1985 में आई केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’। लेकिन उनकी दोस्ती के बारे में आज तक बातें होती हैं। स्मिता सिर्फ 31 साल की थीं जब गुज़रीं। हिंदुस्तान टाइम्स को एक बार सोसायटी ने बताया था कि- 'मैं स्मिता पाटिल को बहुत मिस करती हूं। मैं उनसे खुद को रिलेट कर पाती थी'।
स्मिता और मैं
सोसायटी ने स्मिता पाटिल के लिए भी एक कविता अंग्रेज़ी में लिखी।
'स्मिता और मैं'
(Smita and I)
नाम की इस छोटी-सी कविता में दीप्ति ने लिखा कि वो अक्सर स्मिता से तब मिलती थीं, जब उन्हें साथ में फ्लाइट लेनी होती थी, सफ़र पर निकलना होता था। ये शायद रूपक है, इस बात का कि दीप्ति और स्मिता ने जीवन का सफ़र साथ बिताया, दोस्तों की तरह। तमाम भौतिक और नकली चीजों के बीच एक-दूसरे का साथ और स्पर्श था, जो असली था, सच्चा था। दीप्ति लिखती हैं कि स्मिता के साथ जब वो आखिरी फ्लाइट लेने वाली थीं, तो उन्होंने स्मिता से पूछा था कि- 'क्या जीवन जीने का कोई और तरीका नहीं हो सकता?'
स्मिता कुछ देर चुप रहीं फिर कहा- 'नहीं, जीने का कोई और तरीका नहीं हो सकता'।
दीप्ति नवल की लिखी एक और कविता है 'सफेद कागज़ पे पानी से'
सफेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम इक नज़्म लिखी है मैंने
तिलस्मी रातों पर जब चांद का पहरा होगा
तमाम उम्र सिमट कर जब
इक लम्हें में ढल जायेगी
काशनी अंधेरों के तले
जब कांच के धागों की तरह
पानी की रुपहली सतह पर
ख़ामोशी थिरकती होगी
और झील के उस किनारे पर मचलेंगी
चांद की सोलह परछाइयां
मैं इस पार बैठ कर सुनाऊंगी तुम्हें
सफ़ेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम जो नज़्म लिखी है मैंने
🎥दीप्ति नवल की फिल्मोग्राफी -
1978 जूनून
1979 जलियां वाला बाग
1980 हम पांच और एक बार फिर
1981 चश्मेबद्दूर
1982 अंगूर, साथ-साथ और
श्रीमान श्रीमती
1983 रंग बिरंगी, एक बार चले आओ
कथा और किसी से ना कहना
1984 मोहन जोशी हाज़िर हो, कमला
कानून क्या करेगा, हिप हिप हुर्रे
ये इश्क नहीं आसां, अंधी गली और
मृत या जीवित चाहिए,
1985 दामुल, फासले, टेलीफोन, होली,
अनकही, अपना जहां और
औरत जोड़ी की जूती नहीं है
1986 आशियाना, बेगाना और नसिहाट
1987 मेरा सुहाग और मिर्च मसाला
1988 अभिशप्त, शूरवीर और
मैं जिंदा मैं हूं
1989 मरही दा दीवा (पंजाबी फिल्म) और
जिस्म का रिश्ता,
1990 घर हो तो ऐसा
1991 माने (कन्नड़ फ़िल्म), एक घर और
सौदागर
1992 वर्तमान और यलगार
1994 बॉलीवुड और मिस्टर आज़ाद
1995 दुश्मनी: एक हिंसक प्रेम कहानी
जय विक्रांत और गुड्डु
1996 सौतेला भाई
1998 ऐ संघर्ष
1999 कभी पास कभी फेल
2000 बवंडर
2002 लीला और शक्ति - द पावर
2003 अजीब चक्र
2004 अनाहत (मराठी)
2006 यात्रा, 2008 फ़िराक़
मार्च 2010 की यादें
2011 टेल मी ओ खुदा, भिंडी बाज़ार इंक.
परंपरा में फँसा हुआ: रिवाज़
जिंदगी ना मिलेगी दोबारा
2013 महाभारत कुंती (वॉयस-ओवर)
बी ० ए। दर्रा, औरंगजेब, इंका और
सुनो... अमय
2014 यारिया और बैंग बैंग!
2015 NH10, हार्टलेस और तेवर,
2016 सिंह
2020 आपराधिक न्याय (वेब श्रृंखला)
2023 मदर टेरेसा और मैं, गोल्डफिश
📺 टेलीविजन -
1985 अपना जहाँ: शांति साहनी (टेलीविज़न फ़िल्म)
1991-1992 कहकशां
1992 सौदा
1994 तनाव: श्रीमती मलिक
2003-2004 मुक़म्मल: सुमीशा
2011 मुक्ति बंधन: परिमीता
2016 मेरी आवाज़ ही पहचान है: कल्याणी गायकवाड़
2017 द बॉय विद द टॉपकनॉट: सथनाम की माँ
(टेलीविज़न फ़िल्म)
2019 मेड इन हेवन: गायत्री माथुर (अतिथि)
2020 पवन और पूजा पूजा कालरा
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