Tuesday, July 23, 2024

कैफ भोपाली

#24july
#20feb 

कैफ भोपाली
🎂20 फरवरी 1917
 भोपाल रियासत ब्रिटिश भारत
(अब) भोपाल मध्य प्रदेश  भारत
मौत
⚰️24 जुलाई 1991
भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत
पेशा
शायर,गीतकार, कवि

भारतीय

विधा
गज़ल, उर्दू शायरी
विषय
प्यार, दर्शन
कैफ़ भोपाली ने कई हिंदी फिल्मों में गीत लिखे, किन्तु 1972 में बनी पाक़ीज़ा उनकी यादगार फिल्म रही। इस फिल्म के लगभग सभी गाने लोकप्रिय हुए, जैसे "तीरे नज़र..", "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...." आदि।

सत्तर-अस्सी के दशक में वे लगातार मुशायरों की जान बने रहे। उन्होंने कई प्रसिद्ध गज़लें कही है, जैसे "तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है", झूम के जब रिन्दों ने पिला दी आदि जिसे आवाज़ दी है जगजीत सिंह ने।कमाल अमरोही की एक और फिल्म रज़िया सुल्तान में उनके द्वारा लिखा एक गाना "ऐ खुदा शुक्र तेरा...." काफी लोकप्रिय हुआ। उनकी पुत्री "परवीन कैफ़" भी उर्दू की मशहूर शायरा हैं।

शायर कै़फ़ भोपाली का जन्म 1917 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था लेकिन उनके पूर्वज कश्मीर से आए थे।
कैफ़ भोपाली ने कई हिंदी फिल्मों में गीत लिखे, किन्तु 1972 में बनी पाक़ीज़ा उनकी यादगार फिल्म रही। इस फिल्म के लगभग सभी गाने लोकप्रिय हुए, जैसे "तीरे नज़र..", "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...." आदि। सत्तर-अस्सी के दशक में वे लगातार मुशायरों की जान बने रहे। उन्होंने कई प्रसिद्ध गज़लें कही है, जैसे "तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है", झूम के जब रिन्दों ने पिला दी आदि जिसे आवाज़ दी है जगजीत सिंह ने।कमाल अमरोही की एक और फिल्म रज़िया सुल्तान में उनके द्वारा लिखा एक गाना "ऐ खुदा शुक्र तेरा...." काफी लोकप्रिय हुआ। उनकी पुत्री "परवीन कैफ़" भी उर्दू की मशहूर शायरा हैं।
सीधा-सरल जीवन जीने वाले क़ैफ़ साहब घुमक्कड़ी स्वभाव के थे और शायरी-शराब उनके दिनचर्या में शामिल रहा। कै़फ़ भोपाली मुशायरों की रूह कहे जाते थे। 
कै़फ़ भोपाली साहब की मूल विधा ग़ज़ल और उर्दू शायरी थी लेकिन वो फिल्मों में भी सक्रिय रहे और 'पाकीजा' के लिखे गीत उनकी यादगार रचनाओं में शामिल है। कहते हैं कै़फ साहब की कमाल अमरोही से मुलाकात एक मुशायरे के दौरान ही हुई थी और उसी दरम्यान कमाल अमरोही ने उन्हें गीत लिखने का मशविरा दे डाला। 

कमाल साहब की सलाहियत पर अमल करते हुए क़ैफ़ भोपाली शायर से गीतकार बन गए। कैफ़ साहब को मुशायरों की रौनक़ कहा जाता था, वह आम चलन से हटकर शेर कहते थे। अपने अंदाजे बयां का लिए जाने जाते थे। विशिष्ट तरन्नुम में शेर सुनाना उनकी पहचान का हिस्सा था। 

रिंदगी और रोमांटिसिज्म की झलक उनकी शायरियों में बख़ूबी दिखती है। 'झूम के जब रिंदों ने पिला दी...' उनकी एक और लोकप्रिय ग़ज़ल है, जिसे गाया था सर्वकालिक मशहूर ग़ज़ल गायक 'पद्मभूषण' जगजीत सिंह ने। 
मुशायरों की रूह कहे जाने वाले कै़फ़ भोपाली ने 1991 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनके लिखे गीत-ग़ज़ल हमेशा सुने जाते रहेंगे और इस तरह वो हमेशा हमारे बीच जिंदा रहेंगे।

🎥

दाएरा (1953) 
पाकीज़ा (1972) 
शंकर हुसैन (1977)
रजिया सुल्तान (1983)

Wednesday, July 17, 2024

भूपेंद्र सिंह सिंगर

#06feb
#18july 

भूपिंदर सिंह

पूरा नाम भूपिंदर सिंह

🎂जन्म 06 फ़रवरी, 1940
जन्म भूमि अमृतसर, पंजाब
⚰️मृत्यु 18 जुलाई, 2022
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक पिता- प्रोफेसर नत्था सिंह

पति/पत्नी मिताली सिंह
संतान पुत्र- निहाल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
प्रसिद्धि ग़ज़ल व पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी संगीतकार मदन मोहन ने एक संगीत समारोह में भूपिंदर सिंह को गाते देखा तो बस उनकी आवाज़ और अंदाज पर ऐसे फिदा हुए कि उनको अपनी अगली फिल्म में मौका देने की ठान ली।
भूपिंदर सिंह (अंग्रेज़ी: Bhupinder Singh, जन्म- 6 फ़रवरी, 1940; मृत्यु- 18 जुलाई, 2022) भारतीय सिनेमा के ख्याति प्राप्त पार्श्वगायक और ग़ज़ल गायक थे। उनके गाये हुए प्रसिद्ध गीतों में 'मेरा रंग दे बसंती चोला', 'नाम गुम जाएगा', 'प्यार हमें किस मोड़ पे', 'हुजूर इस कदर' आदि शामिल है। फ़िल्म 'मौसम' के गीत 'दिल ढूंढता है फिर वही, फुरसत के रात दिन' के गायक भूपिंदर सिंह ने संगीत की दुनिया में अपनी सत्ता लगातार बनाए रखी। अपनी जवारीदार गंभीर आवाज़़ से मखमली एहसास पैदा करने वाले महान गायक भूपिंदर सिंह का जादू हमेशा सिर चढ़ कर बोलता था।

परिचय

भूपिंदर सिंह का जन्म पंजाब के अमृतसर में 6 फरवरी, 1940 को हुआ था। उनके पिता प्रोफेसर नत्था सिंह खुद अच्छे संगीतकार थे। ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन’ से भूपिंदर सिंह को शोहरत मिली। भूपिंदर सिंह का मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद और मन्ना डे के साथ गाया गीत ‘होके मजबूर मुझे, उसने बुलाया होगा’ बेहद लोकप्रिय हुआ था। उनके लोकप्रिय गीतों में 'दुनिया छूटे यार ना छूटे', 'थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान', 'दिल ढूंढ़ता है', 'नाम गुम जाएगा' जैसे कई गाने शामिल हैं। यही नहीं भूपिंदर सिंह ने अपनी पत्नी मिताली सिंह के साथ 'दो दीवाने शहर में', 'कभी किसी को मुकम्मल जहां', 'एक अकेला इस शहर में' जैसे कई हिट गाने भी गाए। उन्हें सत्ते पे सत्ता, आहिस्ता-आहिस्ता, दूरियां, हकीकत और कई अन्य फिल्मों के यादगार गानों के लिए भी भूपिंदर को खूब याद किया जाता है।

विवाह

भूपिंदर सिंह ने 1980 के दशक में बांग्लादेश की गायिका मिताली मुखर्जी से शादी की थी। एक कार्यक्रम में उन्होंने मिताली को गाते सुना था। उसके बाद दोनों की मुलाकात प्यार में बदल गई। मिताली-भूपिंदर ने एक साथ सैकड़ों लाइव शो किए। उनका एक बेटा निहाल भी संगीतकार है।

दिल तक पहुंचने वाली आवाज़़

दिग्गज लेखक और फिल्मकार गुलज़ार भूपिंदर सिंह की आवाज़ के मुरीद रहे। उनके बारे में गुलज़ार ने एक बार कहा था, 'भूपिंदर की आवाज़़ किसी पहाड़ी से टकराने वाली बारिश की बूंदों की तरह है। उनकी मखमली आवाज़़ आत्मा तक सीधे पहुंचती है।'

मुंबई आगमन

अपने पिता की सख्त मिजाजी के कारण शुरुआती दौर में भूपिंदर सिंह को संगीत से नफरत हो गई थी। लेकिन उनकी आवाज़ का जादू ज्यादा देर तक इस चिढ़ का बंधक न रह पाया और उनके सुरीले सफर का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया। सबसे पहले उनकी गजलें आकाशवाणी में चलीं। इसके बाद दिल्ली दूरदर्शन में अवसर मिला। 1968 में संगीतकार मदन मोहन ने ऑल इंडिया रेडियो पर उनका कार्यक्रम सुनकर उन्हें मुंबई बुला लिया था।[1]

दरअसल, संगीतकार मदन मोहन ने एक संगीत समारोह में भूपिंदर सिंह को गाते देखा तो बस उनकी आवाज़ और अंदाज पर ऐसे फिदा हुए कि उनको अपनी अगली फिल्म में मौका देने की ठान ली। गायिका मिताली मुखर्जी से भूपिंदर सिंह की शादी 1984 में हुई थी। गायन और गिटार बजाने में माहिर भूपिंदर सिंह और मिताली की जोड़ी ने फिल्म संगीत और गजलों की दुनिया में खूब धूम मचाई। 'गुलमोहर', 'शबनम', 'अर्ज किया है', 'दूरियां', 'तेरा प्यार', 'चांद परोसा है' जैसे म्यूजिक एल्बम्स के अलावा फिल्म 'सत्ते पे सत्ता', 'दीवार', 'ज्वेल थीफ', 'मौसम', 'एक बार फिर' जैसी यादगार फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा।


प्रसिद्ध गीत

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जायेगा
प्यार हमें किस मोड़ पे
दिल ढूंढता है फिर वही
किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है
मेरे घर आना जिंदगी
हो के मजबूर मुझे
दो दिवाने शहर में
हुजूर इस कदर
करोगे याद तो हर बात याद आएगी
थोड़ी सी जमींन थोड़ा आसमान
शमा जलाए रखना
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
मृत्यु
प्रसिद्ध गायक भूपिंदर सिंह का निधन 18 जुलाई, 2022 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनकी पत्नी मिताली का कहना था कि वह पिछले 9 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

Thursday, July 11, 2024

प्राण

#12feb
#12july 
प्राण 


🎂जन्म की तारीख और समय: 12 फ़रवरी 1920, बाल्ली मरन, दिल्ली

⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 2013, Lilavati Hospital And Research Centre, मुम्बई
पत्नी: शुक्ला सिकन्द (विवा. 1945–2013)
बच्चे: सुनील सिकन्द, पिंकी सिकन्द, अरविन्द सिकन्द
भाई: प्रेम क्रिशन, राज क्रिशन, कृपाल क्रिशन
माता-पिता: लाला केवल कृष्णन सिकन्द, 

प्राण कृष्ण सिकंद हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता थे। प्राण ऐसे अभिनेता
थे जिनके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनाओं का तूफ़ान नज़र आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उनके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

प्राण का जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था। 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे।हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।


अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे, लेकिन फ़िल्मी पर्दे से इतर प्राण असल ज़िंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था। 


प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने

हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में 'हलाकू' फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित 'जिस देश में गंगा बहती है' में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म 'उपकार' में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त
की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें 'बॉम्बे टॉकीज' की

फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग- अलग रंग बिखेरे। इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।
हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है... यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है।जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग 'हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है' का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर

की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म 'खानदान' से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद 'जिद्दी' से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर ,राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। 'पूजा के फूल' और'कश्मीर की कली' जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया।
अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।उनकी खलनायकी के विविध रूप 'आजाद', 'मधुमती', देवदास , 'दिल दिया दर्द लिया', 'मुनीम जी' और 'जब प्यार किसी से होता है' में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख
अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के
ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। 'पत्थर के सनम' हो या 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मजबूर' हो या 'हाफ टिकट' या फिर 'धर्मा', प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया

प्राण के प्रसिद्ध संवाद (डायलॉग) 


(डायलॉग) फ़िल्म 1. इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता! ज़ंजीर 

2. राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ उपकार 
3. ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है उपकार 
4. ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना उपकार 
5. ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है कश्मीर की कली
 6. एक डाकू की लड़की पुलिस वाले से शादी करेगी, गोली मारिए सरदार जिस देश में गंगा बहती है 
7. शेर और बकरी जिस घाट पर एक साथ पानी पीते हों, वो घाट, न हमने देखा है और न देखना चाहते हैं आन बान
 8. पहचाना इस इकन्नी को, यह वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया था। रॉबर्ट सेठ तुम्हारे ही सोने से तुम्हारे ही आदमियों को ख़रीद कर आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं और तुम मेरे क़दमों में। अमर अकबर एंथनी 
9. क्योंकि मैं रिवॉल्वर हमेशा ख़ाली रखता हूं मजबूर 
10. लेकिन मैं उस क़िस्म का जेलर नहीं हूं। मैं न तो छुट्टी पर जाऊंगा और न तबादले की दरख़्वास्त करूंगा। तुम्हारा वो रिकॉर्ड है, तो हमारा भी एक रिकॉर्ड है। हमारी जेल से संगीन से संगीन क़ैदी जो बाहर गया है उसने तुम्हारे उस दरबार में दुआ मांगी है तो यही दुआ मांगी है कि अगर दोबारा जेल जाए तो रघुवीर सिंह की जेल में न जाए कालिया 
11. समझते हो कि सब समझता हूं इससे बढ़कर इंसान की नासमझी और क्या हो सकती है क्रोधी
 12. शायद तू यह भूल गया कि इस ज़मीन पर फ़तह ख़ां अकेला पैदा नहीं हुआ है, उसके साथ उसकी बला की ज़िद भी पैदा हुई है। कहीं मेरी ज़िद किसी ज़िद पर आ गई तो अपनी बेटी के रास्ते में पड़े हुए बेशुमार कांटों को तो मैं अपने दामन में समेट लूंगा लेकिन तेरे रास्ते दहकते हुए अंगारों से भर दूंगा। सनम बेवफ़ा
 13. आवाज़ तो तेरी एक दिन मैं नीची करूंगा, शेर की तरह गरजने वाला बिल्ली की ज़बान बोलेगा। सनम बेवफ़ा

रोचक तथ्य


पहली फ़िल्म के मिले 50 रुपये प्राण जब मात्र 19 वर्ष के थे तो उन्होंने 'दलसुख पंचोली' के निर्देशन में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ मे हीरो की भूमिका अदा की थी। उन्हें यह फ़िल्म लेखक 'वली मुहम्मद वली' ने उस समय ऑफ़र की थी जब वह 1939 में लाहौर में एक पान की दुकान के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें इस भूमिका के लिए 50 रुपये दिए गये


प्राण को शायरी व फ़ोटोग्राफ़ी से बहुत अधिक लगाव था। एक समय में उनका घर उनकी तस्वीरों से भरा हुआ था जो विभिन्न रूपों में खींची गई थीं। प्राण को कबीर , ग़ालिब व फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लगभग पूरा कलाम याद था और वह सेट पर भी इनकी शायरी पढ़ते थे।ताश खेलना व स्पोर्टस भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के 'क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया' में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलीब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। वह मुंबई की फुटबॉल टीम 'डायनामो' के प्रायोजक भी थे।


सह-अभिनेत्रियाँ प्राण ने अपने ज़माने की लगभग सभी अभिनेत्रियों के साथ काम किया। 'खानदान' (1942) में 13 वर्षीय नूरजहां तो क़द में इतनी छोटी थीं कि उन्हें प्राण के साथ अभिनय करते समय ईटों पर खड़ा होना पड़ता था। वैजयंतीमाला (बहार, 1951) व हेलन
(हलाकू, 1956) ने अपनी पहली फ़िल्म प्राण के साथ ही की थीं। हिन्दी फ़िल्मों के पर्दे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले प्राण फ़िल्मोद्योग में भद्र व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वह अपने में मस्त रहते थे और आज तक किसी हीरोइन के साथ उनका स्कैंडल नहीं हुआ। सेट पर वह लतीफ़े सुनाते,शायरी सुनाते, लेकिन जब दृश्य पूरा हो जाता तो वह अपने कमरे में जा कर अपने आप तक सीमित हो जाते।प्रभावी खलनायकी प्राण ने पर्दे पर अक्सर बुरे व्यक्ति की भूमिका की, इसलिए यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि वास्तव में वह कितने अच्छे व्यक्ति हैं। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावी थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। उनके तीनों बच्चों पिंकी, अरविंद व सुनील को बहुत शर्मिंदगी होती थी, जब दूसरे बच्चे प्राण को खलनायक कहते थे। उनकी बेटी पिंकी ने एक बार उनसे पूछा था कि वह फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएं क्यों नहीं करते हैं? इसलिए जब 1967 में उन्हें मनोज कुमार ने ‘उपकार’ ऑफ़र की तो उन्होंने उसे फ़ौरन स्वीकार कर लिया। यह हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली सकारात्मक भूमिका वाली फ़िल्म थी। 

मुमताज़ की त्वचा बहुत कोमल थी और उस पर आसानी से निशान पड़ जाते थे। चूंकि प्राण के साथ उनकी फ़िल्मों में उन्हें अक्सर पर्दे पर संघर्ष करते हुए दिखाया जाता था तो मुमताज के बदन पर काले व नीले निशान पड़ जाते थे। दृश्य पूरा होने के बाद प्राण को बहुत शर्मिंदगी होती थी और वह मुमताज से माफ़ी मांगा करते थे। हास्य के लिए प्राण का नृत्य प्राण की एक कमज़ोरी यह रही कि वह नृत्य करना नहीं जानते थे। इसलिए जब फ़िल्म में हास्य की स्थिति उत्पन्न करनी होती तो प्राण से नृत्य कराया जाता जैसा कि ‘मुनीम जी’, ‘बल्फ मास्टर’ आदि। नृत्य न करने की वजह से ही उन्होंने 6-7 फ़िल्मों के बाद हीरो की भूमिका करना बंद कर दिया था। फिर भी पर्दे पर गाए उनके गीत बहुत मशहूर हुए जैसे ‘यारी

है ईमान मेरा’ ( ज़ंजीर 1973), ‘राज को राज ही रहने दो’ (धर्मा 1973) या ‘क़समे, वादे, प्यार, वफा सब’ (उपकार 1967)घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़ प्राण ने 1950 के दशक में अपना बंगला बांद्रा के यूनियन पार्क में बनवाया। इस जगह को फ़िल्मी दुनिया के लोग मनहूस जगह समझते थे क्योंकि इसमें रहने वाले अनेक कलाकार जैसे कॉमेडियन गोप, निर्माता राम कमलानी व संगीतकार अनिल विश्वास को जबरदस्त प्रोफेशनल घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन प्राण ने ऐसे किसी अंधविश्वास को मानने से इंकार कर दिया। उन्हें जगह पसंद आई और उन्होंने अपने बंगले का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘पिंकी’ रख दिया। पालीहिल पर वह पहला मशहूर घर था। प्राण के घर के आगे उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। बच्चे भी वहां जमा हो जाते थे। प्राण को बच्चे बहुत पसंद थे और वह उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते व उन्हें मिठाई, बिस्किट आदि खिलाते।

देश के विभाजन के समय प्राण सिकंद मुंबई आए और इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि उन्होंने भव्य ताजमहल होटल में कमरा लिया। उन्हें लगा कि कुछ ही दिनों में काम मिलने के बाद अपना फ्लैट ख़रीदेंगे, परंतु उन्हें नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा और लाहौर में सफल नायक रहे प्राण को मजबूर होकर ‘गृहस्थी’ (1948) में खलनायक की भूमिका करनी पड़ी, परंतु मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ नामक फ़िल्म में एक बर्बर, सनकी और वहशी तानाशाह की भूमिका में उन्होंने ऐसा खौफ पैदा किया कि हर बड़ी फ़िल्म में उन्हें खलनायक की भूमिका मिलने लगी। ‘हलाकू’ में प्राण सिकंद ने यह सीखा कि उन्हें अपनी भूमिकाओं के लिए विशेष पोशाक, विग इत्यादि का उपयोग करना चाहिए। उनकी पोशाकें और विग उनके अभिनय का हिस्सा बन गए।प्राण ने लगभग 350 से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों सहित बमुश्किल ही कोई फ़िल्म देखते थे। प्राण को ‘परिचय’ (1972) में अपनी भूमिका सबसे कठिन प्रतीत हुई, जिसमें उन्होंने एक ज़िद्दी, अनुशासित व्यक्ति की भूमिका अदा की थी। उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ (1972) है जिसका निर्देशन ब्रिज ने किया था। शम्मी कपूर की लगभग सभी फ़िल्मों में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई। पर्दे की इस दुश्मनी के बावजूद दोनों आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों को ही मांसाहारी भोजन व शराब बहुत पसंद थी। प्राण के अन्य अच्छे दोस्तों में दिलीप कुमार व राज कपूर शामिल थे और यह तिकड़ी अक्सर उनके बंगले पर महफिलें जमाती थीं


मशहूर फ़िल्म अदाकार 'प्राण' का निधन हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेताप्राण की शुक्रवार 12 जुलाई , 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, "उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।" उन्हें इस साल दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था लेकिन वो इस क़दर बीमार थे कि इसे ख़ुद
स्वीकार करने दिल्ली नहीं आ पाए थे। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने उनके घर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया। उनके निधन पर दुख जताते हुए बॉलीवुड ने उन्हें भारतीय सिनेमा का बड़ा स्तंभ बताया, जिनका कई सितारों का जीवन बनाने में अहम योगदान था। फ़िल्म इंडस्ट्री के पुराने और युवा अभिनेताओं ने प्राण के निधन पर अपनी संवेदना जताई। सुपरस्टार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड के लीजेंड के साथ
जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। प्राण के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुके अमिताभ बच्चन ने कहा कि उनके जैसे कद्दावर अभिनेता अब नहीं आते। उन्होंने कहा, 'वह एक बेहतरीन व्यक्ति, प्रशंसनीय सहयोगी, संपूर्ण पेशेवर, निभाये जाने वाले पात्रों को अपने में आत्मसाथ करने वाले, काम के बाद एक दिलचस्प साथी और एक विचारशील मनुष्य थे।' दिलीप साहब ने कहा, 'मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे मेरे निकाह में पहुंचे थे। श्रीनगर के खराब मौसम से जूझते हुए, वह वहां शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट ली, वहां से फिर शाम में मुंबई पहुंचे, बस मेरे निकाह से ठीक पहले मुझे गले लगाने के लिए।'
#12july2013 ⚰️,12feb 1920🎂

Wednesday, July 10, 2024

प्रेम वैद

#10july
#26feb 

प्रेम वैद्य 

🎂जन्म 26 फरवरी, 1927
⚰️10 जुलाई 2014
 वह एक निर्देशक, छायाकार, पटकथा लेखक और निर्माता थे। 

प्रेम वैद्य का जन्म 26 फरवरी, 1927 को हुआ था। वे एक निर्देशक, छायाकार, पटकथा लेखक और निर्माता थे। उनकी पुरस्कार विजेता कृतियों में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर पर आधारित जीवनी पर आधारित वृत्तचित्र वीर सावरकर शामिल है। 1954 में, वे सहायक छायाकार के रूप में भारत सरकार के फिल्म प्रभाग का हिस्सा बन गए। इसके अलावा, प्रेम वैद्य ने काला पानी: ए पिलग्रिमेज, वीर सावरकर, नीलम संजीव रेड्डी: प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया, गो स्लो, रिदम्स ऑफ ए न्यू लाइफ आदि जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया है।

निर्देशन के अलावा वे एक अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और मराठी में समाचार पत्रों और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के लिए कई लेख लिखे। मूविंग इमेजेस पर यादगार असाइनमेंट और सावरकर ए लाइफ़लॉन्ग क्रूसेडर को क्रमशः नेशनल फ़िल्म आर्काइव ऑफ़ इंडिया और न्यू एज इंटरनेशनल पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित किया गया था। प्रेम वैद्य को 2003 में भारतीय डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन द्वारा लाइफ़टाइम अचीवमेंट के लिए एज्रा मीर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 10 जुलाई 2014 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 
प्रेम वैद्यप्रेम वैद्य 1954 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म प्रभाग में शामिल हुए, जब यह अपने स्वर्णिम काल में था। वे 1985 में निर्देशक/निर्माता के पद से सेवानिवृत्त हुए। इस अवधि के दौरान उन्होंने 'भारतीय न्यूज़रील' और वृत्तचित्र फिल्मों के लिए देश में प्रमुख घटनाओं को फिल्माया। उन्हें 2003 में भारतीय वृत्तचित्र निर्माता संघ (आईडीपीए) से एज्रा मीर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिला। उनके कुछ प्रमुख कार्य नीचे सूचीबद्ध हैं:

 

1990: कॉस्मिक डांस ऑफ शिवा, डॉ. करण सिंह के प्रोडक्शन के लिए निर्देशन कार्य।

1990 : वनश्री ते धनश्री - महाराष्ट्र सरकार के लिए पटकथा और निर्देशन हेतु कार्य।

1986 : वह धरती जो हमारी थी : गोवा के स्वतंत्रता आंदोलन पर पटकथा और निर्देशन के लिए असाइनमेंट।

1985 : महान नमक मार्च - 1930 में साबरमती आश्रम से दांडी तक महात्मा गांधी के नमक मार्च की पटकथा और निर्देशन के लिए असाइनमेंट।
1985 : कालापानी: एक तीर्थयात्रा - पटकथा और निर्देशन के लिए असाइनमेंट।
फिल्मोत्सव-1986 के दौरान भारतीय पैनोरमा के लिए फिल्म का चयन किया गया।

1985 : बंधन से ज्ञान की ओर : अनौपचारिक शिक्षा पर यूनिसेफ असाइनमेंट।

1984: अगेंस्ट द करंट - सर एडमंड हिलेरी के गंगा अभियान के लिए सह-निर्देशक और सह-निर्माता के रूप में कार्य।
टूरिस्टियोनगा फिल्म क्रांज, यूगोस्लाविया में 10वें मेडनारोडनी फेस्टिवल स्पोर्टेंगा में डिप्लोमा प्राप्त किया; ऋत्विक घटक मेमोरियल पुरस्कार और नकद पुरस्कार, कलकत्ता, 1985।

1984 : वीर सावरकर : क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर पर एक जीवनी संबंधी वृत्तचित्र फिल्म के लिए शोध, पटकथा लेखन और निर्देशन का कार्य।
31वें वार्षिक फिल्मफेयर पुरस्कार, 1984, मुंबई में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त किया।
* 1984 में मुम्बई में आयोजित फिल्मोत्सव में प्रमाण-पत्र।
* 1984 में ताशकंद फिल्म महोत्सव में डिप्लोमा।
* 1985 में उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ द्वारा वर्ष की सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र फिल्म के लिए समीक्षक पुरस्कार।

1984 : प्लांट टिशू कल्चर : निर्माता के रूप में कार्य।
इस फिल्म को बेलग्रेड में 13वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में निकोला टेस्ला कांस्य पदक मिला।

1982 : बाबा आमटे : बाबा आमटे पर एक वृत्तचित्र फिल्म के लिए पटकथा लेखन कार्य।
इस फिल्म को 1982 में क्राको अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म महोत्सव में विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

1982 : एशियाड-82 - दिल्ली में IX-एशियाई खेलों को कवर करने का कार्य।
कांस्य पदक और प्रमाण पत्र प्राप्त किया।

1981 : दृढ़ बुद्धि - आचार्य विनोबा भावे पर एक वृत्तचित्र फिल्म, पटकथा और निर्देशन।

1980: संयुक्त राष्ट्र के "मानव निपटान कार्यक्रम" के लिए विश्वव्यापी फिल्म स्क्रिप्ट प्रतियोगिता में भाग लिया। पुनर्वास के मार्च पर स्क्रिप्ट के लिए तीसरा पुरस्कार साझा किया।

1979 : कंचनजंगा की विजय - निर्देशकीय कार्य।
36वें अंतर्राष्ट्रीय खेल फिल्म समारोह, रोम-1980 में गोल्डन ट्रॉफी प्राप्त की।

1978: डॉक्यूमेंट्री और टीवी के क्षेत्र में निर्माण तकनीकों में प्रशिक्षण के लिए बीबीसी में प्रतिनियुक्ति पर।

1977 : महासागर से आकाश तक - प्रथम एवरेस्ट विजेता, सर एडमंड हिलेरी के गंगा अभियान पर एक वृत्तचित्र फिल्म के लिए कैमरामैन के रूप में कार्य।
पुरस्कार और स्क्रीनिंग: अप्रैल, 1980 में ट्रेंटो, इटली में अंतर्राष्ट्रीय पर्वतारोहण और अन्वेषण फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ग्रैंड प्रिक्स सिटा डि ट्रेंटो; मई, 1980 में अमेरिकी फिल्म समारोह में रेड रिबन।

1974 : मैन इन सर्च ऑफ मैन: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की लुप्त होती जनजातियों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए निर्देशक के रूप में कार्य। साथ ही सिनेमैटोग्राफर का काम भी किया।
* 22वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ सूचना फिल्म के लिए रजत रजत कमल और नकद पुरस्कार प्राप्त किया।
* अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह, बर्लिन, 1975; अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह, बॉम्बे; अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक वृत्तचित्र फिल्म समारोह, इटली, 1975 में प्रमाण पत्र।
* 13वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह ब्रिसबेन, 1978 में डिप्लोमा

1971: पूर्वी पाकिस्तान में उथल-पुथल - विशेष भारतीय न्यूज़रील और डॉक्यूमेंट्री के लिए मुक्ति वाहिनी (स्वतंत्रता सेनानियों) की गतिविधियों को कवर करने के लिए पूर्वी पाकिस्तान के अंदर जाने के लिए स्वेच्छा से आगे आए। यह कवरेज तब किया गया था जब पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंध तोड़ लिए थे।

1971 : एक राष्ट्र का जन्म: बांग्लादेश: बांग्लादेश के अंदर काम किया और पश्चिमी पाकिस्तान के साथ युद्ध को कवर किया। नकद पुरस्कार प्राप्त किया।

1968: संयुक्त राष्ट्र के साथ यूएनसीटीएडी को वृत्तचित्र फिल्म के लिए कार्य सौंपा गया।

1966: सूखे पर रिपोर्ट - यूपी और बिहार में सूखे पर वृत्तचित्र और भारतीय न्यूज़रील के लिए कैमरामैन और एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में। ओस्लो में नॉर्वेजियन टीवी नेटवर्क पर इस फिल्म के एक शो के परिणामस्वरूप नॉर्वे में श्रमिक आंदोलन से यूपी और बिहार के सूखाग्रस्त लोगों के लिए 25 लाख रुपये का योगदान मिला।

1966 : अलकनंदा नदी को कवर करने के लिए तीन सदस्यीय टीम द्वारा अलकनंदा अभियान चलाया गया, जिसमें अभियान के दो सदस्यों की मृत्यु हो गई।

1965 : भारत-पाक युद्ध: भारतीय न्यूज़रील और वृत्तचित्र के लिए जम्मू-चुंब और जम्मू-सियालकोट सेक्टरों में अग्रिम पंक्ति के युद्ध को कवर करना।

1965: विशेष भारतीय न्यूज़रील और वृत्तचित्र के लिए ताशकंद सम्मेलन और प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु को कवर करने के लिए ताशकंद की यात्रा।

1964: भारतीय न्यूज़रील और डॉक्यूमेंट्री के लिए राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन की राजकीय यात्रा को कवर करने के लिए यूएसएसआर, यूके, आयरलैंड का दौरा।

1964: भारतीय न्यूज़रील के लिए गुटनिरपेक्ष सम्मेलन को कवर करने हेतु प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ काहिरा की यात्रा।

1964: विशेष भारतीय न्यूज़रील और वृत्तचित्र के लिए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की राजकीय यात्रा को कवर करने हेतु बर्मा की यात्रा।
 

📙पुस्तकें

2009 : चलती छवियों पर यादगार कार्य

1997 : क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर पर यादगार वृत्तचित्र फिल्म

1996 : सावरकर : एक आजीवन योद्धा

Thursday, June 27, 2024

राज कंवर

#28jun
#03feb
राज कवंर
जन्म की तारीख और समय: 28 जून 1961, भारत
मृत्यु की जगह और तारीख: 3 फ़रवरी 2012, सिंगापुर
पत्नी: अनीता कँवर (विवा. ?–2012)
भाई: के० पप्पू
बच्चे: करन कँवर, अभय कंवर
उनकी शिक्षा देहरादून के कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल में हुई ।

उनके दो बेटे हैं (उनकी पत्नी अनीता कंवर के साथ), करण राज कंवर और अभय कंवर, दोनों ने फिल्म निर्देशक और निर्माता के रूप में काम किया है। फिल्म निर्माता के. पप्पू उनके बड़े भाई हैं।

3 फरवरी 2012 को सिंगापुर में किडनी की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई
कंवर ने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली में नाटकों का निर्देशन करके की। इसके बाद वह मुंबई चले गए जहां उन्होंने शेखर कपूर और राज कुमार संतोषी जैसे निर्देशकों के सहायक के रूप में काम किया । उनकी निर्देशित पहली फिल्म दीवाना थी । 1992 में रिलीज हुई यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर रही और शाहरुख खान की पहली फिल्म थी । उन्होंने लाडला (1994), जान (1996), जीत (1996), जुदाई (1997), दाग: द फायर (1999) और बादल (2000) जैसी कई अन्य बॉक्स ऑफिस हिट फिल्मों का निर्देशन किया । कंवर ने लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा जैसे अभिनेताओं की खोज कीजिन्हें उन्होंने 2003 में अपनी फिल्म अंदाज़ में कास्ट किया था । [3] उनकी आखिरी फिल्म सदियां (2010) थी। अनुराग सिंह ज्यादातर फिल्मों में उनके साथ मुख्य सहायक थे। उनकी ज्यादातर फिल्मों के मुख्य किरदारों के नाम करण और काजल हैं।

निदेशक

सादियान (2010)
हमको दीवाना कर गए (2006)
अंदाज़ (2003)
अब के बरस (2002)
फ़र्ज़ (2001)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
हर दिल जो प्यार करेगा (2000)
बादल (2000)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997)
जुदाई (1997)
जीत (1996)
जान (1996)
कर्तव्य (1995)
लाडला (1994)
दीवाना (1992)

लेखक

हमको दीवाना कर गए (2006)
अंदाज़ (2003) (कहानी)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
बादल (2000) (कहानी)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997) (कहानी)
जीत (1996)

निर्माता

सादियान (2010)
रकीब (2007)
हमको दीवाना कर गए (2006)
अब के बरस (2002)
ढाई अक्षर प्रेम के (2000)
दाग: द फायर (1999)
इतिहास (1997)
सहायक संचालक
संपादन करना
घायल (1990)
राम-अवतार (1988)।
मिस्टर इंडिया (1987)

Wednesday, June 19, 2024

जीत सिंह नेगी

#21jun 
#02feb 
जीत सिंह नेगी 

🎂जन्म- 02 फ़रवरी, 1925; 

⚰️निधन 21 जून, 2020 
 
उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। वह पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक भी रहे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया था। तब पहली बार ऐसा हुआ था, जब किसी उत्तराखंडी लोकगायक के गीतों का रेकॉर्ड उस समय देश की मशहूर ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया। 2 फरवरी, 1925 को पौड़ी जिले के अयाल गांव में जन्मे और वर्तमान में देहरादून के नेहरू कॉलोनी (धर्मपुर) के निवासी जीत सिंह नेगी के इसमें 6 गीत शामिल किए गए थे। जीत सिंह नेगी अपने दौर के न केवल जाने-माने लोकगायक रहे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी रहे। दो हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा…’ ‘रामी बौराणी…’ ‘मलेथा की गूल…’ जैसे कई उनके नाटक भी लोकप्रिय हुए।

रेडियो पर पहले गढ़वाली लोकगायक

जीत सिंह नेगी के ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा’ को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने कानपुर में न केवल रिकॉर्ड किया, बल्कि रेडियो पीकिंग से उसका प्रसारण भी किया। वे पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।

लोकप्रिय गीत

1950 के दशक की शुरूआत में रेडियो से यह गीत प्रसारित हुआ तो उत्तराखंड से लेकर देश के महानगरों तक प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच पलक झपकते ही बेहद लोकप्रिय भी हो गया। इस सुमधुर खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यां-सड़क्यों रूणूं छौं परदेश मा…।’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहाँ परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।)

निर्देशन कार्य

जीत सिंह नेगी के निर्देशन में 1954-1955 में दिल्ली में आयोजित गढ़वाली नाटक ‘भारी भूल’ का मंचन हुआ। कई अच्छे कलाकार नेगी जी की टोली से जुड़े रहे। मुंबई-दिल्ली-चंडीगढ़ समेत देश के कई प्रमुख नगरों में उस दौर में जीत सिंह नेगी के गीत और नाटक श्रोताओं-दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते थे।

मृत्यु

जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से लोक कलाकारों के साथ ही प्रदेशवासियों में शोक दौड़ पड़ी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखण्ड के लोकगायक और गीतकार जीत सिंह नेगी के निधन पर शोक व्यक्त किया।

Tuesday, June 18, 2024

विदया नाथ सेठ

#02jun
#18jun
#29feb
पुराने जमाने के संगीतकार गायक विद्यानाथ सेठ की
🎂जन्म दिन विवादास्पद
02 जून 1915
             या
29 फरवरी 1916
मृत्यु⚰️18 जून
उनके पासपोर्ट के अनुसार 2 जून 1915  में मगर घर वालो के कथनानुसार 29 फरवरी 1916 को लाहौर में जन्मे और बड़े हुए विद्यानाथ सेठ का नाम आज की पीढ़ी के लिए शायद अजनबी हो मगर पिछली सदी के छठे दशक तक उनकी आवाज़ रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के जरिये घर-घर में गूंजती थी।  खासकर उनके गाये भजन तो पुरानी पीढ़ी के लोगों की जुबान पर आज भी हैं। "मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे", "सुन लीजो प्रभु मोरी" , "मैं गिरधर के गुण गाऊं"  या ‘चदरिया झीनी रे झीनी’जैसे भजन उनकी आवाज़ में जब कभी सुनने में आते हैं तो उस पीढ़ी के लोग साथ में गुनगुनाते हुए यादों के गलियारों में खो जाते हैं। 

रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के उस सुनहरी दौर के इस  सहज और सरल गायक ने अपने गायन को कभी व्यावसाय नहीं बनाया भले ही वे रेडियो पर गाते रहे, एचएमवी के लिए गाते रहे और संगीत सभाओं में गाने के लिए भी जाते रहे। फिल्मों में गाने के लिए भी उनको खूब बुलावे आये मगर परिवार को छोड़ कर मुम्बई या कोलकाता जाने का कभी मन नहीं हुआ।  तब के प्रमुख संगीतकार पंडित गोबिन्द राम ने खुद उन्हें बुलावे भेजे मगर वे बंबई नहीं गए। सिर्फ एक फिल्म 'रूप रेखा' (1948) में उन्होंने पांच गाने गाये। फिल्म के संगीतकार उनके साथी रवि रॉय चौधरी थे जिनका आग्रह वे नहीं टाल सके। वास्तवमें इस फिल्म के लिए अपने गाने उन्होंने खुद ही कंपोज़ किये और गाये थे। उनके पांच में से तीन एकल गाने थे, एक में उनकी सह गायिका थी मुनव्वर सुल्ताना और एक अन्य में उनके साथ मुनव्वर सुल्ताना और सुरिंदर कौर ने आवाज़ दी। 

गैर फ़िल्मी गानों में वे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बने रहे।  उनके गायन में एक विशेष प्रकार की सरलता थी अपने गायन में उन्होंने कभी कोई तिकड़म या उस्तादी दिखा कर चौकाने की कोशिश नहीं की। जब वे 98वें वर्ष में चल रहे थे  तब जयपुर के संगीत रसिकों के एक समूह  'सुर यात्रा' के हमराहियों के साथ हम उनका इस्तेकबाल करने उनके घर दिल्ली गए थे जहां हमने उनकी ऐसी सरलता, सादगी और प्रफुल्लता देखी जो उनकी उम्र के लोगों आम तौर पर नहीं मिलती। उन्होंने लोकप्रियता की बुलंदियां छुई मगर अहंकार को अपने पास फटकने नहीं दिया।  पूरी ज़िन्दगी वे बालक की तरह सरल बने रहे। सरल, सादे और प्रफुल्लित जीवन से सरोबार विद्यानाथ सेठ एक नेक इंसान थे। इसीलिये उनकी गायकी सुनने वालों को सच्ची लगती थी। गायकी  में भावों  की अभिव्यक्ति पर उनका  खास ज़ोर रहता था जिससे उनके  गीत, ग़ज़ल व भजन  सुनने वालों के दिलों में सीधे उतर जाते थे।

गैर फिल्मी गानों के लिए उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एचएमवी कंपनी ने अपने श्रेष्ठ गायकों के पोस्टरों की शृंखला में विद्यानाथ सेठ को भी शामिल किया था। पुराने एचएमवी डीलरों के व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की दीवारों पर उनके पोस्टर फ्रेम में जड़े हुए लटके आज भी दिख जाते हैं।  

प्रसिद्ध भजन गायक स्वर्गीय हरिओम शरण ने एक इंटरव्यू में स्वतंत्र पत्रकार संजय पटेल को बताया था कि उनके मन में जिस आवाज़ को सुन कर भजन गाने की प्रीति लगी वह विद्यानाथ सेठ की आवाज़ थी। 

सेठ को बचपन से ही गाने का शौक था।  स्कूल में वे प्रार्थना का नेतृत्व करते थे।  कॉलेज पूर्व की अंतिम स्कूली क्लास के दौरान स्कूल के हैंड मास्टर साहब ने उन्हें सुझाया कि वे लाहौर में चल रहे गन्धर्व महाविद्यालय में भी भर्ती हो  जाएं।  वहां संगीत की अकादमिक समझ हुई मगर किसी उस्ताद से कभी दीक्षित नहीं हुए। बक़ौल सेठ : “जो कुछ सीखा बड़े उस्तादों को सुन कर और उनकी सोहबत से ही सीखा”।  जिन उस्तादों को बार-बार सुन कर सीखा उनमें पंडित ओंकार नाथ ठाकुर और फ़ैयाज़ खान प्रमुख थे। ठाकुर ग्वालियर घराने के विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य थे और लाहौर गंधर्व महाविद्यालय के प्रिंसिपल रहे जिन्होंने बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना की। बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड के दरबार के गायक फ़ैयाज़ खान जिन्हें‘ज्ञान रत्न’की उपाधि प्राप्त थी ‘महफिल के बादशाह’ कहलाते थे।  “शास्त्रीय संगीत के ये दो दिग्गज गाते हुए बोलों को जिस तरह काटते थे वह मुझे बहुत भाती थी।  मैंने  भी उनकी  इस शैली का उपयोग अपने गानों में  किया”।

प्रसिद्ध संगीतकार फिरोज़ निज़ामी जो तब लाहौर रेडियो स्टेशन में काम करते थे ने उन्हें कुछ सभाओं में सुना तो उनसे बोले “रेडियो पर क्यों नहीं गाते?”वे बोले रेडियो पर तो मैं किसी को नहीं जानता। निज़ामी कहले लगे “मैं जो हूं”। इस प्रकार 1938 में सेठ का रेडियो पर पदार्पण हुआ। पहली बार रेडियो पर गाने पर जो थ्रिल उन्हें हुआ होगा वह तब भी बरकरार था जब हम उनसे मिले। “उस जमाने में रेडियो पर एक गाने के पांच से सात रुपये

मिलते थे। मुझे निज़ामी साहब ने 15 रुपये दिलाये। उन दिनों यह बहुत बड़ी रकम होती थी। अमूमन हर हफ्ते एक गाना रेडियो पर गा लेता था। इस प्रकार महीने में चार गाने हो जाते और मेरी जेब में 60 रुपये आ जाते। अपनी तो रईसी हो गई”।

लाहौर रेडियो स्टेशन पर उनकी ऐसी ख्याति हुई कि अन्य रेडियो स्टेशनों से उन्हें बुलावे आने लगे। तब टेप रिकॉर्डिंग का युग नहीं आया था। दिल्ली, कलकत्ता, बंबई, लखनऊ और जोधपुर जैसे स्टेशनों की तरंगों पर सवार हो कर उनकी आवाज़ दूर दूर तक पहुंची।  इसी बीच उनके एक परिचित ने उन्हें बुलाया और इंश्योरेंस कंपनी में नौकरी दे दी। “बिना कोई एप्लीकेशन दिये मुझे नौकरी मिल गई”। बाद में यही कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया कहलायी। उनकी पत्नी दिल्ली में चिकित्सक थी और यह दंपती यहीं के हो कर रह गए।

ग्रामोफोन कंपनी के लिए उनकी पहली रिकॉर्डिंग भी उसी जमाने में 1938-39 में हुई। रिकॉर्ड पर मेरा पहला गाना था‘आवत मोरी गलियन में गिरधारी’। इस गाने के संगीतकार थे गुलाम अहमद चिश्ती जिन्हें अब चिश्ती बाबा के नाम से पाकिस्तानी फिल्म संगीत के पितामह के रूप में जाना जाता है। चिश्ती बाबा संगीतकार ख़ैयाम के भी गुरु रहे।

लाहौर के गंधर्व महाविद्यालय में उनके कुछ साथी शास्त्रीय संगीत के बड़े उस्ताद बने जिनमें डी. वी. पलुस्कर। “वो मुझे अपना बड़ा भाई ही मानता था। नेक आदमी था। कमाल का गाता था”। बिहार और अमृतसर जैसी कईं जागहों पर हमने साथ-साथ गाया। 

तब के और आज के संगीत में वे क्या फर्क महसूस करते हैं के जवाब में उनका कहना था “तब सभी गाने रागों में होते थे। आज जैसे इधर-उधर का धूम-धड़ाका नहीं होता था”।

अपने जमाने की कुछ यादें साझा करते हुए वे गायक के. एल. सैगल को याद करना नहीं भूलते। “हमारे शहर में सैगल की फिल्म‘माई सिस्टर’लगी। उसमें सैगल का जबर्दस्त मशहूर हुआ गाना था‘ऐ क़ातिबे तक़दीर मुझे इतना बता दे’था। जब पर्दे पर यह गाना फिल्म में आया तब हाल में दर्शकों ने खड़े हो कर तालियां बजाई मानो सैगल खुद सामने स्टेज पर हो। ऐसा किसी सिनेमा हाल में फिर कभी किसी के लिए नहीं हुआ”। 

अपनी लंबी उम्र के अंतिम पड़ाव में भी किस भांति वे प्रसन्नचित्त और स्वस्थ रह सके इसका राज़ उन्हों ने अपना एक कवित्त कह कर यों बताया: “कड़वी बात कभी न करना/ मेरी बात पे ध्यान तुम धरना/ कोई नहीं सुनेगा, कोई सहेगा/ दुखी रहोगे प्यारे”। इस कवित्त के अंत में उन्होंने कहा “दुख-दर्द और गम/इस उम्र में न होंगे कम/ये जान ले मेरे प्यारे/ हिम्मत रख, दिल ना तोड़/ चलता चल भगवान सहारे/ वरना बूढ़ा होकर, घर में सो कर वचन सुनोगे खारे”।
इसी जीवन दर्शन से वे आखरी सांस तक जीवंत बने रहे किसी से कभी कोई शिकायत नहीं की। जो भी जीवन में होता गया उसे वे सहज रूप से लेते गए। आज की पीढ़ी उनके नाम से नावाकिफ है इसका भी उन्हें कोई शिकवा नहीं रहा।

18 जून 2015 में उनका निधन हो गया

करण सिंह ग्रोवर

करन सिंह ग्रोवर 🎂जन्म की तारीख और समय: 23 फ़रवरी 1982 , नई दिल्ली पत्नी: बिपाशा बसु (विवा. 2016), जेनिफर विंगेट (विवा. 2012–2014), करन सिंह...